कंटेंट कॉमर्स बदल देगा डिजिटल बाजार
Rajesh Lahoti | Aug 11, 2026, 14:11 IST
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कंटेंट कॉमर्स डिजिटल बाजार को बदल रहा है। यह वेब सीरीज और लाइव शो के दौरान 'वॉच टू बाय' मॉडल से मनोरंजन, विज्ञापन और खरीदारी को सीधे एक ही स्क्रीन पर जोड़ता है।
कभी टेलीविजन पर कोई फिल्म, धारावाहिक या क्रिकेट मैच देखते हुए विज्ञापन आता था तो दर्शक चैनल बदल देता था। विज्ञापन को मनोरंजन के बीच आने वाला व्यवधान माना जाता था। फिर इंटरनेट आया, वीडियो स्ट्रीमिंग ने देखने की आदत बदली और दर्शक ने अपनी पसंद का कंटेंट अपनी सुविधा के अनुसार देखना शुरू किया। अब डिजिटल दुनिया इस रिश्ते को एक और कदम आगे ले जा रही है। आने वाले दौर में दर्शक केवल कंटेंट देखेगा नहीं, बल्कि उसी कंटेंट से प्रभावित होकर सामान खरीदेगा, सेवाएं लेगा और संभव है कि पूरी खरीदारी प्रक्रिया भी उसी स्क्रीन पर पूरी कर दे।
यही बदलाव कंटेंट कॉमर्स के नाम से सामने आ रहा है। इसका सीधा मतलब है-मनोरंजन, डिजिटल कंटेंट और खरीदारी को एक ही अनुभव में जोड़ देना। किसी वेब सीरीज में कलाकार ने जो कपड़ा पहना है, किसी शो में इस्तेमाल किया गया गैजेट, किसी कुकिंग कार्यक्रम में इस्तेमाल होने वाला उपकरण या किसी लाइव कार्यक्रम में दिखाई देने वाला उत्पाद, दर्शक के लिए सिर्फ स्क्रीन पर दिखाई देने वाली चीज नहीं रहेगा। उस पर क्लिक करते ही उसके बारे में जानकारी मिलेगी और कई मामलों में वहीं से खरीदारी का रास्ता भी खुल जाएगा। यह बदलाव मामूली नहीं है। यह डिजिटल विज्ञापन की पूरी अर्थव्यवस्था को बदलने की क्षमता रखता है। अभी तक विज्ञापन का उद्देश्य ग्राहक का ध्यान आकर्षित करना था। कंटेंट कॉमर्स उस ध्यान को सीधे खरीदारी में बदलने की कोशिश कर रहा है। यानी विज्ञापन से बिक्री तक का रास्ता छोटा किया जा रहा है।
पारंपरिक विज्ञापन मॉडल में किसी उत्पाद को टीवी, अखबार, वेबसाइट या सोशल मीडिया पर दिखाया जाता है। ग्राहक उसे देखता है, उसके बारे में सोचता है और यदि जरूरत महसूस होती है तो अलग से इंटरनेट पर जाकर उसके बारे में जानकारी खोजता है। फिर किसी ई-कॉमर्स वेबसाइट या दुकान तक पहुंचकर खरीदारी करता है। इस पूरी प्रक्रिया में विज्ञापन और खरीदारी के बीच काफी दूरी होती है। कंटेंट कॉमर्स इस दूरी को खत्म करने की कोशिश कर रहा है। मान लीजिए किसी वेब सीरीज में कोई किरदार एक खास जैकेट पहनता है और दर्शक को वह पसंद आ जाती है।
भविष्य के इंटरेक्टिव ओटीटी अनुभव में दर्शक उस जैकेट पर क्लिक कर सकता है। स्क्रीन पर उसका ब्रांड, कीमत, उपलब्ध रंग और आकार जैसी जानकारी सामने आ सकती है और वहीं से खरीदारी भी संभव हो सकती है। इस मॉडल में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि उपभोक्ता को खरीदारी के लिए कंटेंट से बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। जिस कहानी ने उसकी रुचि पैदा की, वही कहानी खरीदारी की वजह भी बन जाती है। यही कारण है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म, ई-कॉमर्स कंपनियां, विज्ञापन एजेंसियां और डिजिटल क्रिएटर इस मॉडल को लेकर तेजी से प्रयोग कर रहे हैं।
