सम्मान तो मिला, पर रोटी का क्या? पद्मश्री विजेताओं की पेंशन वाली मांग ने छेड़ी नई बहस
Ashish Bhardwaj | May 20, 2026, 14:05 IST
Photograph: (the sootr)
क्या पद्मश्री सम्मान प्राप्त करने वाली हस्तियों को पेंशन भी मिलनी चाहिए। यह सवाल पद्मश्री के लिए चुने गए राजस्थान में अलवर के भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती ने उठाया है। सवाल इसलिए है क्योंकि अब इस सम्मान के लिए जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोग चुने जा रहे हैं
सुनील जैन@अलवर
देश का चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्मश्री। जब इसके आगे किसी का नाम जुड़ता है तो सम्मान और गर्व से पूरा देश झूम उठता है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जब राष्ट्रपति भवन से इन नामों की घोषणा होती है तो अखबारों के पन्ने और टीवी स्क्रीन चमक उठते हैं।
लेकिन, इस चमक के पीछे का अंधेरा तब सामने आता है, जब पुरस्कार पाकर लौटे किसी लोक कलाकार को अपनी आजीविका चलाने के लिए फिर से उसी पाई-पाई के संघर्ष से जूझना पड़ता है।
हाल ही में राजस्थान के अलवर जिले से उभरकर आई एक आवाज ने देश के बौद्धिक और नीति-निर्माता गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। बहस यह कि क्या पद्म पुरस्कारों के साथ विजेताओं को कोई नकद राशि या जीवनभर के लिए मासिक पेंशन मिलनी चाहिए?
यह सवाल इसलिए भी बड़ा हो गया है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने पद्म पुरस्कारों का लोकतंत्रीकरण किया है। अब ये अवॉर्ड लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कमरों से निकलकर सुदूर गांवों, खेतों और झोपड़ियों में रहने वाले माटी के लालों तक पहुंच रहे हैं। लेकिन, क्या सिर्फ एक मेडल और प्रशस्ति पत्र इन जमीनी कलाकारों का पेट भर सकता है?
आटा मांगने से लेकर
इस पूरी बहस के केंद्र में हैं अलवर के मशहूर भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती। आगामी 25 मई को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में जब देश की राष्ट्रपति उनके सीने पर पद्मश्री पदक सजाएंगी, तो वह पल उनके 55 साल के कड़े संघर्ष का चरम बिंदु होगा। 25 जनवरी को जैसे ही उनके नाम की घोषणा हुई, मेवात के लोक कलाकारों में खुशी की लहर दौड़ गई।
आज 68 साल के हो चुके गफरुद्दीन मेवाती का जीवन किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। वह मूल रूप से भरतपुर जिले (जो अब डीग जिले में आता है) के रहने वाले थे और साल 1978 में अलवर आ गए थे।
भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती बताते हैं, एक दौर वह भी था जब मैं बहुत छोटा था। पेट की आग बुझाने के लिए अपने पिता के साथ घर-घर जाता था। भपंग बजाकर भगवान शिव के भजन और महाभारत कालीन दोहे गाता था, बदले में लोग जो थोड़ा-बहुत आटा दे देते थे, उसी से हमारे घर का चूल्हा जलता था।
आटा मांगकर जीवन यापन करने वाले इस कलाकार ने अपनी अद्भुत कला के दम पर करीब 60 देशों में भारत का परचम लहराया। साल 1992 में उन्होंने पहली बार विदेश का रुख किया और साल 2012 में लंदन में महारानी एलिजाबेथ के जन्मदिन के मौके पर अपनी कला का ऐसा जादू बिखेरा कि गोरे भी थिरक उठे। उन्हें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, राज्य सरकार और संगीत नाटक अकादमियों से ढेरों पुरस्कार मिले, लेकिन आज भी वह अलवर की एक साधारण सी टाइगर कॉलोनी के बेहद सामान्य घर में रहते हैं।
गफरुद्दीन मेवाती जिस वाद्य यंत्र को बजाते हैं, उसे भपंग कहा जाता है। मान्यता है कि यह वाद्य यंत्र भगवान शिव के डमरू से प्रेरित होकर तैयार किया गया है। यह मेवाती जोगी समुदाय की पुश्तैनी धरोहर है।
अद्भुत बात यह है कि मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने के बावजूद गफरुद्दीन और उनका परिवार भगवान शिव के भजनों और महाभारत की कथाओं को पांडव कड़े के रूप में गाता है। यह भारत की साझी संस्कृति (गंगा-जमुनी तहजीब) का सबसे खूबसूरत उदाहरण है।
आज गफरुद्दीन के बेटे शाहरुख खान मेवाती जोगी इस विरासत की आठवीं पीढ़ी हैं। शाहरुख ने केवल भपंग ही नहीं बजाया, बल्कि मेवात की इस समृद्ध संस्कृति पर बकायदा Ph.D. (पीएचडी) भी की है। उनके छोटे बच्चे भी इस कला को सीख रहे हैं। लेकिन सवाल वही है कि क्या यह विरासत बिना सरकारी आर्थिक सहयोग के अगली पीढ़ी तक जिंदा रह पाएगी?
