राजस्थान में जीतकर भी क्यों हार गई भाजपा, दस में से चार निगमों में ही बहुमत
The Sootr | Sept 15, 2026, 13:08 IST
राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा
राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा को कांग्रेस पर महज 576 वार्ड की बढ़त मिली। सीएम के गृह जिले सहित कई गढ़ में पार्टी कमजोर दिखी, जिसे वार्निंग अलार्म माना जा रहा है।
राजस्थान के निकाय चुनावों के नतीजे देखने में भले ही सत्ताधारी पार्टी को आगे बताते हैं, लेकिन इन आंकड़ों में छिपी चेतावनी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ही नहीं, भाजपा के आलाकमान से जुड़े कई नेताओं की नींद उड़ा रखी है। भाजपा ने इन चुनावों को अपनी मूंछ का सवाल बना रखा था।
यहां तक कि चुनाव की जिम्मेदारी के लिए राष्ट्रीय नेताओं व अन्य राज्यों के मंत्रियों व विधायकों को सौंपी गई। राष्ट्रीय महामंत्री बीएल संतोष को जयपुर आकर चुनावी तैयारियों के खाता बही सम्भालने पड़े, फिर भी प्रदेश के सभी 309 निकायों के 10,245 वार्डों में से भाजपा सत्ता में होने के बावजूद विपक्षी दल कांग्रेस पर महज 576 वार्डों की बढ़त बना सकी।
आमतौर पर राजस्थान ही नहीं, अन्य राज्यों में भी यही होता आया है कि जिस पार्टी की सरकार होती है, स्थानीय निकायों में लोग उसके साथ ही जाना पसंद करते हैं, लेकिन यह सम्भवतः पहली बार ही हुआ है कि इन चुनावों में भाजपा इस परिपाटी को बरकरार नहीं रख पाई। वैसे भी राजस्थान में पहली बार के विधायक और आलाकमान की मर्जी से मुख्यमंत्री बने भजनलाल शर्मा की सरकार आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है।
ऐसे में इन निकाय चुनावों को साल 2028 में होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल माना गया था। पार्टी ने तैयारी भी उसी हिसाब से की, लेकिन नतीजे आए तो पार्टी जीतकर भी हारी हुई नजर आई। इन चुनावों में भाजपा को 4,177, कांग्रेस को 3,604 और 2,273 वार्डों में निर्दलीय व 190 वार्डों में अन्य दलों को जीत हासिल हुई। निर्दलीयों में अधिकांश कांग्रेस व भाजपा के बागी हैं।
ये आंकड़ा इस बात को समझने के लिए काफी है कि शहरी क्षेत्रों में प्रभावी मानी जाने वाली भाजपा का जनाधार खिसका है। सरकार के लगभग आधे कार्यकाल के बाद निकाय चुनाव पहली बड़ी शहरी परीक्षा थे और इसमें भाजपा ‘बाय ग्रेस’ (अनुकंपा अंकों) से उत्तीर्ण हुई है।
हालात तो ऐसे सामने आए कि मुख्यमंत्री भजनलाल के गृह जिले भरतपुर में भाजपा अपना बोर्ड बनाना तो दूर निर्दलीयों से आधी सीटें भी नहीं ला सकी। भरतपुर नगर निगम के 65 वार्डों में से 36 में तो अकेले निर्दलीय जीते हैं। भाजपा को बीस और कांग्रेस को सात सीटें ही हासिल हो सकी। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के गढ़ कहे जाने वाले झालावाड़ में तो कांग्रेस ने नगर परिषद के 45 वार्डों में से 29 वार्ड जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया।
वहां भाजपा 13 सीटें ही जीत सकी। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह नगर पाली के नगर निगम में निर्दलीयों की मदद से कांग्रेस बोर्ड बनाने की स्थिति में हैं। पाली नगर निगम में कांग्रेस को 29, भाजपा को 21 और 15 निर्दलीय जीते हैं। केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के क्षेत्र बीकानेर में कांग्रेस 42 सीट जीतकर नगर निगम पर काबिज हो गई। भाजपा को मात्र 27 सीटें मिल सकी।