![पारंपरिक विज्ञापन से कंटेंट कॉमर्स तक का सफर]()
भारत में इस दिशा में जियोहॉटस्टार का प्रयोग खास तौर पर महत्वपूर्ण है। प्लेटफॉर्म ने शॉप द लुक जैसे फीचर के जरिए मनोरंजन को फैशन और खरीदारी से जोड़ने की कोशिश की है। स्प्लिट्सविला जैसे कार्यक्रमों से प्रेरित फैशन को दर्शकों के सामने खरीदारी के विकल्प के साथ पेश करने का विचार इस बात का संकेत है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म अब दर्शक को केवल देखने वाला व्यक्ति नहीं मान रहा। यहां पूरा मॉडल बदल जाता है। किसी कार्यक्रम में कलाकार ने क्या पहना, वह अब सिर्फ कार्यक्रम की स्टाइलिंग का हिस्सा नहीं रह जाता।
वह दर्शक के लिए संभावित खरीदारी का विकल्प बन जाता है। इसे समझने के लिए पारंपरिक विज्ञापन और कंटेंट कॉमर्स का अंतर देखना जरूरी है। विज्ञापन में कंपनी कहती है कि उसका उत्पाद अच्छा है। कंटेंट कॉमर्स में दर्शक पहले उत्पाद को कहानी या किरदार के संदर्भ में देखता है और फिर खुद उसके बारे में जानने की इच्छा पैदा करता है। इसलिए यहां खरीदारी का मनोविज्ञान भी अलग है।
उत्पाद अब सिर्फ विज्ञापन नहीं, कहानी का हिस्सा बन जाता है।
दूसरी तरफ नेटफ्लिक्स और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों के बीच साझेदारी भी इसी व्यापक बदलाव की ओर इशारा करती है। फ्लिपकार्ट प्लस सदस्यों के लिए नेटफ्लिक्स मोबाइल प्लान जैसी व्यवस्था इस बात को दिखाती है कि मनोरंजन और ई-कॉमर्स कंपनियां अपने ग्राहक आधार को जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। यह सिर्फ एक कंपनी का दूसरी कंपनी के साथ ऑफर देने का मामला नहीं है। इसके पीछे बड़ा विचार डिजिटल इकोसिस्टम बनाने का है।
ग्राहक मनोरंजन के लिए एक प्लेटफॉर्म से जुड़ता है, खरीदारी के लिए दूसरे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करता है और दोनों कंपनियां मिलकर उस उपभोक्ता के डिजिटल व्यवहार को अधिक व्यापक तरीके से समझने की कोशिश करती हैं। भविष्य में यह मॉडल और आगे बढ़ सकता है। ओटीटी पर कोई कार्यक्रम देखते समय दर्शक को संबंधित उत्पादों की जानकारी मिल सकती है। फिल्म के किरदार का फैशन, किसी शो में इस्तेमाल हुआ मोबाइल फोन, किसी सीरीज में दिखाई गई कार या किसी कार्यक्रम में इस्तेमाल किए गए घरेलू उत्पाद सीधे खरीदारी के विकल्प में बदल सकते हैं। इस तरह स्क्रीन और बाजार के बीच की सीमा लगातार पतली होती जाएगी।
कंटेंट कॉमर्स की सबसे बड़ी प्रयोगशाला हालांकि ओटीटी से पहले सोशल मीडिया बन चुका है। यूट्यूबर, इंस्टाग्राम क्रिएटर और शॉर्ट वीडियो बनाने वाले कंटेंट क्रिएटर लंबे समय से उत्पादों को अपने कंटेंट में शामिल कर रहे हैं। किसी फैशन क्रिएटर के वीडियो में दिखाई देने वाला कपड़ा दर्शक को पसंद आता है। किसी तकनीकी क्रिएटर के वीडियो में मोबाइल फोन की समीक्षा देखकर दर्शक खरीदने का फैसला करता है। किसी फिटनेस या लाइफस्टाइल क्रिएटर के वीडियो में इस्तेमाल होने वाला उत्पाद भी उसके दर्शकों के बीच लोकप्रिय हो सकता है। यहां एक महत्वपूर्ण चीज काम करती है विश्वास। दर्शक जिस क्रिएटर