मोदी के मास्टर स्ट्रोक से क्यों नाराज हैं दक्षिण के धुरंधर, लोकसभा की 850 सीटें हुईं तो क्या बदलेगा?
CHAKRESH | Apr 15, 2026, 17:26 IST
North south political clash
केंद्र सरकार ने लोकसभा सीटें 543 से 850 करने का प्रस्ताव रखा है। 2011 की जनगणना आधार बनने से दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी घटेगी। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों ने इसे संघवाद पर हमला बताया है।
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- केंद्र सरकार ने लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव दिया है।
- 2011 की जनगणना को आधार बनाने से दक्षिणी राज्यों की सीटें घटेंगी।
- तमिलनाडु को 11 और केरल को 8 लोकसभा सीटें गंवानी पड़ सकती हैं।
- उत्तर प्रदेश को 13 अतिरिक्त सीटें मिलने का अनुमान है।
- दक्षिण के चार मुख्यमंत्रियों ने इसे संघवाद पर हमला बताया है।
लोकसभा में 850 सीटें क्यों?
Why delimitation has intensified the debate on North-South divide - India Today
सरकार का आधिकारिक उद्देश्य महिला आरक्षण अधिनियम (Women Reservation Act), 2023 को लागू करना है। इस कानून को पहले से परिसीमन से जोड़ा गया था। इसलिए बिना परिसीमन के महिला आरक्षण लागू नहीं हो सकता। लेकिन इसी विधेयक में एक और बड़ा प्रावधान छिपा है, जो दक्षिण भारत को सबसे ज्यादा चुभ रहा है।
1971 से 2026 तक का सफर
जब इंदिरा गांधी ने पार्टी को बचाने के लिए 1976 में परिसीमन पर लगा दी थी रोक | Indira gandhi banned delimitation in 1971 to save the party
साल 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने यह फ्रीज 2026 तक बढ़ा दिया। अनुच्छेद 82 (Article 82) के तहत यह व्यवस्था "2026 के बाद प्रकाशित पहली जनगणना तक" लागू रहनी थी। 2021 की जनगणना कोविड की वजह से अभी तक अटकी हुई है। इसलिए मोदी सरकार 2011 के आंकड़ों को आधार बना रही है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और पंजाब ने इस फ्रीज को 25 और साल बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन केंद्र ने उस मांग को अनसुना कर दिया।
दक्षिण को क्या होगा नुकसान?
अभी 543 सीटों में दक्षिण भारत की हिस्सेदारी 24.3 फीसदी है। 2011 की जनगणना के हिसाब से 850 सीटें बंटीं, तो यह हिस्सेदारी घटकर 20.7 फीसदी रह जाएगी। दूसरी तरफ हिंदी हार्टलैंड (Hindi Heartland) की हिस्सेदारी 38.1 से बढ़कर 43.1 फीसदी हो जाएगी।
Thwart potential injustice to the South
2019 की एक रिसर्च के अनुमान और चौंकाने वाले हैं। उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 14.73 फीसदी से बढ़कर 16.24 फीसदी होगी। केरल की 3.68 से घटकर 2.7 फीसदी और तमिलनाडु की 7.18 से घटकर 5.88 फीसदी रह जाएगी। अभी पांचों दक्षिणी राज्यों के पास कुल 129 सीटें (Lok Sabha seats) हैं। इनमें तमिलनाडु की 39, कर्नाटक की 28, आंध्र प्रदेश की 25, केरल की 20 और तेलंगाना की 17 सीटें शामिल हैं।
सरकार और विपक्ष क्या कह रहे हैं?
महिला आरक्षण बिल का समर्थन, लेकिन परिसीमन फार्मूले का विरोध करेगी कांग्रेस - congress will support the women reservation bill but oppose the delimitation formula
लेकिन विपक्ष इस दलील से बिल्कुल सहमत नहीं है। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि विधेयकों में कहीं भी यह लिखित गारंटी नहीं है कि राज्यों के सीट-अनुपात में बदलाव नहीं होगा। पार्टी ने इसे महिला आरक्षण की आड़ में उत्तर-दक्षिण असंतुलन को हवा देने की कोशिश बताया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इसे भारत को बांटने की कोशिश करार दिया है।
दक्षिण के नेता क्यों भड़के?
mk stalin
CPI (M) (Communist Party of India- Marxist) सांसद जॉन ब्रिटास ने तो इसे सीधे "संघीय भारत के लिए मौत का वारंट" कह दिया। संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि बिना बहुदलीय परामर्श और संसदीय समिति को भेजे इतने बड़े विधेयक लाना लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है।
NDA में भी सब एक नहीं
आगे क्या होगा?
