SMS IPD टावर की मंजिलें बढ़ीं, डेडलाइन खिसकी; जनता की जेब पर 307 करोड़ का बोझ

Raghvendra Singh Rathore | Sept 24, 2026, 18:43 IST
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IPD टावर  का लंबा इंतजार
IPD टावर का लंबा इंतजार

मूल काम 456.80 करोड़ रुपए + जीएसटी में मिला था, बाद में वित्तीय प्रावधान 692.40 करोड़ और प्रशासनिक स्वीकृति 665 करोड़ तक पहुंची, 2026 में लागत फिर बढ़कर 764 करोड़ होने की जानकारी आई सामने

समझें क्या है पूरा मामला

  • नवंबर 2024 की डेडलाइन अब मार्च-अप्रैल 2027 तक पहुंच चुकी है।
  • मूल कार्यादेश 456.80 करोड़ रुपए प्लस जीएसटी में दिया गया था।
  • 2026 में परियोजना की लागत 764 करोड़ रुपए होने की जानकारी सामने आई।
  • डिजाइन बदलाव और निर्मित क्षेत्र बढ़ने से प्रोजेक्ट का दायरा भी बढ़ा।
  • निर्माण के साथ संचालन की टाइमलाइन भी अब अलग से बड़ा सवाल है।
जयपुर के एसएमएस अस्पताल का आईपीडी टावर अब सिर्फ एक निर्माणाधीन इमारत नहीं, बल्कि सरकारी प्लानिंग और सिस्टम की धीमी रफ्तार का सवाल बन चुका है। जिस टावर को नवंबर 2024 तक तैयार होना था, वह अब मार्च-अप्रैल 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है। यानी मरीजों के काम आने वाली सुविधा के लिए करीब ढाई साल का अतिरिक्त इंतजार।

और कहानी सिर्फ तारीख की नहीं है। प्रोजेक्ट का मूल कार्यादेश 456.80 करोड़ रुपए प्लस जीएसटी का था। 2026 तक इसकी लागत 764 करोड़ रुपए तक पहुंचने की जानकारी सामने आई। यानी इमारत की मंजिलें बढ़ीं तो सरकारी हिसाब-किताब भी चढ़ता चला गया।

डेडलाइन गई, लागत आई ऊपर

आईपीडी टावर का काम 30 मार्च 2022 को शुरू हुआ था। मूल अनुबंध के मुताबिक इसे 29 नवंबर 2024 तक पूरा किया जाना था। लेकिन तय समय सीमा निकल गई और टावर तैयार नहीं हुआ।

इसके बाद 2026 तक काम पूरा करने का लक्ष्य सामने आया। अब सितंबर 2026 में जेडीए अधिकारियों के मुताबिक निर्माण पूरा होने की नई समयसीमा मार्च-अप्रैल 2027 बताई जा रही है। यानी सरकारी प्रोजेक्ट की घड़ी में तारीखें बदलती रहीं, लेकिन मरीजों को मिलने वाली सुविधा अभी भी इंतजार में है।

डिजाइन बदला, दायरा बढ़ा, खर्च भी बढ़ गया

प्रोजेक्ट की लागत बढ़ने के पीछे डिजाइन में बदलाव, अतिरिक्त काम और निर्मित क्षेत्र बढ़ने जैसे कारण सामने आए हैं। शुरुआत में करीब 60 हजार वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र की योजना थी, जिसे बढ़ाकर करीब 87 हजार वर्गमीटर किया गया। बाद में तीन सर्विस फ्लोर भी जोड़े गए।

यहीं सवाल खड़ा होता है-इतने बड़े प्रोजेक्ट की शुरुआती योजना और लागत का आकलन कितना पुख्ता था? अगर निर्माण के दौरान इतने बड़े बदलाव करने पड़े, तो क्या शुरुआत में होमवर्क अधूरा था? सरकारी प्रोजेक्ट में डिजाइन बदले तो खर्च बढ़ता है और खर्च बढ़े तो आखिर जेब किसकी ढीली होती है? जवाब साफ है-जनता की।

456.80 करोड़ से 764 करोड़ तक का सफर

प्रोजेक्ट की शुरुआती वित्तीय तस्वीर और बाद के बदलावों में बड़ा अंतर दिखाई देता है।

चरणराशि
मूल कार्यादेश₹456.80 करोड़ + जीएसटी
शुरुआती वित्तीय प्रावधान₹400 करोड़
संशोधित वित्तीय प्रावधान₹588 करोड़
जुलाई 2023 का वित्तीय प्रावधान₹692.40 करोड़
संशोधित प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति₹665 करोड़
2026 में सामने आई नई लागत₹764 करोड़
यानी जिस प्रोजेक्ट का काम 456.80 करोड़ रुपए के कार्यादेश से शुरू हुआ था, उसका वित्तीय आकार अब 764 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। सवाल यही है कि बढ़ी हुई लागत में किस बदलाव पर कितना पैसा गया और इसकी जिम्मेदारी किसकी तय हुई?