को लंबे समय से देख रहा है, उसके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पाद को वह सामान्य विज्ञापन की तुलना में अधिक भरोसे के साथ देख सकता है। इसलिए क्रिएटर की व्यक्तिगत छवि और दर्शक के साथ उसका संबंध बिक्री में बदलने लगा है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर कंटेंट और कॉमर्स का रिश्ता तेजी से मजबूत हुआ है। अब ओटीटी प्लेटफॉर्म भी इसी व्यवहार को बड़े पैमाने पर अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।
कंटेंट कॉमर्स का अगला बड़ा क्षेत्र लाइव स्ट्रीमिंग हो सकता है। लाइव कार्यक्रमों में दर्शक पहले से ही वास्तविक समय में कंटेंट देखता है। यदि उसी दौरान खरीदारी का विकल्प भी उपलब्ध हो जाए तो बिक्री की संभावना और बढ़ सकती है। क्रिकेट मैच इसका बड़ा उदाहरण बन सकता है। मैच देखते हुए दर्शक किसी खिलाड़ी की जर्सी देखता है और उसी समय उसे खरीदने का विकल्प मिल जाता है। किसी संगीत कार्यक्रम में कलाकार द्वारा पहने गए कपड़े या इस्तेमाल किए गए उत्पाद की जानकारी सामने आ सकती है। कुकिंग शो में इस्तेमाल किए गए उपकरण को उसी समय खरीदने का विकल्प दिया जा सकता है। यहां तक कि लाइव समाचार, मनोरंजन और अन्य कार्यक्रमों में भी संबंधित उत्पादों या सेवाओं को इंटरेक्टिव तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है। क्यूआर कोड, क्लिक करने योग्य विज्ञापन, इंटरेक्टिव वीडियो और स्मार्ट टीवी जैसी तकनीक इस बदलाव को संभव बना रही है। आने वाले समय में दर्शक को सिर्फ विज्ञापन देखिए नहीं कहा जाएगा, बल्कि उसे देखिए और चाहें तो तुरंत खरीदिए का विकल्प दिया जाएगा।
कनेक्टेड टीवी और स्मार्ट टीवी के विस्तार ने इस बदलाव को और आसान बना दिया है। टीवी अब सिर्फ चैनल देखने वाला उपकरण नहीं रहा। वह इंटरनेट से जुड़ा डिजिटल डिवाइस बन चुका है। इसका असर विज्ञापन पर पड़ना तय है। पारंपरिक टीवी विज्ञापन में दर्शक के पास विज्ञापन देखने के अलावा बहुत सीमित विकल्प होता है, लेकिन कनेक्टेड टीवी में विज्ञापन इंटरेक्टिव हो सकता है। दर्शक उत्पाद पर क्लिक कर सकता है, क्यूआर कोड स्कैन कर सकता है, वेबसाइट खोल सकता है या खरीदारी तक पहुंच सकता है। इससे विज्ञापनदाताओं को भी फायदा होगा क्योंकि उन्हें केवल यह पता नहीं चलेगा कि कितने लोगों ने विज्ञापन देखा, बल्कि यह भी पता लगाया जा सकेगा कि कितने लोगों ने उस पर प्रतिक्रिया दी। देखने से क्लिक, क्लिक से रुचि और रुचि से खरीदारी तक का पूरा सफर डिजिटल रूप से मापा जा सकता है। यही डेटा भविष्य में विज्ञापन बाजार की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति बन सकता है।
कंटेंट कॉमर्स विज्ञापनदाताओं के लिए सबसे बड़ा बदलाव मापने के तरीके में ला सकता है। अभी विज्ञापन अभियान की सफलता का आकलन पहुंच, इंप्रेशन, व्यूज या ब्रांड रिकॉल जैसे पैमानों से किया जाता है, लेकिन आगे से कंटेंट कॉमर्स में सवाल बदल जाएगा। कितने लोगों ने विज्ञापन देखा, यह महत्वपूर्ण रहेगा, लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि कितने लोगों ने उत्पाद पर क्लिक किया, कितने लोगों ने उत्पाद की जानकारी देखी और कितने लोगों ने वास्तव में खरीदारी की। यानी इंप्रेशन से कन्वर्जन की ओर ध्यान जाएगा। ब्रांड के लिए यह बेहद आकर्षक मॉडल है क्योंकि उसे अपने विज्ञापन खर्च और बिक्री के बीच संबंध को ज्यादा स्पष्ट रूप से समझने का अवसर मिल सकता है। यदि किसी वेब सीरीज के एक एपिसोड में दिखाए गए उत्पाद की बिक्री अचानक बढ़ती है तो ब्रांड यह समझ सकता है कि कंटेंट ने बिक्री को प्रभावित किया।
