पिता को मिले ताने, भाई ने छोड़ा अपना सपना; अर्नव ने 21 साल में IAS बन पूरी की दोनों की जिद
Saurabh Mishra | Sept 17, 2026, 18:28 IST
अर्नव आनंद गुप्ता ने आर्थिक संघर्ष और परिवार के त्याग के बीच पहले प्रयास में UPSC में AIR-213 हासिल की
पिता की छोटी कपड़ों की दुकान और भाइयों के त्याग के बीच पले अर्नव आनंद गुप्ता ने 21 साल की उम्र में पहले प्रयास में UPSC क्रैक कर AIR-213 हासिल की, जानिए उनकी पूरी कहानी।
तमाम संघर्ष हों। घर की माली हालत कमजोर हो। संसाधन भी सीमित हों। फिर भी मंजिल तक पहुंचा जा सकता। बस जिद अपनी हो और परिवार मजबूती से पीछे खड़ा हो। बिहार के मोतिहारी के अर्नव आनंद गुप्ता के IAS बनने की कहानी इसी जिद और परिवार के त्याग का उदाहरण है। कभी जिस घर में बोरा बिछाकर मिट्टी के तेल के दीये की रोशनी में बच्चों को पढ़ाया गया, उसी घर के सबसे छोटे बेटे ने देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में शुमार UPSC पहले ही प्रयास में पास कर ली। अर्नव ने संघ लोक सेवा आयोग की 2024 की परीक्षा में ऑल इंडिया 213वीं रैंक हासिल की। वो भी महज
यह कामयाबी सिर्फ अर्नव की नहीं थी। इसके पीछे पिता की बरसों की मेहनत थी। मां का संघर्ष था। बड़े भाइयों का त्याग था। खासकर उस बड़े भाई का अधूरा सपना था, जिसने खुद UPSC की तैयारी की, लेकिन हालातों के चलते नौकरी को तरजीह दी। बाद में छोटे भाई अर्नव ने उसी सपने को अपना बना लिया।
UPSC 2024 में 213वीं रैंक हासिल करने वाले अर्नव आनंद गुप्ता को राजस्थान कैडर आवंटित हुआ है। उनका गृह राज्य बिहार है। मसूरी में ट्रेनिंग के बाद अब उनकी प्रशासनिक जिंदगी का नया अध्याय राजस्थान में शुरू हो चुका है। अर्नव फिलहाल अजमेर में अंडर ट्रेनिंग हैं और असिस्टेंट कलेक्टर के तौर पर प्रशासन के कामकाज को करीब से समझ रहे।
जिस परिवार के लिए कभी बच्चों की पढ़ाई का खर्च जुटाना बड़ी चुनौती था, उसी परिवार का बेटा अब प्रशासनिक अधिकारी की कुर्सी तक पहुंच चुका।
अर्नव गुप्ता का परिवार मूल रूप से पूर्वी चंपारण के मोतिहारी जिले से जुड़ा है। उनके पिता बैद्यनाथ प्रसाद गुप्ता और मां राजकुमारी देवी हैं। परिवार पहले गांव में रहता था लेकिन बच्चों की पढ़ाई के लिए फिर मोतिहारी शहर में आ गया था। पिता छोटी सी रेडीमेड कपड़ों की दुकान चलाते रहे।
बैद्यनाथ प्रसाद ज्यादा पढ़ नहीं पाए। परिवार की पिछली पीढ़ियों में भी उच्च शिक्षा दूर की बात थी। पढ़ाई कम होने के कारण जिंदगी में उन्हें कई बार ऐसी बातें सुननी पड़ीं, जो मन को चुभ जाती थीं। लोगों की नजर और ताने उन्हें परेशान करते थे।
इसी तकलीफ ने उनके भीतर एक जिद पैदा कर दी कि वे भले पढ़ नहीं सके लेकिन अपने बच्चों को जरूर अच्छी तालीम दिलाएंगे। इतना पढ़ाएंगे कि दुनिया उन्हें सम्मान की नजर से देखे। पर यह कहना आसान था, करना बेहद मुश्किल। कमाई सीमित थी। घर बड़ा था। बच्चों की पढ़ाई का खर्च था। परिवार के मुताबिक एक दौर ऐसा भी था जब बोरा बिछाकर और मिट्टी के तेल का दीया जलाकर बच्चों को पढ़ना पड़ता था। एक-एक रुपए जोड़ने के लिए अपनी जरूरतों को टालना पड़ता था। लेकिन बच्चों की पढ़ाई रोकने का सवाल नहीं था।
