IAS किरण कौशल: छत्तीसगढ़ की बेटी, जिसने हार को सीढ़ी बनाकर इतिहास रचा
Harrison Masih | Apr 06, 2026, 16:52 IST
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छत्तीसगढ़ की आईएएस अधिकारी किरण कौशल की प्रेरणादायक सफलता की कहानी, जिन्होंने हिंदी माध्यम से यूपीएससी में ऑल इंडिया रैंक 3 हासिल की। असफलताओं को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने कड़ी मेहनत, रणनीति और आत्मविश्वास के दम पर इतिहास रचा।
छत्तीसगढ़ की शांत मिट्टी से निकलकर देश की सबसे कठिन परीक्षा में झंडा गाड़ने वाली किरण कौशल की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लगती। वे केवल एक आईएएस अधिकारी नहीं, बल्कि उस जज़्बे का नाम हैं, जो असफलताओं से टूटता नहीं, बल्कि और मजबूत होकर लौटता है।
पृथक छत्तीसगढ़ बनने के बाद वे पहली मूल निवासी महिला बनीं, जिन्होंने आईएएस जैसी प्रतिष्ठित सेवा में जगह बनाई और वह भी ऐसे रिकॉर्ड के साथ, जिसे आज तक कोई नहीं तोड़ सका।
3 सितंबर 1980 को दुर्ग जिले में जन्मी किरण कौशल का बचपन एक सामान्य परिवार में बीता, जहां उनके पिता एस.पी. कौशल वन विभाग में कार्यरत थे। घर में सादगी थी, लेकिन सोच बड़ी थी। पढ़ाई के प्रति उनका रुझान शुरू से ही स्पष्ट था। स्कूलिंग पूरी करने के बाद उन्होंने पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से कॉमर्स में स्नातक किया।
यहीं से उनके भीतर कुछ बड़ा करने का सपना आकार लेने लगा। प्रतियोगी परीक्षाओं की दुनिया में उनका सफर आसान नहीं रहा। शुरुआत में उन्होंने राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी और 2003 में महिला एवं बाल विकास विभाग अधिकारी के पद पर चयनित हुईं।
इसके बाद 2005 में डिप्टी कलेक्टर बनीं। लेकिन उनके भीतर कहीं न कहीं आईएएस बनने का सपना था। यही सपना उन्हें बार-बार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा।
यूपीएससी की तैयारी के दौरान उन्हें पहली बार असफलता का सामना करना पड़ा। यह वह मोड़ था, जहां बहुत से लोग हार मान लेते हैं, लेकिन किरण कौशल ने इसे अपने आत्ममंथन का समय बनाया। उन्होंने अपनी रणनीति बदली, खुद से नोट्स तैयार किए और दूसरे प्रयास में 242वीं रैंक हासिल की।
इस बार उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) में हुआ, लेकिन उनका लक्ष्य अभी भी अधूरा था। उन्होंने नौकरी के सुरक्षित रास्ते को छोड़कर फिर से जोखिम उठाया और तीसरी बार पूरी ताकत के साथ परीक्षा दी।तीसरे प्रयास में उन्होंने इतिहास रच दिया। पूरे देश में तीसरी रैंक हासिल की और महिला वर्ग में पहला स्थान प्राप्त किया।
खास बात यह थी कि उन्होंने हिंदी माध्यम से यह सफलता हासिल की, जो उस समय अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। छत्तीसगढ़ से आज तक कोई इस रिकॉर्ड को तोड़ नहीं पाया है। 31 अगस्त 2009 को उन्होंने आईएएस सेवा जॉइन की और यहीं से शुरू हुआ उनका असली प्रशासनिक सफर।
![IAS Kiran Kaushal]()
प्रशासनिक जीवन में किरण कौशल की पहचान एक ऐसी अधिकारी की बनी, जो केवल आदेश देने में नहीं, बल्कि खुद मैदान में उतरकर काम करने में विश्वास रखती हैं। उन्हें पहली कलेक्टरी मुंगेली जिले में मिली। उस समय मुंगेली शिक्षा के क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ था और बोर्ड परीक्षाओं में सबसे नीचे स्थान पर था।
लेकिन किरण कौशल ने इसे चुनौती के रूप में लिया। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए जमीनी स्तर पर काम किया। शिक्षकों की जिम्मेदारी तय की और बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़ाने के प्रयास किए। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही समय में मुंगेली 27वें स्थान से उठकर प्रदेश के टॉप 5 जिलों में शामिल हो गया।
यही नहीं, उन्होंने मुंगेली को प्रदेश का पहला ओपन डिफेकेशन फ्री (ODF) जिला बनाकर स्वच्छता के क्षेत्र में भी मिसाल कायम की। इसके बाद सरगुजा में कलेक्टर के रूप में उनका कार्यकाल नवाचार और मजबूत नेतृत्व का उदाहरण बन गया। जब पूरे प्रदेश में शिक्षाकर्मियों की हड़ताल चल रही थी और स्कूलों की व्यवस्था चरमरा गई थी, तब किरण कौशल ने खुद स्कूलों में जाकर मॉनिटरिंग शुरू की।