इससे विज्ञापन रणनीति भी अधिक डेटा आधारित हो सकती है। हालांकि यह हर खरीदारी में बदलना खतरनाक भी हो सकता है कंटेंट कॉमर्स जितना आकर्षक दिखाई देता है, उतनी ही बड़ी चुनौती इसके सामने है। मनोरंजन और बिक्री के बीच संतुलन बिगड़ा तो दर्शक परेशान हो सकता है। यदि हर कुछ मिनट में कोई उत्पाद खरीदने का विकल्प सामने आने लगे, हर किरदार का कपड़ा बिक्री से जुड़ जाए और हर दृश्य किसी ब्रांड को बेचने लगे, तो कहानी का मूल उद्देश्य कमजोर हो सकता है। दर्शक मनोरंजन देखने आया है, लगातार खरीदारी करने नहीं। इसलिए सफल कंटेंट कॉमर्स वही होगा जिसमें बिक्री कंटेंट पर हावी न हो। उत्पाद कहानी के संदर्भ में स्वाभाविक लगे और दर्शक को यह महसूस न हो कि उसे हर समय कुछ खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है।यानी आने वाले दौर में प्लेटफॉर्म के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कंटेंट को दुकान बनने से बचाते हुए दुकान तक पहुंचने का रास्ता बनाना।
कंटेंट कॉमर्स के विस्तार के साथ डेटा और प्राइवेसी का सवाल भी महत्वपूर्ण होगा। जितना ज्यादा इंटरेक्टिव कंटेंट होगा, कंपनियों को उपभोक्ता की पसंद के बारे में उतना ज्यादा डेटा मिल सकता है। किसने कौन सा कार्यक्रम देखा, किस उत्पाद पर क्लिक किया, किस कीमत वाले उत्पाद में रुचि दिखाई और आखिर में क्या खरीदा। इन सबका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार हो सकता है। यह डेटा कंपनियों के लिए बेहद मूल्यवान है, लेकिन उपभोक्ता के लिए सवाल भी खड़े करता है। इसलिए इस मॉडल की सफलता केवल तकनीक पर निर्भर नहीं करेगी। भरोसा, पारदर्शिता और डेटा सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। दर्शक को यह पता होना चाहिए कि उसका डेटा किस उद्देश्य से इस्तेमाल हो रहा है और उसे किस हद तक व्यक्तिगत विज्ञापन दिखाए जाएंगे।
भारत कंटेंट कॉमर्स के लिए बेहद बड़ा बाजार बन सकता है। देश में करोड़ों इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। स्मार्टफोन का विस्तार हुआ है, डिजिटल भुगतान तेजी से सामान्य हुआ है और ऑनलाइन खरीदारी अब शहरी आबादी तक सीमित नहीं रही। इसके साथ ही ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया कंटेंट की पहुंच भी लगातार बढ़ी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय दर्शक डिजिटल वीडियो देखने और ऑनलाइन खरीदारी करने के लिए दोनों व्यवहारों को तेजी से अपना चुका है। इसलिए अब इन दोनों आदतों को जोड़ना अगला स्वाभाविक कदम हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति दिन में कई घंटे वीडियो देख रहा है और ऑनलाइन खरीदारी भी करता है तो कंपनियों के लिए दोनों गतिविधियों को एक ही डिजिटल अनुभव में जोड़ना स्वाभाविक कारोबारी रणनीति है। यही कारण है कि भारत में कंटेंट कॉमर्स अभी छोटा बाजार होने के बावजूद बड़ी संभावना वाला क्षेत्र माना जा रहा है।