![अर्नव आनंद गुप्ता ने आर्थिक संघर्ष और परिवार के त्याग के बीच पहले प्रयास में UPSC में AIR-213 हासिल की]()
अर्नव बचपन से पढ़ाई में तेज थे। शुरुआती पढ़ाई के बाद उनका चयन जवाहर नवोदय विद्यालय, पिपराकोठी में हो गया। यह चयन सिर्फ एक बच्चे की शैक्षणिक उपलब्धि नहीं था। आर्थिक मुश्किलों से जूझ रहे परिवार के लिए बड़ी राहत भी थी। क्योंकि इस सेलेक्शन के बाद अर्नव की पढ़ाई पर होने वाले खर्चे का भार काफी हद तक कम हो गया था।
अर्नव ने दसवीं में 95.8 फीसदी अंक हासिल किए और स्कूल टॉपर रहे। बाद में मोतिहारी के एमएस मेमोरियल से आर्ट्स स्ट्रीम में 12वीं की। यहां भी उनका प्रदर्शन शानदार रहा। उन्होंने 98 प्रतिशत अंक हासिल किए और जिले में टॉप किया।
इसके बाद उनके सामने बड़ा रास्ता खुला। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित हिंदू कॉलेज में दाखिला मिला। यहां उन्होंने पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई की और 2020 से 2023 के बीच अपना ग्रेजुएशन पूरा किया।
![अर्नव आनंद गुप्ता ने आर्थिक संघर्ष और परिवार के त्याग के बीच पहले प्रयास में UPSC में AIR-213 हासिल की]()
अर्नव गुप्ता की कहानी में उनके भाइयों की भूमिका भी उतनी ही अहम है। परिवार में उच्च शिक्षा की शुरुआत बड़े भाई गुड्डू कुमार गुप्ता से हुई। वे पूरे परिवार में ग्रेजुएशन करने वाले शुरुआती सदस्य बने। उनका सपना भी सिविल सेवा में जाने का था। उन्होंने UPSC की कोशिश भी की, लेकिन उनका अकादमिक आधार उतना मजबूत नहीं था। सफलता नहीं मिली।
घर की आर्थिक हालत भी ऐसी नहीं थी कि सभी भाई वर्षों तक सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते रहें। ऐसे में बड़े भाई ने अपने सपने से पहले परिवार की जरूरत को रखा। उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में नौकरी पकड़ ली। आज वे सेंट्रल बैंक में मैनेजर हैं। उनकी नौकरी लगने के बाद घर की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे बेहतर हुई।
दूसरे भाई ने पिता के साथ कपड़ों के कारोबार की जिम्मेदारी संभाली। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा सबसे छोटे भाई अर्नव को मिला। एक भाई ने घर की आय मजबूत की। दूसरे ने पिता का हाथ थामा। इससे अर्नव के लिए पढ़ाई का रास्ता खुला रहा। बड़े भाई का IAS बनने का सपना भले पूरा नहीं हो सका था, लेकिन वह सपना घर से खत्म नहीं हुआ था।
वह छोटे भाई तक पहुंच चुका था।
अर्नव ने एक इंटरव्यू में यह बात बताई थी कि उनके बड़े भाई आईएएस बनना चाहते थे। परिस्थितियों के कारण उनका सपना पूरा नहीं हो पाया। अर्नव ने उसी अधूरे सपने को पूरा करने का संकल्प लिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद उन्होंने पूरी गंभीरता से UPSC की तैयारी शुरू की।
