मुश्किल में पूर्व आईएएस सुबोध अग्रवाल, ऐन वक्त पर वकील ने छोड़ा साथ, अब टिकी हैं सबकी निगाहें

Ashish Bhardwaj | Feb 23, 2026, 14:15 IST
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subodh agarwal
Photograph: (the sootr)

राजस्थान के जल जीवन मिशन घोटाले में पूर्व आईएएस सुबोध अग्रवाल बेहद कठिन दौर से गुजर रहे हैं। गिरफ्तारी से बचने के लिए हाई कोर्ट में लगाई याचिका में उनके वकील ने खुद को अलग कर लिया है। अब उन्हें नया एडवोकेट तलाशना होगा।

News In Short

  • जल जीवन मिशन घोटाले में पूर्व आईएएस सुबोध अग्रवाल को वकील ने साथ छोड़ा।
  • सुबोध ने एफआईआर रद्द करने के लिए राजस्थान हाई कोर्ट में लगाई थी याचिका।
  • सुबोध अग्रवाल के वकील दीपक चौहान ने वकालतनामा वापस लेने का दिया आवेदन।
  • जब तक नया वकील नहीं होगा, तब तक हाई कोर्ट में सुनवाई नहीं।
  • सुबोध अग्रवाल ने अपनी याचिका में सीएस सुंधाश पंत पर लगाए हैं गंभीर आरोप।

News In Detail

Jaipur: राजस्थान के चर्चित जल जीवन मिशन घोटाला(जेजेएस) में फंसे पूर्व सीनियर आईएएस अधिकारी सुबोध अग्रवाल की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। एक ओर जहां एसीबी उनकी सरगर्मी से तलाश कर रही है, वहीं दूसरी ओर कानूनी मोर्चे पर उन्हें बड़ा झटका लगा है। सुबोध अग्रवाल के वकील दीपक चौहान ने इस हाई-प्रोफाइल केस से खुद को अलग कर लिया है।

​सुनवाई से ठीक पहले वकील ने खींचे हाथ
पीएचईडी के अतिरिक्त मुख्य सचिव सुबोध अग्रवाल की ओर से वकील दीपक चौहान ने 19 फरवरी को राजस्थान हाई कोर्ट में एसीबी द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका दायर की थी। उम्मीद की जा रही थी कि इस सप्ताह याचिका पर सुनवाई हो सकती है और अग्रवाल को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन, 21 फरवरी को अचानक वकील दीपक चौहान ने अपना वकालतनामा वापस लेने का प्रार्थना-पत्र पेश कर सबको चौंका दिया।

नियमानुसार जब तक नया वकालतनामा पेश नहीं होता, तब तक यह केस सुनवाई के लिए लिस्ट नहीं हो सकेगा। कानूनी जानकारों का मानना है कि ऐन वक्त पर वकील का हटना सुबोध अग्रवाल के लिए रणनीतिक और कानूनी तौर पर एक बड़ी बाधा साबित हो सकता है।

लुकआउट नोटिस और एसीबी की घेराबंदी

सुबोध अग्रवाल के खिलाफ 18 फरवरी को लुकआउट नोटिस जारी किया जा चुका है। यह कदम इसलिए उठाया गया, जिससे वे देश छोड़कर बाहर न जा सकें। एसीबी की टीमें लगातार उनके ठिकानों पर दबिश दे रही हैं, लेकिन फिलहाल वे जांच एजेंसी की पहुंच से दूर हैं।

​याचिका में सीएस सुधांश पंत पर लगाए आरोप

रिटायर्ड आईएएस सुबोध अग्रवाल ने अपनी याचिका में बचाव के लिए बेहद गंभीर तर्क दिए थे। याचिका के अनुसार:

​टेंडर की टाइमिंग: सुबोध अग्रवाल का तर्क है कि पीएचईडी में उनका कार्यकाल 18 अप्रैल 2022 से शुरू हुआ था, जबकि आरोपी फर्मों (गणपति ट्यूबवेल और श्याम ट्यूबवेल) ने फर्जी प्रमाण-पत्रों के आधार पर उनसे पहले ही टेंडर हासिल कर लिए थे।
​
95% स्वीकृतियां पूर्ववर्ती कार्यकाल में: याचिका में सीधा दावा किया गया है कि आरोपी फर्मों को दिए गए 95 प्रतिशत वर्कऑर्डर तत्कालीन एसीएस सुधांश पंत की अध्यक्षता वाली वित्त समिति ने मंजूर किए थे।

​एसीबी की जांच पर सवाल: सुबोध अग्रवाल ने आरोप लगाया कि उनके कार्यकाल में केवल 10 फीसदी से भी कम मूल्य के टेंडर स्वीकृत हुए, लेकिन एसीबी ने मुख्य सचिव सुधांश पंत के कार्यकाल की जांच करने के बजाय उन्हें निशाना बनाया

बचाव में तर्क, मैंने तो ब्लैकलिस्ट किया

सुबोध अग्रवाल ने अपनी याचिका में खुद को 'व्हिसलब्लोअर' के रूप में पेश करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि उनकी अध्यक्षता वाली कमेटी ने इन फर्मों को एक भी रुपया भुगतान नहीं किया, जिससे सरकार को कोई आर्थिक हानि नहीं हुई। जैसे ही इरकॉन (IRCON) से ईमेल के जरिए फर्जीवाड़े की सूचना मिली, उन्होंने तुरंत हाईलेवल कमेटी गठित की और दोनों फर्मों को ब्लैकलिस्ट कर दिया।

​अधिकारी विशाल सक्सेना से 'पुरानी रंजिश' का दावा

​एसीबी की कार्रवाई मुख्य रूप से अधिकारी विशाल सक्सेना के बयानों पर टिकी है। इस पर आईएएस सुबोध अग्रवाल का कहना है कि उन्होंने खुद विशाल सक्सेना के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। इसके कारण वह उनसे ईर्ष्या रखता है और झूठे बयान दे रहा है।

अब ​आगे क्या

​वकील के हटने के बाद अब सुबोध अग्रवाल को जल्द से जल्द नया एडवोकेट ढूंढना होगा। यदि वे समय पर कोर्ट में पैरवी नहीं कर पाते हैं, तो एसीबी की गिरफ्तारी की तलवार उन पर और मजबूती से लटक सकती है। राजस्थान की राजनीति व प्रशासनिक गलियारों में इस ब्यूरोक्रेटिक वार ने हलचल मचा दी है, क्योंकि इसमें राज्य के दो सबसे कद्दावर अधिकारियों के कार्यकालों की तुलना की जा रही है।

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