![डिजिटल बाजार कैसे बदल रहा]()
इस बदलाव से केवल ओटीटी कंपनियों को फायदा नहीं होगा। क्रिएटर इकॉनमी भी इससे बड़े पैमाने पर बदल सकती है। आज क्रिएटर की कमाई मुख्य रूप से विज्ञापन, ब्रांड डील, प्रायोजित कंटेंट और सदस्यता से होती है। भविष्य में उसके लिए सीधे उत्पाद बिक्री से कमाई का रास्ता भी खुल सकता है। यदि किसी क्रिएटर के लाखों फॉलोअर हैं और उसके दर्शक उसके सुझाव पर भरोसा करते हैं तो वह सिर्फ ब्रांड का प्रचार करने वाला व्यक्ति नहीं रहेगा। वह एक डिजिटल सेल्स चैनल बन सकता है। यही बदलाव छोटे क्रिएटरों के लिए भी महत्वपूर्ण है। उन्हें करोड़ों व्यूज की जरूरत नहीं होगी, यदि उनके पास छोटा लेकिन भरोसेमंद और खरीदारी करने वाला दर्शक वर्ग है। इससे कंटेंट की गुणवत्ता और दर्शक के साथ संबंध की कीमत बढ़ सकती है।
अब तक स्ट्रीमिंग उद्योग की सबसे बड़ी लड़ाई दर्शकों के समय के लिए थी। कौन सा प्लेटफॉर्म ज्यादा दर्शक ला सकता है, कौन उन्हें ज्यादा समय तक रोक सकता है और कौन ज्यादा सब्सक्रिप्शन बेच सकता है। यही सफलता के प्रमुख पैमाने रहे हैं। कंटेंट कॉमर्स इस समीकरण को बदल सकता है। अब प्लेटफॉर्म के लिए सवाल यह भी होगा कि उसके पास मौजूद दर्शकों को कितने प्रभावी तरीके से ग्राहक में बदला जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर दर्शक को कुछ बेचा जाएगा, बल्कि यह कि कंटेंट के आसपास एक ऐसा कारोबारी इकोसिस्टम तैयार किया जाएगा जिसमें दर्शक को जरूरत और रुचि के अनुसार खरीदारी का विकल्प मिले। यही वजह है कि भविष्य में ओटीटी प्लेटफॉर्म सिर्फ मनोरंजन कंपनियां नहीं रहेंगे। वे विज्ञापन, डेटा, ई-कॉमर्स, क्रिएटर और डिजिटल भुगतान को जोड़ने वाले बड़े प्लेटफॉर्म बन सकते हैं।
कंटेंट कॉमर्स का सबसे बड़ा बदलाव शायद यही है कि यह देखने और खरीदने के बीच की दूरी खत्म कर देता है। आज दर्शक किसी उत्पाद को देखकर उसका नाम इंटरनेट पर खोजता है। कल उसे सिर्फ स्क्रीन पर दिखाई देने वाले उत्पाद पर क्लिक करना होगा। आज क्रिएटर किसी ब्रांड की सिफारिश करता है और दर्शक अलग से खरीदारी करता है। कल वीडियो के नीचे ही खरीदारी का विकल्प मौजूद हो सकता है। आज फिल्म और विज्ञापन दो अलग-अलग चीजें हैं। कल फिल्म के भीतर मौजूद उत्पाद खुद खरीदारी का माध्यम बन सकता है। यानी डिजिटल दुनिया वॉच टू बाय मॉडल की ओर बढ़ रही है। यह बदलाव केवल ओटीटी की कहानी नहीं है।
यह विज्ञापन, ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया, टेलीविजन और क्रिएटर इकॉनमी के एक साथ बदलने की कहानी है। आने वाले वर्षों में किसी कंटेंट की सफलता सिर्फ उसके व्यूज या रेटिंग से तय नहीं होगी। यह भी देखा जाएगा कि उसने दर्शक के व्यवहार को कितना प्रभावित किया और उस प्रभाव को कारोबारी परिणाम में कितना बदला।कल तक स्क्रीन पर दिखाई देने वाली चीजें हमें मनोरंजन देती थीं। अब वही स्क्रीन हमें खरीदारी के लिए भी प्रेरित करेगी। सवाल सिर्फ यह नहीं रहेगा कि दर्शक क्या देख रहा है, बल्कि यह होगा कि वह जो देख रहा है, उसे देखकर क्या खरीद रहा है। यही कंटेंट कॉमर्स की असली क्रांति है, जहां कहानी खत्म होने का इंतजार किए बिना बाजार शुरू हो जाता है।
