आखिर किसकी शह पर 'बेबस' हो रही जनता, अल्ट्राटेक प्लांट के खिलाफ 1160 दिन से आंदोलन पर बैठे गांव वाले
The Sootr | Mar 02, 2026, 15:26 IST
Photograph: (the sootr)
लोकतंत्र में सरकारें जनता के हित और पर्यावरण की रक्षा की शपथ लेकर सत्ता में आती हैं, लेकिन राजस्थान में इसका उल्टा हो रहा है। एनजीटी के एक के बाद एक सख्त आदेश कागजों तक सीमित होकर रह गए हैं।
News In Short
- राजस्थान में एनजीटी के आए सख्त आदेश कागजों तक हो रहे सीमित।
- अल्ट्राटेक सीमेंट के खिलाफ 1160 दिन से आंदोलन पर बैठे ग्रामीण।
- एनजीटी ने अल्ट्राटेक के खिलाफ दिया आदेश, पर हो कुछ नहीं रहा।
- सीमेंट प्लांट की ब्लॉस्टिंग ने आसपास के ग्रामीणों का छीना सुख-चैन
- अन्य मामलों में भी एनजीटी के आदेश नहीं कर पाए कमाल।
News In Detail
राजस्थान में जल, जमीन और जंगल बचाने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) एक के बाद एक कड़े फैसले सुना रहा है, लेकिन विडंबना देखिए कि जंग खा चुकी सरकारी मशीनरी और रसूखदार लोगों के गठजोड़ के आगे ये आदेश दम तोड़ रहे हैं।
कोटपूतली से लेकर भीलवाड़ा और अजमेर से लेकर अलवर तक प्रदेश की आबोहवा प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ रही है। हालात ये हैं कि एनजीटी के स्पष्ट आदेशों के बावजूद जनता को उन्हें लागू करवाने के लिए हजारों दिनों तक धरने पर बैठना पड़ रहा है।
अल्ट्राटेक प्लांट पर 1160 दिन से धरना
ट्रिब्यूनल ने साफ कहा था कि आबादी, स्कूल और मंदिर से 500 मीटर के दायरे में ब्लास्टिंग बंद हो। प्रभावित ग्रामीणों के स्वास्थ्य और घरों की क्षति के लिए मुआवजा (50,000 और 20,000 रुपये) दिया जाए। 6 महीने के भीतर इलाके को 'ग्रीन बेल्ट' में बदला जाए।
लेकिन, एनजीटी के आदेश के तीन महीने बीत जाने के बाद भी धरातल पर कुछ नहीं बदला है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन कंपनी के दबाव में है। पुलिस के आश्वासनों के बावजूद ब्लास्टिंग जारी है। सवाल उठाया जा रहा है कि क्या एक कंपनी का मुनाफा हजारों ग्रामीणों की सांसों से ज्यादा कीमती है
भूजल पर डाका, फिर भी कलेक्टरों पर असर नहीं
एक अनुमान के अनुसार इन ट्यूबवेलों से प्रतिदिन 6.90 करोड़ लीटर पानी का दोहन हो रहा है। सरकार को 1400 करोड़ रुपये से अधिक की राजस्व हानि हो रही है। एनजीटी ने बीकानेर के ताहिर हुसैन की याचिका पर सख्त नाराजगी जताते हुए 17 जिलों के कलेक्टरों को व्यक्तिगत शपथ पत्र पेश करने का नोटिस दिया है। जब कानून के रखवाले ही बिना अनुमति के धरती का सीना चीरने की छूट दे दें, तो आम आदमी से नियम पालन की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
विकास के नाम पर 'हरियाली' की बलि
इसी तरह चित्तौड़गढ़ के बड़ा मगरा-गंगरार आरक्षित वन क्षेत्र में रेड कैटेगरी के उद्योगों (ईशान कॉपर इंडस्ट्रीज) की अवैध स्थापना और अलवर में वन भूमि के भीतर अवैध खनन यह बताने के लिए काफी है कि वन विभाग और खनन माफिया के बीच की साठगांठ कितनी गहरी है।
चित्तौड़गढ़ किला और खारी नदी का दम घुटता दम
वहीं केकड़ी जिले की खारी नदी का हाल और भी बुरा है। सैटेलाइट तस्वीरों ने साफ कर दिया है कि खनन पट्टों के कारण नदी का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध हो गया है। एनजीटी ने अधिकारियों की रिपोर्टों पर गहरा असंतोष जताते हुए पूछा है कि आखिर नदी के रास्ते से अवरोध क्यों नहीं हटाए गए?
अजमेर का 'सेवन वंडर्स'
एनजीटी के आदेश बेअसर क्यों
प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी: स्थानीय प्रशासन अक्सर बड़े औद्योगिक घरानों और खनन माफियाओं के प्रभाव में रहता है।
कानूनी दांव-पेच: जब भी एनजीटी भारी जुर्माना लगाती है, सरकार या कंपनियां सुप्रीम कोर्ट से 'स्टे' ले आती हैं, जिससे मामला सालों तक लटक जाता है।
निगरानी तंत्र का फेल होना: प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और वन विभाग केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित रह गए हैं।
प्राथमिकताओं का टकराव: सरकारें पर्यावरण संरक्षण के बजाय औद्योगिक विकास को तरजीह देती हैं, भले ही उसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़े।
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