पिता-दादा के निधन के बाद 7 साल की भव्या ने निभाई पगड़ी रस्म, हर किसी की आंखे हुई नम

राजस्थान के जयपुर में फागी क्षेत्र का रामचन्द्रपुरा गांव। सात साल की भव्या चौधरी को दादा के निधन के बाद पगड़ी पहनाई गई। यानी इस मासूम को परिवार का मुखिया माना गया हैं।

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Ashish Bhardwaj
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Photograph: (the sootr)

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News In Short 

  • जयपुर के फागी क्षेत्र में 7 साल की भव्या ने पगड़ी रस्म निभाई।
  • पिता और दादा के निधन के बाद भव्या ने पारंपरिक जिम्मेदारी संभाली।
  • पगड़ी रस्म के दौरान सैकड़ों ग्रामीण और रिश्तेदार मौजूद रहे।
  • भव्या का धैर्य और साहस देखकर हर किसी की आंखें नम हो गईं।
  • यह रस्म बदलते समय में बेटियों की बढ़ती भूमिका का उदाहरण बनी।

News In Detail

राजस्थान की परंपराओं में पगड़ी रस्म का विशेष महत्व है। जयपुर जिले के फागी क्षेत्र में रामचन्द्रपुरा गांव की 7 वर्षीय भव्या चौधरी ने इस परंपरा को निभाकर समाज को भावुक कर दिया। भव्या के पिता राजस्थान पुलिस में कार्यरत थे। साल 2018 में ड्यूटी के दौरान उनका निधन हो गया था। इस कठिन समय में भव्या के दादा ने परिवार की देखभाल की लेकिन इसी महीने उनका भी स्वर्गवास हो गया। इस पर भव्या को पगड़ी पहनाई गई। 

पिता का ड्यूटी के दौरान हुआ था निधन 

भव्या के पिता हनुमान सहाय राजस्थान पुलिस  में कार्यरत थे। वर्ष 2018 में ड्यूटी के दौरान उनका असामयिक निधन हो गया। यह घटना पूरे परिवार के लिए गहरा सदमा थी। उस समय भव्या के दादा ने परिवार को संभाला और आगे बढ़ने का हौसला दिया।

दादा भी इस माह चल बसें

इसी महीने भव्या के दादा भी साथ छोड़ गए  परिवार पर एक बार फिर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर में कोई बड़ा पुरुष सदस्य न होने के कारण उनके निधन पर पगड़ी रस्म को लेकर चर्चा शुरू हुई। इसी बीच भव्या ने परंपरा निभाने का साहसिक कदम उठाया।

भव्या ने निभाई पगड़ी रस्म 

अंतिम संस्कार से लेकर पगड़ी रस्म तक भव्या की मौजूदगी सभी के लिए भावुक क्षण रही। पगड़ी पहनते समय उसका संयम और गंभीरता लोगों को भीतर तक छू गई। रस्म के दौरान सैकड़ों ग्रामीण और रिश्तेदार मौजूद रहे। हर किसी की आंखें नम थीं और भव्या के साहस की सराहना की गई।

पगड़ी रस्म का सामाजिक महत्व 

राजस्थान में पगड़ी केवल कपड़ा नहीं, बल्कि परिवार की प्रतिष्ठा और स्वाभिमान का प्रतीक मानी जाती है। पगड़ी पहनने वाला व्यक्ति परिवार की जिम्मेदारियों को संभालने का संकल्प लेता है। परंपरागत रूप से यह रस्म परिवार के मुखिया के निधन के बाद उत्तराधिकारी को सौंपने का माध्यम होती है।

बदलते समय में बदलती परंपराएं 

आमतौर पर पगड़ी रस्म पुरुष उत्तराधिकारी निभाते आए हैं। लेकिन समय के साथ यह परंपरा भी बदलाव की मिसाल बन रही है। अब बेटियां भी आगे आकर सामाजिक और पारिवारिक रस्में निभा रही हैं। भव्या की यह पहल इसी बदलाव का सशक्त उदाहरण है।

कैसे होती है पगड़ी रस्म 

पगड़ी रस्म आमतौर पर अंतिम संस्कार के चौथे दिन या तेहरवीं पर होती है। समाज और रिश्तेदारों की मौजूदगी में बड़े-बुजुर्ग उत्तराधिकारी के सिर पर पगड़ी बांधते हैं। तिलक लगाकर उसे परिवार का नया संरक्षक स्वीकार किया जाता है। यह रस्म जिम्मेदारी और सम्मान का प्रतीक मानी जाती है।

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