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यही बदलाव कंटेंट कॉमर्स के नाम से सामने आ रहा है। इसका सीधा मतलब है-मनोरंजन, डिजिटल कंटेंट और खरीदारी को एक ही अनुभव में जोड़ देना। किसी वेब सीरीज में कलाकार ने जो कपड़ा पहना है, किसी शो में इस्तेमाल किया गया गैजेट, किसी कुकिंग कार्यक्रम में इस्तेमाल होने वाला उपकरण या किसी लाइव कार्यक्रम में दिखाई देने वाला उत्पाद, दर्शक के लिए सिर्फ स्क्रीन पर दिखाई देने वाली चीज नहीं रहेगा। उस पर क्लिक करते ही उसके बारे में जानकारी मिलेगी और कई मामलों में वहीं से खरीदारी का रास्ता भी खुल जाएगा। यह बदलाव मामूली नहीं है। यह डिजिटल विज्ञापन की पूरी अर्थव्यवस्था को बदलने की क्षमता रखता है। अभी तक विज्ञापन का उद्देश्य ग्राहक का ध्यान आकर्षित करना था। कंटेंट कॉमर्स उस ध्यान को सीधे खरीदारी में बदलने की कोशिश कर रहा है। यानी विज्ञापन से बिक्री तक का रास्ता छोटा किया जा रहा है।
कंटेंट से मनोरंजन ही नहीं, बिक्री भी
भविष्य के इंटरेक्टिव ओटीटी अनुभव में दर्शक उस जैकेट पर क्लिक कर सकता है। स्क्रीन पर उसका ब्रांड, कीमत, उपलब्ध रंग और आकार जैसी जानकारी सामने आ सकती है और वहीं से खरीदारी भी संभव हो सकती है। इस मॉडल में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि उपभोक्ता को खरीदारी के लिए कंटेंट से बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। जिस कहानी ने उसकी रुचि पैदा की, वही कहानी खरीदारी की वजह भी बन जाती है। यही कारण है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म, ई-कॉमर्स कंपनियां, विज्ञापन एजेंसियां और डिजिटल क्रिएटर इस मॉडल को लेकर तेजी से प्रयोग कर रहे हैं।
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वह दर्शक के लिए संभावित खरीदारी का विकल्प बन जाता है। इसे समझने के लिए पारंपरिक विज्ञापन और कंटेंट कॉमर्स का अंतर देखना जरूरी है। विज्ञापन में कंपनी कहती है कि उसका उत्पाद अच्छा है। कंटेंट कॉमर्स में दर्शक पहले उत्पाद को कहानी या किरदार के संदर्भ में देखता है और फिर खुद उसके बारे में जानने की इच्छा पैदा करता है। इसलिए यहां खरीदारी का मनोविज्ञान भी अलग है।
उत्पाद अब सिर्फ विज्ञापन नहीं, कहानी का हिस्सा बन जाता है।
नेटफ्लिक्स और ई-कॉमर्स
ग्राहक मनोरंजन के लिए एक प्लेटफॉर्म से जुड़ता है, खरीदारी के लिए दूसरे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करता है और दोनों कंपनियां मिलकर उस उपभोक्ता के डिजिटल व्यवहार को अधिक व्यापक तरीके से समझने की कोशिश करती हैं। भविष्य में यह मॉडल और आगे बढ़ सकता है। ओटीटी पर कोई कार्यक्रम देखते समय दर्शक को संबंधित उत्पादों की जानकारी मिल सकती है। फिल्म के किरदार का फैशन, किसी शो में इस्तेमाल हुआ मोबाइल फोन, किसी सीरीज में दिखाई गई कार या किसी कार्यक्रम में इस्तेमाल किए गए घरेलू उत्पाद सीधे खरीदारी के विकल्प में बदल सकते हैं। इस तरह स्क्रीन और बाजार के बीच की सीमा लगातार पतली होती जाएगी।