जोधपुर में केंद्रीय मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत ने लगातार करीब एक हफ्ते कम्पेनिंग की, लेकिन उनके खुद के वार्ड से भाजपा हार गई। इसी वार्ड में शेखावत के साथ भाजपा से राज्यसभा सांसद रहे राजेंद्र गहलोत का वोट भी लगता है। जोधपुर निगम के 100 वार्डों भाजपा-कांग्रेस ने 44-44 वार्ड जीते, लेकिन बोर्ड का दारोमदार 10 निर्दलीयों व एक अन्य पर जा टिका। इनमें भी कांग्रेस से बगावत करने वाले निर्दलीय ज्यादा हैं। यानी यहां भी पार्टी की उम्मीदें धूल-धुसरित ही हुई हैं। केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री भागीरथ चौधरी व विधानसभाध्यक्ष वासुदेव देवनानी के गृह जिले अजमेर में कांग्रेस 36 साल बाद बोर्ड बनाएगी।
वहां कांग्रेस 80 में से 37 सीटें जीतकर बहुमत के नजदीक पहुंच गई। अलवर में भी कांटे की टक्कर हुई है। वहां 65 सदस्यीय नगर निगम में किसी को भी बहुमत नहीं मिल सका। भाजपा 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन कांग्रेस के 23 व 11 निर्दलीय व अन्य उसके सामने बाधा बने हुए हैं।
भाजपा को राज्य के 10 में से मात्र चार नगर निगमों में बहुमत मिल सका है। राजधानी जयपुर का निगम भाजपा का गढ़ रहा है, लेकिन वहां पार्टी 150 में से 78 सीटें जीतकर सामान्य बहुमत हासिल कर सकी। इसके बावजूद कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आई पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल चुनाव हार गई। कांग्रेस ने 53 सीटें जीतकर भाजपा को कड़ी चुनौती दी। उदयपुर, भीलवाड़ा और कोटा में भाजपा की जीत जरूर बड़ी रही है। बीकानेर में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। बाकी पांच निगमों में निर्दलीय निर्णाक होंगे और इनमें से भी पाली, जोधपुर, अजमेर में कांग्रेस और अलवर में बोर्ड बनाने के मामले में भाजपा अपर हैंड रह सकती है। भरतपुर में तो 65 में से 38 सीटें हासिल कर निर्दलीय ही बहुमत हासिल कर चुके।
नगर निगम ही नहीं, नगर पालिका व नगर परिषदों में भी भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। प्रदेश की 47 नगर परिषदों में से भाजपा ने 12, कांग्रेस ने 6 व अन्य ने 7 जगह कब्जा किया है, लेकिन 22 परिषदों में किसी को बहुमत नहीं मिला। भाजपा के गढ़ हाडौती के बारां में तो आम आदमी पार्टी ने अपना बोर्ड बनाकर सभी को चौंका दिया। इसी तरह 252 नगर पालिकाओं में भाजपा को 69, कांग्रेस को 37 व 26 में अन्य विजयी हुई है, लेकिन 120 में किसी को बहुमत नहीं मिल सका। कुल मिलाकर 140 से ज्यादा निकायों में भाजपा व कांग्रेस को अपने सियासी किले बनाने के लिए निर्दलीयों की चाबी पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
पहली नजर में देखें तो भाजपा को ज्यादा वार्डों व निकायों में जीत मिली है, लेकिन प्रेक्षक इन चुनाव नतीजों को भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव से पहले की वार्निंग अलार्म मानते हैं। भाजपा के नेता ऊपर से भले ही अपनी जीत को ऐतिहासिक और भजनलाल शर्मा सरकार के कामकाज पर मुहर मान रहे हैं, लेकिन अंदर ही अंदर इन नतीजों ने भाजपा को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है। कारण कि शहरों में हमेशा भाजपा की पकड़ रहती आई है और गांवों में उसे कांग्रेस की कड़ी चुनौती झेलनी पड़ती है। शहर के चुनावी नतीजे तो आशानुरूप नहीं रहे और अब इसी महीने से पंचायत चुनाव की तैयारी शुरू होनी है।