बहस: सम्मान से पेट नहीं भरता, पेंशन और नकद राशि क्यों है जरूरी?
गफरुद्दीन मेवाती ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए केंद्र और राजस्थान सरकार का आभार तो जताया, लेकिन साथ ही एक ऐसा कड़वा सच भी बयां कर दिया जिसे अक्सर दबा दिया जाता है।
उन्होंने मांग की है कि सरकार को पद्म पुरस्कार पाने वाले विशिष्ट नागरिकों को कम से कम अपनी आजीविका चलाने के लिए मासिक पेंशन की सुविधा देनी चाहिए या फिर पुरस्कार के साथ एक सम्मानजनक नकद राशि दी जानी चाहिए। इस मांग के पीछे के तर्क बेहद ठोस दिखते हैं।
पहले पद्म पुरस्कार अक्सर बड़े उद्योगपतियों, नौकरशाहों, डॉक्टरों, राजनेताओं या शहरी एलीट क्लास को मिलते थे, जिन्हें आर्थिक सहायता की कोई आवश्यकता नहीं होती थी। लेकिन वर्तमान सरकार के पीपुल्स पद्म अभियान के तहत अब जमीनी स्तर पर काम करने वाले गरीब किसान, आदिवासी, पारंपरिक वैद्य और लोक कलाकार सम्मानित हो रहे हैं। इनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर होती है।
पद्मश्री मिलने की घोषणा के बाद भी 68 वर्षीय गफरुद्दीन मेवाती को अपनी आजीविका चलाने के लिए राजस्थान सरकार के ग्राम रथ अभियान के तहत गांव-गांव जाकर सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना पड़ रहा है।
यानी, जिसे देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिलने जा रहा है, वह बुढ़ापे में भी केवल इसलिए भाग-दौड़ कर रहा है ताकि घर का खर्च चल सके।
एक लोक कलाकार जब बूढ़ा हो जाता है, तो उसकी शारीरिक क्षमताएं कम हो जाती हैं। यदि उसके पास आय का कोई निश्चित साधन (पेंशन) नहीं होगा, तो वह अपने बच्चों को इस कला में लगाने के बजाय मजदूरी या किसी अन्य काम में भेजने को मजबूर होगा।
गफरुद्दीन कहते हैं, सरकार को ऐसे कलाकारों के जीवन यापन का ध्यान रखना चाहिए, जिससे उनके बच्चों का लालन-पोषण हो सके और कला की विरासत जिंदा रहे।
वर्तमान नियमों के मुताबिक पद्म पुरस्कार (पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री) केवल एक उपाधि/सम्मान हैं। इसके तहत कोई भी नकद राशि, भत्ता या पेंशन नहीं दी जाती।
विजेताओं को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर वाली एक सनद (प्रशस्ति पत्र) और एक पदक मिलता है। रेलवे में कुछ रियायतें या सरकारी कार्यक्रमों में आमंत्रण जैसे प्रतीकात्मक लाभ जरूर मिलते हैं, लेकिन सीधे तौर पर कोई वित्तीय मदद नहीं होती।
हालांकि, कुछ राज्य सरकारें अपने स्तर पर पद्म विजेताओं को मासिक वित्तीय सहायता देती हैं। जैसे कुछ राज्यों में 10,000 रुपये मासिक पेंशन का प्रावधान है। लेकिन यह पूरे देश में समान रूप से लागू नहीं है और न ही यह राशि आज के दौर के हिसाब से पर्याप्त है।
अलवर के पद्मश्री गफरुद्दीन मेवाती की इस मांग ने नीति-निर्माताओं के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जब खिलाड़ी ओलंपिक में मेडल जीतते हैं, तो उन पर करोड़ों की बरसात होती है और पेंशन भी मिलती है। तो फिर दशकों तक देश की संस्कृति, कला और परंपरा को अपने खून-पसीने से सींचने वाले इन बूढ़े लोक कलाकारों के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों?