उन्होंने निजी स्कूलों के शिक्षकों, सामाजिक संस्थाओं और प्रेरकों का सहयोग लेकर शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर बनाए रखा। यह कदम दिखाता है कि वे परिस्थितियों से घबराने के बजाय समाधान खोजने में विश्वास रखती हैं।
![IAS Kiran Kaushal]()
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी उन्होंने तकनीक का उपयोग करते हुए एक अनोखा प्रयोग किया। एंड्रॉइड ऐप के जरिए डॉक्टरों की उपस्थिति और मरीजों की निगरानी सुनिश्चित की। डॉक्टरों को दिन में दो बार मरीजों के साथ अपनी तस्वीर अपलोड करनी होती थी और मरीजों के भोजन की भी निगरानी की जाती थी।
इस सिस्टम ने सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों बढ़ाई। सरगुजा में उनके कार्यकाल के दौरान उज्ज्वला योजना के तहत एक लाख से अधिक हितग्राहियों को लाभ पहुंचाने का रिकॉर्ड बना, जिससे जिले को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। इसके बाद बालोद जिले में उन्होंने महिलाओं और छात्राओं के स्वास्थ्य और पोषण पर विशेष ध्यान दिया, जिससे सामाजिक विकास को नई दिशा मिली।
कोरबा में उनका कार्यकाल शायद उनके करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर था। जब कोरोना महामारी ने दस्तक दी, तब कोरबा का कटघोरा प्रदेश का पहला हॉटस्पॉट बना। उस समय डर और अनिश्चितता का माहौल था, लेकिन किरण कौशल ने अद्भुत नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। उन्होंने संक्रमितों की तेजी से पहचान, आइसोलेशन की व्यवस्था, लॉकडाउन का प्रभावी क्रियान्वयन और जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति को संतुलित रखा।
सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने अपने छोटे बच्चे को घर पर छोड़कर दिन-रात इस संकट से लड़ाई लड़ी। उनकी कार्यशैली को न केवल प्रदेश में, बल्कि अन्य जिलों में भी अपनाया गया। कोरबा में रहते हुए उन्होंने सतरेंगा को पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण काम किया।
इसके अलावा रायपुर अटल नगर विकास प्राधिकरण की मुख्य कार्यपालन अधिकारी, पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग की महानिरीक्षक, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की संचालक और मार्कफेड की प्रबंध संचालक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए उन्होंने प्रशासनिक दक्षता की मिसाल पेश की।
मार्कफेड में रहते हुए उन्होंने नुकसान को कम कर रिकॉर्ड स्थापित किया, जो उनकी वित्तीय समझ और प्रबंधन क्षमता को दर्शाता है। फिलहाल इस समय वे कमिश्नर समग्र शिक्षा के पद पर हैं। यहाँ भी वे किताबों के वितरण को डिजिटलाइजेशन के ज़रिए नया रूप देने में लगीं हैं।
IAS किरण कौशल (IAS Kiran Kaushal) की पूरी यात्रा यह साबित करती है कि सफलता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि लगातार प्रयास, आत्मविश्वास और जोखिम उठाने के साहस से मिलती है। उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो छोटे शहर या साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर बड़े सपने देखने की हिम्मत करता है। छत्तीसगढ़ कैडर
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पृथक छत्तीसगढ़ बनने के बाद वे पहली मूल निवासी महिला बनीं, जिन्होंने आईएएस जैसी प्रतिष्ठित सेवा में जगह बनाई और वह भी ऐसे रिकॉर्ड के साथ, जिसे आज तक कोई नहीं तोड़ सका।
3 सितंबर 1980 को दुर्ग जिले में जन्मी किरण कौशल का बचपन एक सामान्य परिवार में बीता, जहां उनके पिता एस.पी. कौशल वन विभाग में कार्यरत थे। घर में सादगी थी, लेकिन सोच बड़ी थी। पढ़ाई के प्रति उनका रुझान शुरू से ही स्पष्ट था। स्कूलिंग पूरी करने के बाद उन्होंने पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से कॉमर्स में स्नातक किया।
यहीं से उनके भीतर कुछ बड़ा करने का सपना आकार लेने लगा। प्रतियोगी परीक्षाओं की दुनिया में उनका सफर आसान नहीं रहा। शुरुआत में उन्होंने राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी और 2003 में महिला एवं बाल विकास विभाग अधिकारी के पद पर चयनित हुईं।