भाजपा की कोशिश थी कि निकाय चुनावों में बड़ी जीत हासिल कर ली जाए, ताकि इसे पंचायत चुनावों में भी भुनाया जा सके। इसके लिए ही पहली बार प्रदेश में पंचायत से पहले निकाय चुनाव करवाए गए। फिर भी पार नहीं पड़ी। दो साल बाद राजस्थान में विधानसभा चुनाव है। स्थानीय निकाय चुनाव इसी का लिटमस टेस्ट थे। ऐसे में कांग्रेस व अन्य विपक्षी लोग निकाय चुनाव के नतीजों को ही सत्ता विरोधी वोट मानकर चल पड़े हैं। कांग्रेस नेता कहते हैं कि पहली बार निकाय चुनाव में किसी मुख्यमंत्री को शहर शहर घूमना पड़ा, क्योंकि सरकार ने पौने तीन साल में कोई काम नहीं किया, जिसके बूते पार्टी मतदाताओं को लुभा सके। मुख्यमंत्री की सक्रियता के बावजूद यदि ये परिणाम आए हैं तो इसे क्यों नहीं सत्ता विरोधी वोट माना जाए।
अब सवाल आता है कि भाजपा जीतकर भी हारी क्यों? जवाब ढूंढे तो पता चलता है कि एक तो राज्य में निकाय चुनाव एक से डेढ़ साल की देरी से हुए। सरकार तो लगातार चुनाव टाल रही थी, लेकिन हाईकोर्ट के सख्त आदेश के बाद उसके पास कोई रास्ता नहीं बचा। इससे पहले कांग्रेस यह नैरेटिव बनाती रही कि सरकार हार के भय से चुनाव टालने के बहाने बना रही है। चुनाव करवाने की मांग को लेकर याचिका भी कांग्रेस के पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने ही हाईकोर्ट में डाली थी। चुनाव घोषित हुए तो कांग्रेस को यह कहने का मौका मिल गया कि सरकार को मजबूरी में चुनाव करवाने पड़ रहे हैं।
यह नैरेटिव भले ही चुनाव में नहीं चला, लेकिन हर जिले में टिकट वितरण को लेकर असंतोष भाजपा-कांग्रेस दोनों में ही दिखाई दिया। यह परिणामों में भी परिलक्षित हो गया, जब दो हजार से ज्यादा वार्ड निर्दलीय या बागी जीत ले गए। इससे भी अधिकांश स्थानों पर बहुमत नहीं मिल सका। कांग्रेस के लिए तो खोने को कुछ नहीं था, लेकिन भाजपा ने ज्यादा वार्ड जीतकर भी बहुत कुछ खोया है। भाजपा भले ही हारी नहीं हो, लेकिन उसे चैन की नींद सो जाने वाले परिणाम भी नहीं मिले हैं।
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यहां तक कि चुनाव की जिम्मेदारी के लिए राष्ट्रीय नेताओं व अन्य राज्यों के मंत्रियों व विधायकों को सौंपी गई। राष्ट्रीय महामंत्री बीएल संतोष को जयपुर आकर चुनावी तैयारियों के खाता बही सम्भालने पड़े, फिर भी प्रदेश के सभी 309 निकायों के 10,245 वार्डों में से भाजपा सत्ता में होने के बावजूद विपक्षी दल कांग्रेस पर महज 576 वार्डों की बढ़त बना सकी।
आमतौर पर राजस्थान ही नहीं, अन्य राज्यों में भी यही होता आया है कि जिस पार्टी की सरकार होती है, स्थानीय निकायों में लोग उसके साथ ही जाना पसंद करते हैं, लेकिन यह सम्भवतः पहली बार ही हुआ है कि इन चुनावों में भाजपा इस परिपाटी को बरकरार नहीं रख पाई। वैसे भी राजस्थान में पहली बार के विधायक और आलाकमान की मर्जी से मुख्यमंत्री बने भजनलाल शर्मा की सरकार आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है।
ऐसे में इन निकाय चुनावों को साल 2028 में होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल माना गया था। पार्टी ने तैयारी भी उसी हिसाब से की, लेकिन नतीजे आए तो पार्टी जीतकर भी हारी हुई नजर आई। इन चुनावों में भाजपा को 4,177, कांग्रेस को 3,604 और 2,273 वार्डों में निर्दलीय व 190 वार्डों में अन्य दलों को जीत हासिल हुई। निर्दलीयों में अधिकांश कांग्रेस व भाजपा के बागी हैं।