2024 में परीक्षा के लिए पात्र हुए और पहला ही प्रयास दिया। उम्र महज 21 साल थी। पहला प्रयास था। देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक। लेकिन नतीजा आया तो परिवार की कई पीढ़ियों का संघर्ष जैसे एक संख्या में सिमट गया था-AIR 213। उन्होंने 21 साल की उम्र में अपने पहले ही प्रयास में यह परीक्षा पास कर ली।
अर्नव गुप्ता के परिवार की कहानी में शायद सबसे खास बात यही है कि यहां सफलता किसी एक सदस्य की नहीं दिखती। तीनों भाइयों ने अपनी-अपनी भूमिका चुनी। बड़े भाई ने नौकरी के जरिए घर को आर्थिक मजबूती दी। मंझले भाई ने पिता के कारोबार की जिम्मेदारी संभाली। सबसे छोटे अर्नव ने पढ़ाई और UPSC की तैयारी पर ध्यान लगाया।
परिवार की सोच सीधी थी कि एक आगे बढ़ेगा तो रास्ता बाकी लोगों के लिए भी खुलेगा। पिता का भी यही विश्वास रहा कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, ईमानदारी से मेहनत की जाए और परिवार साथ रहे तो जिंदगी बदली जा सकती है। कभी शिक्षा की कमी के कारण दूसरों की उपेक्षा झेलने वाले पिता के लिए बेटे का IAS बनना सिर्फ नौकरी मिलने की खुशी नहीं थी। यह उस संकल्प का पूरा होना था, जो उन्होंने वर्षों पहले अपने बच्चों को पढ़ाते वक्त लिया था।
परिस्थितियां शुरुआत तय करती हैं, मंजिल नहीं: आर्थिक कमजोरी संसाधनों को सीमित कर सकती है, लेकिन सही अवसर, मेहनत और निरंतरता आगे बढ़ने का रास्ता बना सकती है।
परिवार का सहयोग बड़ी ताकत बन सकता: अर्नव की सफलता के पीछे अकेले उनकी मेहनत नहीं थी। पिता ने पढ़ाई को प्राथमिकता दी। भाइयों ने जिम्मेदारियां बांटीं। इससे उन्हें अपने लक्ष्य पर फोकस करने का मौका मिला।
मजबूत शैक्षणिक आधार का फायदा मिलता:दसवीं में 95.8 प्रतिशत, 12वीं में 98 प्रतिशत और फिर हिंदू कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई। अर्नव ने स्कूल के दिनों से पढ़ाई में निरंतरता बनाए रखी।
दूसरे का अधूरा सपना भी आपकी प्रेरणा बन सकता: बड़े भाई का UPSC का सपना पूरा नहीं हुआ। अर्नव गुप्ता ने उसे बोझ नहीं, प्रेरणा बनाया। उन्होंने उसी लक्ष्य को अपनाया और पहले प्रयास में सफलता हासिल की।
पहला प्रयास सिर्फ अनुभव लेने के लिए हो, यह जरूरी नहीं: यूपीएससी की तैयारी करने वाले कई अभ्यर्थी पहला प्रयास तैयारी परखने के लिए देते हैं। अर्नव की यात्रा बताती है कि तैयारी पूरी हो तो पहले प्रयास को भी निर्णायक प्रयास की तरह लिया जा सकता।
![IAS-Arnav-Anand-Gupta]()
अर्नव आनंद गुप्ता की कहानी की शुरुआत किसी बड़े शहर, महंगे स्कूल या मजबूत आर्थिक पृष्ठभूमि से नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत उस पिता की जिद से हुई थी, जो खुद ज्यादा नहीं पढ़ पाया, लेकिन अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता था। उस मां के संघर्ष से हुई, जिसने परिवार को संभाला। उन भाइयों के त्याग से हुई, जिन्होंने जिम्मेदारियां आपस में बांट लीं। और आखिर में उस सबसे छोटे बेटे ने परिवार के सपने को मंजिल तक पहुंचाया।
कभी मिट्टी के तेल के दीये की रोशनी में शुरू हुआ पढ़ाई का यह सफर अब राजस्थान में एक IAS अधिकारी की नई जिम्मेदारियों तक पहुंच चुका।
