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News In Detail
- पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के बयान से फिर सियासी पारा चढ़ा
- वसुंधरा बोलीं, राजनीति में दिल तोड़े भी जाते हैं और दुखाए भी जाते हैं
- वसुंधरा का यह बात छोटी खाटू में जैन समाज के एक कार्यक्रम में कही
- पूर्व सीएम अपने बयानों को लेकर दो साल से सुर्खियों में
- राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जल्द विस्थापन नहीं तो बढ़ सकता है भाजपा में कलह
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योगेन्द्र योगी@जयपुर
'इक आग सी सीने में दिन रात सुलगती है, आ जाए कोई सावन ख़्वाहिश ये मचलती है'। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का दर्द गाहे-बेगाहे कुछ इसी अंदाज में छलक पड़ता है। उनका यह दर्द एक बार फिर उजागर हो गया, जब उन्होंने 26 जनवरी को छोटी खाटू में आचार्य महाश्रमण मर्यादा महोत्सव कार्यक्रम में कहा कि राजनीति में दिल तोड़े भी जाते हैं और दुखाए भी जाते हैं।
उन्होंने कहा कि किसी का दिल दुखाना और किसी का दिल तोड़ना भी हिंसा है। राजनीति में अक्सर ऐसा होता है। मुझे माता विजया राजे सिंधिया ने सिखाया है कि जीवन में किसी का मन आहत न करें और उन्हीं के रास्ते पर चल रही हैं। किसी के साथ अन्याय करना और किसी का हक छीनना भी अधर्म है।
वसुंधरा की जुबां पर ऐसी बात क्यों
पूर्व मुख्यमंत्री राजे जिस अन्याय और हक छीनने की बात कर रही हैं, राजनीतिक में माना जाता है कि ऐसा उन्हीं के साथ हुआ है। विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद पार्टी नेतृत्व ने वसुधंरा को दरकिनार करते हुए एकदम नए चेहरे के तौर पर भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बना दिया। इसी के बाद से किसी न किसी मौके पर वसुंधरा का यह सियासी दुख सामने आता रहा है।
इसके अलावा वसुंधरा ने नौकरशाही की शैली पर सवाल उठाते हुए दूसरे तरीके से भी नेतृत्व पर दवाब बनाने की कोशिश की है। इस आड़ में कई मौकों पर नौकरशाही को चेतावनी में उनका यही अंदाज छिपा रहा कि याद रखें कि नेतृत्व परिवर्तन कभी भी हो सकता है, फिर सबका हिसाब किया जाएगा।
वसुंधरा के कटाक्ष की फेहरिस्त लंबी
वसुंधरा द्वारा किए गए परोक्ष तौर पर राजनीतिक कटाक्ष की फेहरिस्त काफी लंबी है। हर बार उन्होंने यही संदेश देने की कोशिश की है कि विद्रोह का लावा खदक रहा है।
3 अगस्त 2024 को भाजपा मदन राठौड़ के प्रदेशाध्यक्ष पद संभालने के दौरान हुए कार्यक्रम में वसुंधरा ने कहा था कि सबको साथ लेकर चलना मुश्किल काम है। कई फेल हुए, पद का अंहकार कद को कम करता है।
16 अगस्त 2024 को उदयुपर के ऋषभदेव में धर्म सभा के दौरान उन्होंने कहा कि काश ऐसी बारिश आ जाए कि अहम डूब जाए। मतभेद के किले ढह जाएं, अहम चूर-चूर हो जाए।
4 सितंबर 2024 को जयपुर में सिक्किम के राज्यपाल ओम माथुर के सम्मान समारोह में वसुंधरा ने कहा कि ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हे पीतल की लौंग मिल जाएं तो खुद को सर्राफ समझने लगते हैं।
25 नवंबर 2024 को झालरापाटन में महाराणा प्रताप कि प्रतिमा के अनावरण कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि सांप से कितना ही प्रेम कर लो, वह अपने स्वभाव के अनुरूप कभी न कभी तो आप जहर उगलेगा ही। सिर कटा लो पर दुश्मन के सामने कभी सिर मत झुकाओ। जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए तब तक जागते रहो।
8 फरवरी 2025 को राजसंमंद में चारनाथभुजा मंदिर के दर्शन के दौरान उन्होंने कहा कि जो भी अच्छा काम होता हो वह मैं चारना​थभुजा मंदिर से शुुरु करती हूं। 20 साल पहले की बात करू तो यहीं से शुरुआत की थी। इनेसे मैने जब भी कुछ मांगा है, इन्होंने मुझे जरूर दिया है।
24 जनवरी को जयपुर के संविधान क्लब में आयोजित जाट महिला शक्ति संगम कार्यक्रम में राजे ने कहा कि महिलाओं को राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए पुरुषों की तुलना में तीन गुना अधिक मेहनत करनी पड़ती है। महिलाओं ने वर्षों में काफी प्रगति की है, लेकिन बराबरी की भागीदारी पाने के लिए अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
अजमेर में सांवरलाल जाट की मूर्ति के अनावरण के दौरान भी उन्होंन तल्ख लहजे में कहा था कि “इंसान कब बदल जाए, भरोसा नहीं।
बयानों से जताती हैं वसुंधरा हैसियत
वसुंधरा राजे किसी न किसी तरह अपनी राजनीतिक हैसीयत जताती रहती हैं। बीते अप्रेल में पानी संकट पर अफसरों को फटकार लगाई और कहा कि “पीएम ने जल जीवन मिशन के लिए 42 हजार करोड़ दिए, हर पैसे का हिसाब दो। यह राजस्थान में भाजपा की ही सरकार पर अप्रत्यक्ष हमला था, जिसे कांग्रेस ने हरसंभव भुनाने की कोशिश की। जुलाई में झालावाड़ स्कूल छत गिरने पर शिक्षा विभाग को जिम्मेदार ठहराया और राज्यव्यापी सेफ्टी ऑडिट की मांग की, वहीं अगस्त में पीएम मोदी से मुलाकात ने अटकलें बढ़ाईं। उनके ‘वनवास’ जैसे असंतोष का इशारा है।
बढ़ सकता है कलह
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर वसुंधरा की अनदेखी जारी रही, तो 2028 से पहले भाजपा में कलह बढ़ सकती है। राजे का संदेश साफ है कि समय घूमेगा, वनवास खत्म होगा। राजस्थान में भाजपा की सियासत अब किस ओर जाएगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
71 साल की उम्र में भी वसुंधरा राजे सक्रिय हैं और राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखती हैं। अगर बीजेपी उन्हें अनदेखा करती रही, तो यह पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है। वसुंधरा राजे के हाल के बयान दिखाती है कि वे इशारों से लड़ रही हैं। साथ ही समर्थकों को जोड़े रखकर नेतृत्व पर दबाव बना रही हैं।
प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम ने विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्रियों का और हाल ही में जिस तरह से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चयन किया है, ऐसे में इस बात के आसार बहुत कम हैं कि वसुंधरा की दवाब की राजनीति के कोई सार्थक परिणाम होंगे।
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