गफरुद्दीन का कहना है कि यदि हम वाकई चाहते हैं कि भारत की पारंपरिक कलाएं और माटी की संस्कृति अगली पीढ़ी तक जिंदा रहे, तो हमें पद्मश्री को सिर्फ एक खोखला तमगा बनने से बचाना होगा।
सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले विजेताओं के लिए एक राष्ट्रीय पद्म पेंशन नीति बनाई जाए, ताकि देश का गौरव बढ़ाने वाले इन हाथों को कभी बुढ़ापे में तंगहाली का सामना न करना पड़े।
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देश का चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्मश्री। जब इसके आगे किसी का नाम जुड़ता है तो सम्मान और गर्व से पूरा देश झूम उठता है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जब राष्ट्रपति भवन से इन नामों की घोषणा होती है तो अखबारों के पन्ने और टीवी स्क्रीन चमक उठते हैं।
लेकिन, इस चमक के पीछे का अंधेरा तब सामने आता है, जब पुरस्कार पाकर लौटे किसी लोक कलाकार को अपनी आजीविका चलाने के लिए फिर से उसी पाई-पाई के संघर्ष से जूझना पड़ता है।
हाल ही में राजस्थान के अलवर जिले से उभरकर आई एक आवाज ने देश के बौद्धिक और नीति-निर्माता गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। बहस यह कि क्या पद्म पुरस्कारों के साथ विजेताओं को कोई नकद राशि या जीवनभर के लिए मासिक पेंशन मिलनी चाहिए?
यह सवाल इसलिए भी बड़ा हो गया है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने पद्म पुरस्कारों का लोकतंत्रीकरण किया है। अब ये अवॉर्ड लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कमरों से निकलकर सुदूर गांवों, खेतों और झोपड़ियों में रहने वाले माटी के लालों तक पहुंच रहे हैं। लेकिन, क्या सिर्फ एक मेडल और प्रशस्ति पत्र इन जमीनी कलाकारों का पेट भर सकता है?
