वैलेंटाइन डे स्पेशल:  दिल्ली की 'मल्लिका' और टोंक की गुमनाम मजार...क्या यहां दफन है रजिया-याकूत का इश्क?

इस वैलेंटाइन डे पर हम आपको रूबरू करवा रहे हैं राजस्थान में टोंक जिले के उस दावे से, जो रजिया सुल्तान और और उनके गुलाम जमालुद्दीन याकूत के प्रेम को एक नया और भावुक मोड़ देता है।

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Purshottam Kumar Joshi
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rajiya tonk

Photograph: (the sootr)

News in Short

  • नवाबी नगरी टोंक जिले के इतिहास में एक नई प्रेम कहानी जुड़ी, रजिया सुल्तान और गुलाम याकूत के बीच की मोहब्बत पर आधारित।

  • टोंक में स्थित एक शाही चबूतरे पर रजिया सुल्तान और याकूत की मजारें बनी हुई हैं।

  • इतिहासकारों का मानना है कि ये मजारें रजिया और याकूत की हैं, जिनकी मोहब्बत को कभी समाज ने स्वीकार नहीं किया।

  • बॉलीवुड के फिल्मकार कमाल अमरोही ने अपनी फिल्म 'रजिया सुल्तान' में इस प्रेम कहानी को दिखाया था।

  • टोंक मजारें: हालांकि मजारों का संरक्षण नहीं हुआ, और यह ऐतिहासिक धरोहर अब उपेक्षा का शिकार हो रही है।

News in Detail

इतिहास की किताबों में जब भी दिल्ली सल्तनत का जिक्र होता है, तो 'रजिया सुल्तान' का नाम एक ऐसी वीरांगना के रूप में उभरता है, जिसने पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती दी। लेकिन रजिया की बहादुरी के किस्सों के समानांतर एक और दास्तां चलती है-एक 'रानी' और उसके 'गुलाम' की मोहब्बत की दास्तां। यहां हम जिक्र कर रहे हैं, रजिया सुल्तान और उनके गुलाम जमालुद्दीन याकूत की लवस्टोरी की, जो टोंक में आज भी सुनने को मिल जाती है।  

​कैथल की हार और राजस्थान का वो सफर

​इतिहास की आधिकारिक किताबों के अनुसार, रजिया सुल्तान की मृत्यु 1240 ईस्वी में हरियाणा के कैथल के पास हुई थी। लेकिन टोंक के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. सादिक अली की रिसर्च एक अलग ही कहानी बयां करती है। उनके अनुसार, कैथल की लड़ाई में अपने ही भाइयों से पराजित होने के बाद रजिया सुल्तान ने राजस्थान की ओर रुख किया था।
दावा किया जाता है कि रजिया और उनके वफादार सिपहसालार (और कथित प्रेमी) याकूत ने भागकर टोंक की पहाड़ियों में शरण ली थी। यहां मौजूद अल्तमश की मस्जिद (रजिया के पिता इल्तुतमिश द्वारा निर्मित) इस बात का पुख्ता प्रमाण मानी जाती है कि इस क्षेत्र से गुलाम वंश का गहरा नाता था।

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​एक ही चबूतरे पर दो मजारें: मौत के बाद का मिलन?

​पुराने टोंक के 'रजिया की छतरी' इलाके में दरियाशाह की बावड़ी के पास एक 20×20 का शाही चबूतरा आज भी मौजूद है। इस चबूतरे पर दो मजारें पास-पास बनी हुई हैं। डॉ. सादिक अली और स्थानीय निवासियों का मानना है कि ये मजारें रजिया सुल्तान और याकूत की ही हैं।
​इन मजारों पर बने शाही निशान और पत्थरों को जोड़कर कैलीग्राफी में लिखे गए सांकेतिक नाम इस दावे को मजबूती देते हैं। यह महज इत्तेफाक नहीं हो सकता कि एक ही चबूतरे पर दो ऐसी शख्सियतें दफन हों जिनका जिक्र इतिहास में हमेशा साथ आता है।
 ​इतिहासकारों का कहना है कि यदि यह सच है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि जिस समाज ने उन्हें जीते जी एक नहीं होने दिया, शायद मौत ने उन्हें हमेशा के लिए एक-दूसरे के करीब सुला दिया।

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​कमाल अमरोही और 'रजिया सुल्तान' का टोंक कनेक्शन​

इस प्रेम कहानी की कशिश इतनी गहरी थी कि बॉलीवुड के दिग्गज फिल्मकार कमाल अमरोही भी टोंक खिंचे चले आए थे। उन्होंने अपनी भव्य फिल्म 'रजिया सुल्तान' (हेमा मालिनी और धर्मेंद्र ने मुख्य भूमिका निभाई थी) के कई महत्वपूर्ण दृश्यों को यहीं फिल्माया था। फिल्म में रजिया और याकूत के उस अलौकिक प्रेम को दिखाया गया था। इसकी गूंज आज भी टोंक की गलियों में सुनाई देती है।

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​उपेक्षा के साये में 'सोने की चिड़िया' का इतिहास​

विडंबना देखिए कि जिस प्रेम कहानी पर फिल्में बनीं और जिस शासिका ने दिल्ली के तख्त पर बैठकर इतिहास रचा, उसकी तथाकथित मजार आज बदहाली का शिकार है। न तो पुरातत्व विभाग (ASI) और न ही जिला प्रशासन ने इन साक्ष्यों को सहेजने की जहमत उठाई।​

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स्थानीय साहित्यकारों का कहना है कि राजस्थान पर्यटन की दृष्टि से दुनिया के नक्शे पर चमकता है, लेकिन टोंक की यह ऐतिहासिक धरोहर उपेक्षा के कारण दम तोड़ रही है। लंदन के म्यूजियम में मौजूद कुछ साक्ष्य भी इस बात की ओर इशारा करते हैं कि रजिया की असली मजार टोंक में हो सकती है, लेकिन धरातल पर संरक्षण के नाम पर सन्नाटा पसरा है।

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Photograph: (the sootr)

​क्या प्रेम का दूसरा नाम अमर होना ही है?​

आज जब दुनिया वैलेंटाइन डे मना रही है, टोंक की ये खामोश मजारें एक सवाल पूछती हैं-क्या रजिया और याकूत का रिश्ता सिर्फ एक सुल्तान और उसके वफादार गुलाम का था, या फिर यह उस रूहानी मोहब्बत की दास्तां थी जिसने सल्तनत की दीवारों को छोटा कर दिया था?​

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Photograph: (the sootr)

टोंक की जनता के लिए रजिया और याकूत आज भी यहाँ की हवाओं में जिंदा हैं। भले ही इतिहास के पन्नों में उनकी मौत का स्थान विवादित हो, लेकिन यहाँ की मिट्टी और पहाड़ियां चीख-चीख कर कहती हैं कि दिल्ली की पहली महिला शासिका ने अपनी आखिरी सांसें शायद इसी नवाबों के शहर में ली थीं।

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