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यह कामयाबी सिर्फ अर्नव की नहीं थी। इसके पीछे पिता की बरसों की मेहनत थी। मां का संघर्ष था। बड़े भाइयों का त्याग था। खासकर उस बड़े भाई का अधूरा सपना था, जिसने खुद UPSC की तैयारी की, लेकिन हालातों के चलते नौकरी को तरजीह दी। बाद में छोटे भाई अर्नव ने उसी सपने को अपना बना लिया।
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जिस परिवार के लिए कभी बच्चों की पढ़ाई का खर्च जुटाना बड़ी चुनौती था, उसी परिवार का बेटा अब प्रशासनिक अधिकारी की कुर्सी तक पहुंच चुका।
पिता ज्यादा नहीं पढ़ सके, इसलिए बच्चों को पढ़ाने की ठानी
बैद्यनाथ प्रसाद ज्यादा पढ़ नहीं पाए। परिवार की पिछली पीढ़ियों में भी उच्च शिक्षा दूर की बात थी। पढ़ाई कम होने के कारण जिंदगी में उन्हें कई बार ऐसी बातें सुननी पड़ीं, जो मन को चुभ जाती थीं। लोगों की नजर और ताने उन्हें परेशान करते थे।
इसी तकलीफ ने उनके भीतर एक जिद पैदा कर दी कि वे भले पढ़ नहीं सके लेकिन अपने बच्चों को जरूर अच्छी तालीम दिलाएंगे। इतना पढ़ाएंगे कि दुनिया उन्हें सम्मान की नजर से देखे। पर यह कहना आसान था, करना बेहद मुश्किल। कमाई सीमित थी। घर बड़ा था। बच्चों की पढ़ाई का खर्च था। परिवार के मुताबिक एक दौर ऐसा भी था जब बोरा बिछाकर और मिट्टी के तेल का दीया जलाकर बच्चों को पढ़ना पड़ता था। एक-एक रुपए जोड़ने के लिए अपनी जरूरतों को टालना पड़ता था। लेकिन बच्चों की पढ़ाई रोकने का सवाल नहीं था।
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अर्नव ने दसवीं में 95.8 फीसदी अंक हासिल किए और स्कूल टॉपर रहे। बाद में मोतिहारी के एमएस मेमोरियल से आर्ट्स स्ट्रीम में 12वीं की। यहां भी उनका प्रदर्शन शानदार रहा। उन्होंने 98 प्रतिशत अंक हासिल किए और जिले में टॉप किया।
इसके बाद उनके सामने बड़ा रास्ता खुला। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित हिंदू कॉलेज में दाखिला मिला। यहां उन्होंने पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई की और 2020 से 2023 के बीच अपना ग्रेजुएशन पूरा किया।
अर्नव आनंद गुप्ता ने आर्थिक संघर्ष और परिवार के त्याग के बीच पहले प्रयास में UPSC में AIR-213 हासिल की
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घर की आर्थिक हालत भी ऐसी नहीं थी कि सभी भाई वर्षों तक सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते रहें। ऐसे में बड़े भाई ने अपने सपने से पहले परिवार की जरूरत को रखा। उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में नौकरी पकड़ ली। आज वे सेंट्रल बैंक में मैनेजर हैं। उनकी नौकरी लगने के बाद घर की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे बेहतर हुई।
दूसरे भाई ने पिता के साथ कपड़ों के कारोबार की जिम्मेदारी संभाली। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा सबसे छोटे भाई अर्नव को मिला। एक भाई ने घर की आय मजबूत की। दूसरे ने पिता का हाथ थामा। इससे अर्नव के लिए पढ़ाई का रास्ता खुला रहा। बड़े भाई का IAS बनने का सपना भले पूरा नहीं हो सका था, लेकिन वह सपना घर से खत्म नहीं हुआ था।