Delimitation: South India Won't Back Down | Outlook India
दीर्घकालिक नजरिए से देखें तो तस्वीर और भी जटिल है। अगर यह कानून बन गया, तो दक्षिण भारत की राजनीतिक ताकत स्थायी रूप से कमजोर हो जाएगी। नीति-निर्माण में उत्तर भारत का दबदबा बढ़ेगा और केंद्र-राज्य संबंधों (Centre-State Relations) में नई दरारें पड़ेंगी। तमिलनाडु में DMK (Dravida Munnetra Kazhagam) इसे द्रविड़ पहचान की राजनीति में बदल रही है।
अगर आप दक्षिण भारत के मतदाता हैं, तो आपके एक सांसद पर जनसंख्या का बोझ और बढ़ेगा। यानी संसद में आपकी आवाज और कमजोर होगी। उत्तर भारत के मतदाताओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलेगा, इसलिए उनके इलाके की मांगें केंद्र में ज्यादा सुनी जाएंगी। विपक्ष का सवाल यह है कि कोई सीट नहीं कटेगी का आश्वासन काफी नहीं। असली सवाल यह है कि नई सीटों का बंटवारा किस अनुपात में होगा।
यह खबर क्यों जरूरी है?
FAQ
- लोकसभा सीटें 543 से 850 क्यों की जा रही हैं और इसका आधार क्या है?
केंद्र सरकार ने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के जरिए लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने का प्रस्ताव दिया है। इसमें 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 केंद्रशासित प्रदेशों के लिए होंगी। इसका मुख्य आधार 2011 की जनगणना को बनाया जा रहा है क्योंकि 2021 की जनगणना कोविड महामारी की वजह से अभी तक नहीं हो पाई है। सरकार का कहना है कि यह कदम महिला आरक्षण अधिनियम 2023 को लागू करने के लिए जरूरी है क्योंकि वह कानून परिसीमन से जुड़ा हुआ है। - दक्षिण भारतीय राज्यों को इस परिसीमन से क्या नुकसान होगा?
2011 की जनगणना को आधार बनाने पर दक्षिणी राज्यों की लोकसभा में हिस्सेदारी 24.3 फीसदी से घटकर 20.7 फीसदी रह जाएगी। अनुमान है कि तमिलनाडु को करीब 11 और केरल को 8 सीटें गंवानी पड़ सकती हैं। दरअसल, दक्षिणी राज्यों ने दशकों पहले परिवार नियोजन कार्यक्रम सफलतापूर्वक लागू किए, जिससे उनकी जनसंख्या वृद्धि धीमी रही। अब उसी कम जनसंख्या के आधार पर उन्हें संसद में कम प्रतिनिधित्व मिलेगा, जबकि अधिक आबादी वाले उत्तरी राज्यों को ज्यादा सीटें मिलेंगी। - क्या अमित शाह का यह आश्वासन सच है कि दक्षिणी राज्यों की कोई सीट नहीं घटेगी?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि किसी भी दक्षिणी राज्य की मौजूदा सीटें नहीं घटेंगी। यानी तमिलनाडु की 39, केरल की 20 और अन्य दक्षिणी राज्यों की मौजूदा सीटें बरकरार रहेंगी। लेकिन विपक्ष का तर्क है कि असली सवाल यह नहीं है। सवाल यह है कि 850 सीटों के नए बंटवारे में दक्षिणी राज्यों की कुल हिस्सेदारी का अनुपात घट जाएगा। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी के मुताबिक विधेयकों में कोई लिखित गारंटी नहीं है कि राज्यों के सीट-अनुपात में कोई बदलाव नहीं होगा।
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