ये आंकड़ा इस बात को समझने के लिए काफी है कि शहरी क्षेत्रों में प्रभावी मानी जाने वाली भाजपा का जनाधार खिसका है। सरकार के लगभग आधे कार्यकाल के बाद निकाय चुनाव पहली बड़ी शहरी परीक्षा थे और इसमें भाजपा ‘बाय ग्रेस’ (अनुकंपा अंकों) से उत्तीर्ण हुई है।
बड़े नेता भी नहीं बचा सके गढ़
वहां भाजपा 13 सीटें ही जीत सकी। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह नगर पाली के नगर निगम में निर्दलीयों की मदद से कांग्रेस बोर्ड बनाने की स्थिति में हैं। पाली नगर निगम में कांग्रेस को 29, भाजपा को 21 और 15 निर्दलीय जीते हैं। केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के क्षेत्र बीकानेर में कांग्रेस 42 सीट जीतकर नगर निगम पर काबिज हो गई। भाजपा को मात्र 27 सीटें मिल सकी।
जोधपुर में केंद्रीय मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत ने लगातार करीब एक हफ्ते कम्पेनिंग की, लेकिन उनके खुद के वार्ड से भाजपा हार गई। इसी वार्ड में शेखावत के साथ भाजपा से राज्यसभा सांसद रहे राजेंद्र गहलोत का वोट भी लगता है। जोधपुर निगम के 100 वार्डों भाजपा-कांग्रेस ने 44-44 वार्ड जीते, लेकिन बोर्ड का दारोमदार 10 निर्दलीयों व एक अन्य पर जा टिका। इनमें भी कांग्रेस से बगावत करने वाले निर्दलीय ज्यादा हैं। यानी यहां भी पार्टी की उम्मीदें धूल-धुसरित ही हुई हैं। केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री भागीरथ चौधरी व विधानसभाध्यक्ष वासुदेव देवनानी के गृह जिले अजमेर में कांग्रेस 36 साल बाद बोर्ड बनाएगी।
वहां कांग्रेस 80 में से 37 सीटें जीतकर बहुमत के नजदीक पहुंच गई। अलवर में भी कांटे की टक्कर हुई है। वहां 65 सदस्यीय नगर निगम में किसी को भी बहुमत नहीं मिल सका। भाजपा 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन कांग्रेस के 23 व 11 निर्दलीय व अन्य उसके सामने बाधा बने हुए हैं।
दस में से मात्र चार में बहुमत
पालिका-परिषदों में भी मिली चुनौती
क्या ये सत्ता विरोधी वोट है
भाजपा की कोशिश थी कि निकाय चुनावों में बड़ी जीत हासिल कर ली जाए, ताकि इसे पंचायत चुनावों में भी भुनाया जा सके। इसके लिए ही पहली बार प्रदेश में पंचायत से पहले निकाय चुनाव करवाए गए। फिर भी पार नहीं पड़ी। दो साल बाद राजस्थान में विधानसभा चुनाव है। स्थानीय निकाय चुनाव इसी का लिटमस टेस्ट थे। ऐसे में कांग्रेस व अन्य विपक्षी लोग निकाय चुनाव के नतीजों को ही सत्ता विरोधी वोट मानकर चल पड़े हैं। कांग्रेस नेता कहते हैं कि पहली बार निकाय चुनाव में किसी मुख्यमंत्री को शहर शहर घूमना पड़ा, क्योंकि सरकार ने पौने तीन साल में कोई काम नहीं किया, जिसके बूते पार्टी मतदाताओं को लुभा सके। मुख्यमंत्री की सक्रियता के बावजूद यदि ये परिणाम आए हैं तो इसे क्यों नहीं सत्ता विरोधी वोट माना जाए।
ये भी रहा कारण
यह नैरेटिव भले ही चुनाव में नहीं चला, लेकिन हर जिले में टिकट वितरण को लेकर असंतोष भाजपा-कांग्रेस दोनों में ही दिखाई दिया। यह परिणामों में भी परिलक्षित हो गया, जब दो हजार से ज्यादा वार्ड निर्दलीय या बागी जीत ले गए। इससे भी अधिकांश स्थानों पर बहुमत नहीं मिल सका। कांग्रेस के लिए तो खोने को कुछ नहीं था, लेकिन भाजपा ने ज्यादा वार्ड जीतकर भी बहुत कुछ खोया है। भाजपा भले ही हारी नहीं हो, लेकिन उसे चैन की नींद सो जाने वाले परिणाम भी नहीं मिले हैं।
सुरेश व्यास, वरिष्ठ पत्रकार
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