यूट्यूबर और इन्फ्लुएंसर दिखाया रास्ता
लाइव स्ट्रीमिंग बनेगी अगली बड़ी दुकान
स्मार्ट टीवी बदल देगा विज्ञापन का तरीका
कंटेंट कॉमर्स विज्ञापनदाताओं के लिए सबसे बड़ा बदलाव मापने के तरीके में ला सकता है। अभी विज्ञापन अभियान की सफलता का आकलन पहुंच, इंप्रेशन, व्यूज या ब्रांड रिकॉल जैसे पैमानों से किया जाता है, लेकिन आगे से कंटेंट कॉमर्स में सवाल बदल जाएगा। कितने लोगों ने विज्ञापन देखा, यह महत्वपूर्ण रहेगा, लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि कितने लोगों ने उत्पाद पर क्लिक किया, कितने लोगों ने उत्पाद की जानकारी देखी और कितने लोगों ने वास्तव में खरीदारी की। यानी इंप्रेशन से कन्वर्जन की ओर ध्यान जाएगा। ब्रांड के लिए यह बेहद आकर्षक मॉडल है क्योंकि उसे अपने विज्ञापन खर्च और बिक्री के बीच संबंध को ज्यादा स्पष्ट रूप से समझने का अवसर मिल सकता है। यदि किसी वेब सीरीज के एक एपिसोड में दिखाए गए उत्पाद की बिक्री अचानक बढ़ती है तो ब्रांड यह समझ सकता है कि कंटेंट ने बिक्री को प्रभावित किया।
इससे विज्ञापन रणनीति भी अधिक डेटा आधारित हो सकती है। हालांकि यह हर खरीदारी में बदलना खतरनाक भी हो सकता है कंटेंट कॉमर्स जितना आकर्षक दिखाई देता है, उतनी ही बड़ी चुनौती इसके सामने है। मनोरंजन और बिक्री के बीच संतुलन बिगड़ा तो दर्शक परेशान हो सकता है। यदि हर कुछ मिनट में कोई उत्पाद खरीदने का विकल्प सामने आने लगे, हर किरदार का कपड़ा बिक्री से जुड़ जाए और हर दृश्य किसी ब्रांड को बेचने लगे, तो कहानी का मूल उद्देश्य कमजोर हो सकता है। दर्शक मनोरंजन देखने आया है, लगातार खरीदारी करने नहीं। इसलिए सफल कंटेंट कॉमर्स वही होगा जिसमें बिक्री कंटेंट पर हावी न हो। उत्पाद कहानी के संदर्भ में स्वाभाविक लगे और दर्शक को यह महसूस न हो कि उसे हर समय कुछ खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है।यानी आने वाले दौर में प्लेटफॉर्म के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कंटेंट को दुकान बनने से बचाते हुए दुकान तक पहुंचने का रास्ता बनाना।
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यह विज्ञापन, ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया, टेलीविजन और क्रिएटर इकॉनमी के एक साथ बदलने की कहानी है। आने वाले वर्षों में किसी कंटेंट की सफलता सिर्फ उसके व्यूज या रेटिंग से तय नहीं होगी। यह भी देखा जाएगा कि उसने दर्शक के व्यवहार को कितना प्रभावित किया और उस प्रभाव को कारोबारी परिणाम में कितना बदला।कल तक स्क्रीन पर दिखाई देने वाली चीजें हमें मनोरंजन देती थीं। अब वही स्क्रीन हमें खरीदारी के लिए भी प्रेरित करेगी। सवाल सिर्फ यह नहीं रहेगा कि दर्शक क्या देख रहा है, बल्कि यह होगा कि वह जो देख रहा है, उसे देखकर क्या खरीद रहा है। यही कंटेंट कॉमर्स की असली क्रांति है, जहां कहानी खत्म होने का इंतजार किए बिना बाजार शुरू हो जाता है।
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