वह छोटे भाई तक पहुंच चुका था।
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2024 में परीक्षा के लिए पात्र हुए और पहला ही प्रयास दिया। उम्र महज 21 साल थी। पहला प्रयास था। देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक। लेकिन नतीजा आया तो परिवार की कई पीढ़ियों का संघर्ष जैसे एक संख्या में सिमट गया था-AIR 213। उन्होंने 21 साल की उम्र में अपने पहले ही प्रयास में यह परीक्षा पास कर ली।
तीन भाइयों ने मिलकर बदली परिवार की कहानी
परिवार की सोच सीधी थी कि एक आगे बढ़ेगा तो रास्ता बाकी लोगों के लिए भी खुलेगा। पिता का भी यही विश्वास रहा कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, ईमानदारी से मेहनत की जाए और परिवार साथ रहे तो जिंदगी बदली जा सकती है। कभी शिक्षा की कमी के कारण दूसरों की उपेक्षा झेलने वाले पिता के लिए बेटे का IAS बनना सिर्फ नौकरी मिलने की खुशी नहीं थी। यह उस संकल्प का पूरा होना था, जो उन्होंने वर्षों पहले अपने बच्चों को पढ़ाते वक्त लिया था।
IAS अर्नव गुप्ता की कहानी से क्या सीख सकते हैं?
परिवार का सहयोग बड़ी ताकत बन सकता: अर्नव की सफलता के पीछे अकेले उनकी मेहनत नहीं थी। पिता ने पढ़ाई को प्राथमिकता दी। भाइयों ने जिम्मेदारियां बांटीं। इससे उन्हें अपने लक्ष्य पर फोकस करने का मौका मिला।
मजबूत शैक्षणिक आधार का फायदा मिलता:दसवीं में 95.8 प्रतिशत, 12वीं में 98 प्रतिशत और फिर हिंदू कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई। अर्नव ने स्कूल के दिनों से पढ़ाई में निरंतरता बनाए रखी।
दूसरे का अधूरा सपना भी आपकी प्रेरणा बन सकता: बड़े भाई का UPSC का सपना पूरा नहीं हुआ। अर्नव गुप्ता ने उसे बोझ नहीं, प्रेरणा बनाया। उन्होंने उसी लक्ष्य को अपनाया और पहले प्रयास में सफलता हासिल की।
पहला प्रयास सिर्फ अनुभव लेने के लिए हो, यह जरूरी नहीं: यूपीएससी की तैयारी करने वाले कई अभ्यर्थी पहला प्रयास तैयारी परखने के लिए देते हैं। अर्नव की यात्रा बताती है कि तैयारी पूरी हो तो पहले प्रयास को भी निर्णायक प्रयास की तरह लिया जा सकता।
IAS-Arnav-Anand-Gupta
अर्नव आनंद गुप्ता की कहानी की शुरुआत किसी बड़े शहर, महंगे स्कूल या मजबूत आर्थिक पृष्ठभूमि से नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत उस पिता की जिद से हुई थी, जो खुद ज्यादा नहीं पढ़ पाया, लेकिन अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता था। उस मां के संघर्ष से हुई, जिसने परिवार को संभाला। उन भाइयों के त्याग से हुई, जिन्होंने जिम्मेदारियां आपस में बांट लीं। और आखिर में उस सबसे छोटे बेटे ने परिवार के सपने को मंजिल तक पहुंचाया।
कभी मिट्टी के तेल के दीये की रोशनी में शुरू हुआ पढ़ाई का यह सफर अब राजस्थान में एक IAS अधिकारी की नई जिम्मेदारियों तक पहुंच चुका।
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