आटा मांगने से लेकर पद्मश्री तक का सफर
आज 68 साल के हो चुके गफरुद्दीन मेवाती का जीवन किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। वह मूल रूप से भरतपुर जिले (जो अब डीग जिले में आता है) के रहने वाले थे और साल 1978 में अलवर आ गए थे।
भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती बताते हैं, एक दौर वह भी था जब मैं बहुत छोटा था। पेट की आग बुझाने के लिए अपने पिता के साथ घर-घर जाता था। भपंग बजाकर भगवान शिव के भजन और महाभारत कालीन दोहे गाता था, बदले में लोग जो थोड़ा-बहुत आटा दे देते थे, उसी से हमारे घर का चूल्हा जलता था।
आटा मांगकर जीवन यापन करने वाले इस कलाकार ने अपनी अद्भुत कला के दम पर करीब 60 देशों में भारत का परचम लहराया। साल 1992 में उन्होंने पहली बार विदेश का रुख किया और साल 2012 में लंदन में महारानी एलिजाबेथ के जन्मदिन के मौके पर अपनी कला का ऐसा जादू बिखेरा कि गोरे भी थिरक उठे। उन्हें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, राज्य सरकार और संगीत नाटक अकादमियों से ढेरों पुरस्कार मिले, लेकिन आज भी वह अलवर की एक साधारण सी टाइगर कॉलोनी के बेहद सामान्य घर में रहते हैं।
आठवीं पीढ़ी जिंदा रख रही है शिव के डमरू की विरासत
अद्भुत बात यह है कि मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने के बावजूद गफरुद्दीन और उनका परिवार भगवान शिव के भजनों और महाभारत की कथाओं को पांडव कड़े के रूप में गाता है। यह भारत की साझी संस्कृति (गंगा-जमुनी तहजीब) का सबसे खूबसूरत उदाहरण है।
आज गफरुद्दीन के बेटे शाहरुख खान मेवाती जोगी इस विरासत की आठवीं पीढ़ी हैं। शाहरुख ने केवल भपंग ही नहीं बजाया, बल्कि मेवात की इस समृद्ध संस्कृति पर बकायदा Ph.D. (पीएचडी) भी की है। उनके छोटे बच्चे भी इस कला को सीख रहे हैं। लेकिन सवाल वही है कि क्या यह विरासत बिना सरकारी आर्थिक सहयोग के अगली पीढ़ी तक जिंदा रह पाएगी?
बहस: सम्मान से पेट नहीं भरता, पेंशन और नकद राशि क्यों है जरूरी?
गफरुद्दीन मेवाती ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए केंद्र और राजस्थान सरकार का आभार तो जताया, लेकिन साथ ही एक ऐसा कड़वा सच भी बयां कर दिया जिसे अक्सर दबा दिया जाता है।
उन्होंने मांग की है कि सरकार को पद्म पुरस्कार पाने वाले विशिष्ट नागरिकों को कम से कम अपनी आजीविका चलाने के लिए मासिक पेंशन की सुविधा देनी चाहिए या फिर पुरस्कार के साथ एक सम्मानजनक नकद राशि दी जानी चाहिए। इस मांग के पीछे के तर्क बेहद ठोस दिखते हैं।
अब पीपुल्स पद्म का दौर
आजीविका के लिए आज भी सरकारी दिहाड़ी का सहारा
यानी, जिसे देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिलने जा रहा है, वह बुढ़ापे में भी केवल इसलिए भाग-दौड़ कर रहा है ताकि घर का खर्च चल सके।
विरासत को जिंदा रखने का खर्च
गफरुद्दीन कहते हैं, सरकार को ऐसे कलाकारों के जीवन यापन का ध्यान रखना चाहिए, जिससे उनके बच्चों का लालन-पोषण हो सके और कला की विरासत जिंदा रहे।
क्या कहता है वर्तमान नियम?
विजेताओं को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर वाली एक सनद (प्रशस्ति पत्र) और एक पदक मिलता है। रेलवे में कुछ रियायतें या सरकारी कार्यक्रमों में आमंत्रण जैसे प्रतीकात्मक लाभ जरूर मिलते हैं, लेकिन सीधे तौर पर कोई वित्तीय मदद नहीं होती।
हालांकि, कुछ राज्य सरकारें अपने स्तर पर पद्म विजेताओं को मासिक वित्तीय सहायता देती हैं। जैसे कुछ राज्यों में 10,000 रुपये मासिक पेंशन का प्रावधान है। लेकिन यह पूरे देश में समान रूप से लागू नहीं है और न ही यह राशि आज के दौर के हिसाब से पर्याप्त है।
सम्मान की गरिमा और सुरक्षा का संतुलन
गफरुद्दीन का कहना है कि यदि हम वाकई चाहते हैं कि भारत की पारंपरिक कलाएं और माटी की संस्कृति अगली पीढ़ी तक जिंदा रहे, तो हमें पद्मश्री को सिर्फ एक खोखला तमगा बनने से बचाना होगा।
सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले विजेताओं के लिए एक राष्ट्रीय पद्म पेंशन नीति बनाई जाए, ताकि देश का गौरव बढ़ाने वाले इन हाथों को कभी बुढ़ापे में तंगहाली का सामना न करना पड़े।
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