कैदी की मौत पर हाई कोर्ट ने उठाए सवाल, कहा-जेल में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर नहीं मूंद सकते आंखें

Mukesh Sharma | Jan 09, 2026, 20:47 IST
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high court
Photograph: (the sootr)

राजस्थान हाई कोर्ट ने जेल में एक कैदी की मौत के मामले में कड़ी टिप्पणी की। उसने कहा कि जेल में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर बेपरवाह नहीं रह सकते। कोर्ट ने इस मामले की 15 दिन में जांच पूरी करने के निर्देश भी दिए।

जयपुर। राजस्थान हाई कोर्ट ने जेल में एक कैदी की मौतके मामले में कहा है कि जेल में आए दिन आने वाली भ्रष्टाचार की शिकायतों से आंखें नहीं मूंदी जा सकती। जेल में पैसे लेकर हथियार से लेकर ड्रग्स व मोबाइल फोन तक मिलते है। इस इस कारण जेल में बंद कैदी विशेषकर नौजवान जेल से ही आपराधिक गतिविधियां चलाते है।

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अदालतों को दिखानी होगी संवेदनशीलता

जस्टिस फरजंद अली ने एक आपराधिक याचिका की सुनवाई में कहा है कि हिरासत में मौत सीधे तौर पर जीवन जीने के अधिकार के संविधानिक अधिकार का हनन है। मानव जीवन पवित्र है। संविधानिक अदालतों को ऐसे मामलों में अत्यधिक संवेदशीलतात्र व मुस्तैदी दिखानी चाहिए।

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जांच में देरी,आमजन का न्याय विश्वास खत्म

कोर्ट ने कहा है कि लगातार यह देखने में आया है कि जांच में देरी के कारण या तो सबूतों में गड़बड़ी हो जाती है या वे गायब हो जाते हैं। घटना के तत्काल बाद एकत्रित सबूतों के मुकाबले देरी से एकत्रित सबूतों में बहुत ज्यादा फर्क होता है। जांच में देरी ना केवल सच्चाई का पता करने की प्रक्रिया में रुकावट पैदा करती है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में आमजन के विश्चास को भी खत्म करती है।

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पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हुआ खुलासा ..

एक कैदी न्यायिक हिरासत में जोधपुर जेल में बंद था। जेल में ही उसके साथ मारपीट की गई और हालत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया गया। उसे मृत अवस्था में अस्पताल लाना बताया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसके साथ मारपीट के कारण कई चोट होना पाया गया।
मृतक कैदी के परिजन लीला ने न्यायिक जांच की मांग के लिए अदालत की शरण ली थी। कोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर पाया कि मृतक के शरीर पर मौत से 6 घंटे पहले की चोट मौजूद थी। पोस्टमोर्टम रिपोर्ट में डॉक्टर ने भी चोटों को मौत से पहले की बताया और इस दौरान व जेल प्रशासन की निगरानी में जेल में था।

जिम्मेदारी से नहीं बच सकते जेल अधीक्षक... कैदी की मौत पर हाई कोर्ट ने उठाए सवाल: हाईकोर्ट ने कहा है कि जेल अधीक्षक जेल में बंद कैदियों का वैधानिक संरक्षक होता है। वह कैदी को लगी चोटों और इसके कारण हुई मौत की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। अदालत ने जोधपुर सेंट्रल जेल अधीक्षक, जेलर और संबंधित पुलिस अधीक्षक को अलग-अलग हलफनामा देकर हिरासत में रहते हुए मृतक को चोट लगने पर सफाई देने केा कहा है।
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अवैध वसूली के गंभीर आरोप

इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से कुछ स्क्रीनशॉट पेश कर बताया कि उनमें लेन-देन के स्पष्ट सबूत है। आरोप है कि जेल अधिकारियों ने मृतक की सुरक्षा के नाम पर परिजनों से अवैध धन की मांग की थी।

15 दिन में जांच पूरी करने के निर्देश....

अदालत ने मामले की जांच कर रहे एसीजेएम को 15 दिन बाकी कामों को रोककर प्राथमिकता से जांच पूरी कर रिपेार्ट देने को कहा है। इसके साथ ही अदालत ने डीजे जोधपुर मेट्रो को भी जांच करने वाले जांच कर रहे अधिकारी को सहयोग देने को कहा है। मामले में अगली सुनवाई 23 जनवरी को होगी।

मुख्य बिंदू :

  • हाईकोर्ट ने जेलों में भ्रष्टाचार की बढ़ती शिकायतों पर चिंता जताई और कहा कि जेल में अवैध रूप से हथियार, ड्रग्स और मोबाइल फोन मिलते हैं, जिससे बंद कैदी आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं।
  • हाईकोर्ट ने इस मामले में जेल प्रशासन की जवाबदेही तय की और कहा कि जांच में देरी से साक्ष्य गायब हो सकते हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास घटता है। कोर्ट ने 15 दिनों में जांच पूरी करने के आदेश दिए हैं।
  • पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि मृतक को मारपीट के कारण चोटें आई थीं, जो मौत से छह घंटे पहले की थीं। यह घटना जेल प्रशासन की निगरानी में हुई थी।
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