इसके बाद 2005 में डिप्टी कलेक्टर बनीं। लेकिन उनके भीतर कहीं न कहीं आईएएस बनने का सपना था। यही सपना उन्हें बार-बार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा।
हिंदी माध्यम से आईएएस
इस बार उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) में हुआ, लेकिन उनका लक्ष्य अभी भी अधूरा था। उन्होंने नौकरी के सुरक्षित रास्ते को छोड़कर फिर से जोखिम उठाया और तीसरी बार पूरी ताकत के साथ परीक्षा दी।तीसरे प्रयास में उन्होंने इतिहास रच दिया। पूरे देश में तीसरी रैंक हासिल की और महिला वर्ग में पहला स्थान प्राप्त किया।
खास बात यह थी कि उन्होंने हिंदी माध्यम से यह सफलता हासिल की, जो उस समय अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। छत्तीसगढ़ से आज तक कोई इस रिकॉर्ड को तोड़ नहीं पाया है। 31 अगस्त 2009 को उन्होंने आईएएस सेवा जॉइन की और यहीं से शुरू हुआ उनका असली प्रशासनिक सफर।
IAS Kiran Kaushal
मजबूत नेतृत्व और समाधान
लेकिन किरण कौशल ने इसे चुनौती के रूप में लिया। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए जमीनी स्तर पर काम किया। शिक्षकों की जिम्मेदारी तय की और बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़ाने के प्रयास किए। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही समय में मुंगेली 27वें स्थान से उठकर प्रदेश के टॉप 5 जिलों में शामिल हो गया।
यही नहीं, उन्होंने मुंगेली को प्रदेश का पहला ओपन डिफेकेशन फ्री (ODF) जिला बनाकर स्वच्छता के क्षेत्र में भी मिसाल कायम की। इसके बाद सरगुजा में कलेक्टर के रूप में उनका कार्यकाल नवाचार और मजबूत नेतृत्व का उदाहरण बन गया। जब पूरे प्रदेश में शिक्षाकर्मियों की हड़ताल चल रही थी और स्कूलों की व्यवस्था चरमरा गई थी, तब किरण कौशल ने खुद स्कूलों में जाकर मॉनिटरिंग शुरू की।
उन्होंने निजी स्कूलों के शिक्षकों, सामाजिक संस्थाओं और प्रेरकों का सहयोग लेकर शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर बनाए रखा। यह कदम दिखाता है कि वे परिस्थितियों से घबराने के बजाय समाधान खोजने में विश्वास रखती हैं।
IAS Kiran Kaushal
इनोवेशन पर जोर
इस सिस्टम ने सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों बढ़ाई। सरगुजा में उनके कार्यकाल के दौरान उज्ज्वला योजना के तहत एक लाख से अधिक हितग्राहियों को लाभ पहुंचाने का रिकॉर्ड बना, जिससे जिले को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। इसके बाद बालोद जिले में उन्होंने महिलाओं और छात्राओं के स्वास्थ्य और पोषण पर विशेष ध्यान दिया, जिससे सामाजिक विकास को नई दिशा मिली।
चुनौतीपूर्ण कार्यकाल
सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने अपने छोटे बच्चे को घर पर छोड़कर दिन-रात इस संकट से लड़ाई लड़ी। उनकी कार्यशैली को न केवल प्रदेश में, बल्कि अन्य जिलों में भी अपनाया गया। कोरबा में रहते हुए उन्होंने सतरेंगा को पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण काम किया।
इसके अलावा रायपुर अटल नगर विकास प्राधिकरण की मुख्य कार्यपालन अधिकारी, पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग की महानिरीक्षक, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की संचालक और मार्कफेड की प्रबंध संचालक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए उन्होंने प्रशासनिक दक्षता की मिसाल पेश की।
मार्कफेड में रहते हुए उन्होंने नुकसान को कम कर रिकॉर्ड स्थापित किया, जो उनकी वित्तीय समझ और प्रबंधन क्षमता को दर्शाता है। फिलहाल इस समय वे कमिश्नर समग्र शिक्षा के पद पर हैं। यहाँ भी वे किताबों के वितरण को डिजिटलाइजेशन के ज़रिए नया रूप देने में लगीं हैं।
IAS किरण कौशल (IAS Kiran Kaushal) की पूरी यात्रा यह साबित करती है कि सफलता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि लगातार प्रयास, आत्मविश्वास और जोखिम उठाने के साहस से मिलती है। उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो छोटे शहर या साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर बड़े सपने देखने की हिम्मत करता है। छत्तीसगढ़ कैडर
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