पैसा भी पूरा समय पर नहीं आया

जेडीए के परियोजना दस्तावेज के मुताबिक 692.40 करोड़ रुपए के वित्तीय प्रावधान में अलग-अलग एजेंसियों की हिस्सेदारी तय थी।

एजेंसीतय हिस्साप्राप्त राशिबाकी
जयपुर स्मार्ट सिटी₹125 करोड़₹123 करोड़₹2 करोड़
चिकित्सा शिक्षा विभाग₹96 करोड़₹45.52 करोड़₹50.48 करोड़
राजस्थान हाउसिंग बोर्ड₹368.42 करोड़₹205 करोड़₹163.42 करोड़
जेडीए₹102.98 करोड़₹102.98 करोड़—
कुल₹692.40 करोड़₹476.50 करोड़₹215.90 करोड़
दस्तावेज के समय तक 215.90 करोड़ रुपए की राशि मिलना बाकी थी। यानी प्रोजेक्ट की रफ्तार के रास्ते में सिर्फ निर्माण और डिजाइन ही नहीं, फंडिंग का सवाल भी रहा।

काम बढ़ा, लेकिन टावर के साथ बाकी तैयारी भी जरूरी

परियोजना में दो बेसमेंट, ग्राउंड फ्लोर, 24 ऊपरी मंजिल और तीन सर्विस फ्लोर का प्रावधान है। टावर की प्रस्तावित ऊंचाई करीब 121 मीटर है। इसमें 1,200 से ज्यादा बेड, 20 ऑपरेशन थिएटर, 4 कैथ लैब, 100 ओपीडी पंजीकरण काउंटर, आईसीयू और सुपर स्पेशियलिटी सुविधाएं प्रस्तावित हैं। एयर एम्बुलेंस के लिए हेलीपैड भी योजना का हिस्सा है। लेकिन इतना बड़ा टावर सिर्फ सीमेंट, सरिया और कांच से अस्पताल नहीं बन जाता।

अगस्त 2026 की समीक्षा में चिकित्सा सुविधाओं के साथ मानव संसाधन, पार्किंग, ट्रैफिक व्यवस्था और पहुंच मार्ग जैसी तैयारियों पर भी ध्यान देने के निर्देश दिए गए। यानी इमारत खड़ी होने के बाद भी अस्पताल को मरीजों के लिए तैयार करने का अलग काम बाकी रहेगा।

24वीं मंजिल पर हेलीपैड, मंजूरी का इंतजार

टावर की छत पर एयर एम्बुलेंस के लिए हेलीपैड प्रस्तावित है। इसके लिए विमानन सुरक्षा से जुड़ी मंजूरियां जरूरी हैं। अगस्त 2026 में सामने आई जानकारी के मुताबिक 24वीं मंजिल पर करीब 2 हजार वर्गमीटर क्षेत्र में छत का काम हो चुका था और हेलीपैड के डिजाइन की मंजूरी की प्रक्रिया चल रही थी। यानी टावर की ऊंचाई जितनी बढ़ रही है, मंजूरियों की फाइल भी उतनी ही लंबी होती दिख रही है।

सरकार कोई भी हो, इंतजार मरीज का ही है

इस प्रोजेक्ट की घोषणा कांग्रेस सरकार के 2020-21 के बजट में हुई और मार्च 2022 में काम शुरू हुआ। नवंबर 2024 में इसे पूरा होना था, लेकिन डेडलाइन निकल गई। सत्ता बदली, सरकार बदली, प्रोजेक्ट की समीक्षा हुई और 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य सामने आया। अब वही लक्ष्य आगे खिसककर मार्च-अप्रैल 2027 तक पहुंच गया है। सरकार बदलने से फाइलों पर लगी तारीखें जरूर बदल सकती हैं, लेकिन मरीजों की जरूरत नहीं बदलती।

निर्माण मार्च 2027 में, अस्पताल कब चलेगा?

सबसे बड़ा सवाल अब यही है। सितंबर 2026 में निर्माण पूरा होने की नई समयसीमा मार्च-अप्रैल 2027 बताई गई है। वहीं अगस्त की उच्चस्तरीय समीक्षा से जुड़ी जानकारी में टावर के संचालन की टाइमलाइन दिसंबर 2027 बताई गई थी।

अगर निर्माण और संचालन की तारीखें अलग हैं, तो सरकार को साफ करना चाहिए कि मरीजों को आईपीडी टावर की सुविधा आखिर कब से मिलेगी। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि टावर कब बनेगा। सवाल यह है कि जिस अस्पताल के लिए जनता के करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं, उसमें मरीज कब भर्ती होगा?

अब हिसाब चाहिए

एसएमएस आईपीडी टावर की कहानी में तीन चीजें लगातार बदली हैं-डेडलाइन, लागत और प्रोजेक्ट का दायरा। 2022 में काम शुरू हुआ। 2024 में पूरा होना था। लक्ष्य 2026 तक पहुंचा और अब 2027 की बारी है। इसी दौरान लागत भी शुरुआती कार्यादेश से काफी ऊपर पहुंच गई।

अब सरकार को सिर्फ नई तारीख बताने के बजाय यह बताना चाहिए कि देरी क्यों हुई, लागत क्यों बढ़ी और मार्च-अप्रैल 2027 के बाद मरीजों को वास्तव में सुविधा कब मिलेगी। क्योंकि सरकारी प्रोजेक्ट की डेडलाइन भले कागज पर आगे बढ़ जाए, उसका बिल जनता के खाते में ही जुड़ता है।

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