जानें कौन है तगाराम भील, जिन्हें किया जा रहा है पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित

राजस्थान के तगाराम भील को 2026 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। थार की लोक कला और अलगोजा वादन के लिए प्रसिद्ध हैं यह राजस्थान की लोक संगीत धरोहर के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है

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Ashish Bhardwaj
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Photograph: (the sootr)

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News In Short 

  • तगाराम भील राजस्थान के प्रसिद्ध अलगोजा वादक को 2026 पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

  • तगाराम भील ने राजस्थानी लोक संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।

  • वे अब भी अपनी आजीविका खनन कार्य से कमाते हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके हैं।

  • तगाराम भील खुद अपने हाथों से अलगोजा तैयार करते हैं, जिनकी मांग देश-विदेश में है।

  • पद्मश्री सम्मान तगाराम भील की लोक कला की साधना और मरु अंचल की सांस्कृतिक पहचान की जीत है।

News In Detail

तगाराम भील मूल रूप से राजस्थान के जैसलमेर जिले के मूलसागर गांव के निवासी हैं। इन्होने 2026 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा ने मरु अंचल को गर्वित किया है। गणतंत्र दिवस  की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार द्वारा घोषित पद्म पुरस्कारों  की सूची में उनका नाम राजस्थान के लोक संगीत  के लिए ऐतिहासिक मील का पत्थर है। तगाराम भील को यह सम्मान उनके अलगोजा वादन में अतुलनीय योगदान के लिए मिला है। इन्होने थार के सुरों को सदियों पुरानी परंपरा के साथ राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

तगाराम भील की शुरुआत

62 वर्षीय तगाराम भील ने बचपन में अपने साधारण जीवन में भी संगीत के प्रति अपनी निष्ठा को कभी कम नहीं होने दिया। जब वे छोटे थे, तो अपने पिता के न होने पर वे अलगोजा पर अभ्यास करते थे। महज 10 वर्ष की उम्र में उन्होंने अलगोजा पर पकड़ बना ली थी और 11 वर्ष की आयु में पहला अलगोजा खरीदकर अपने संगीत यात्रा की शुरुआत की। 1981 में जैसलमेर के मरु महोत्सव में उनका मंचीय सफर शुरू हुआ, जो 1996 में फ्रांस तक पहुंचा।

वैश्विक स्तर पर लोक संगीत का प्रचार

तगाराम भील ने अमेरिका, रूस, जापान, अफ्रीका सहित 15 से अधिक देशों में राजस्थानी लोक संगीत  की प्रस्तुति दी। थार की सांस्कृतिक पहचान  को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया। इसके बावजूद, वे आज भी खनन कार्य  से अपनी आजीविका कमाते हैं ।उनके साधारण जीवन की मिसाल है।

अलगोजा वादन में उनका योगदान

तगाराम भील केवल एक उत्कृष्ट वादक ही नहीं, बल्कि एक कुशल शिल्पकार भी हैं। वे अपने हाथों से अलगोजा  तैयार करते हैं, जिनकी मांग न केवल भारत  में बल्कि विदेशों में भी है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि लोक कला  की साधना दिखावे से नहीं, बल्कि सच्ची तपस्या से होती है।

 राजस्थान की लोक कला

तगाराम भील को पद्मश्री पुरस्कार की घोषणा एक दुर्लभ लोक कला  की जीत के रूप में मानी जा रही है। आज भी अपनी जड़ों  से जुड़ी हुई है। इससे पहले जैसलमेर के हमीरा गांव  के कमायचा वादक साकर खान और बईया गांव के लोक कलाकार अनवर खान को भी पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है।

क्या होता हैं अलगोजा वाद्य

अलगोजा एक सुशीर वाद्य यंत्र है, जो बांस से बने दो जुड़ी हुई बांसुरियों का युग्म होता है। इसमें एक बांसुरी सुर के लिए और दूसरी ध्वनि के लिए होती है, जिसे मुंह से हवा फूंककर बजाया जाता है। वादक दोनों बांसुरियों को मुंह में दबाकर एक साथ बजाता है, जिससे एक साथ धुन और ध्वनि उत्पन्न होती है। यह वाद्य राजस्थान, पंजाब, सिंध और गुजरात के लोक संगीत में प्रमुखता से इस्तेमाल होता है।

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