BJP के विस्तार के साथ ही घटी मुस्लिम विधायकों की संख्या, सात राज्यों में एक भी नहीं
CHAKRESH | May 10, 2026, 15:30 IST
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भारत की विधानसभाओं की तस्वीर बीते एक दशक में काफी बदल गई है। राजनीति के जानकार इसे भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देख रहे हैं। 2013 में देश की सभी विधानसभाओं को मिलाकर मुस्लिम विधायकों की संख्या 339 थी। अब यह घटकर 255 पर आ गई है।
समझें क्या है पूरा मामला
- 2013 में पूरे देश में मुस्लिम विधायकों की संख्या 339 थी।
- अब यह संख्या घटकर 255 रह गई है, यानी 84 विधायक कम हुए।
- उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में यह गिरावट सबसे ज्यादा रही।
- जिन राज्यों में BJP मजबूत हुई, वहां मुस्लिम विधायक सबसे तेजी से घटे।
- महाराष्ट्र और कर्नाटक में मुस्लिम विधायकों की हिस्सेदारी आबादी से काफी कम है।
एक दशक में कितना बदला मुस्लिम प्रतिनिधित्व ?
दरअसल यह गिरावट अचानक नहीं हुई। जैसे-जैसे BJP (Bharatiya Janata Party) ने अलग-अलग राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत की, मुस्लिम प्रतिनिधित्व कमजोर होता गया।
UP में सबसे बड़ी गिरावट
बंगाल में भी यह संख्या 59 से घटकर 37 हो गई है। बिहार में यह 19 से घटकर 11 पर आ गई। राजस्थान में भी 11 से 6 पर आई।
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बंगाल चुनाव 2026 में नई तस्वीर
पश्चिम बंगाल (West Bengal)में मुसलमान कुल आबादी का 27% हैं। लेकिन नई विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या सिर्फ 33 है, जो कुल का 11.22% है। यह 1969 के बाद का सबसे निचला स्तर है।
महाराष्ट्र और कर्नाटक का हाल
महाराष्ट्र, तमिलनाडु, ओडिशा और आंध्र प्रदेश की कई पार्टियों ने मुसलमानों को टिकट देना लगभग बंद कर दिया है। कर्नाटक में विधायकों की संख्या 11 से घटकर 8 रही। तेलंगाना में 8 से 9 थोड़ी बढ़ी है।
सात राज्यों में शून्य
90 सदस्यों वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा में अब मुस्लिम प्रतिनिधित्व शून्य हो गया है। जम्मू-कश्मीर एक अपवाद है। यहां मुस्लिम विधायकों की संख्या 2014 से पहले 58 थी, जो अब 51 हो गई है।
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केरल का अलग चित्र
Congress पर BJP का वार
Congress ने इस पर पलटवार किया। Congress नेता राहुल गांधी ने कहा कि वोटों को रंग देने की भाषा, यानी हरा, केसरिया या नीला, संविधान की भाषा नहीं है।
ओवैसी ने क्या कहा?
BJP का नजरिया
मुस्लिम संयम बरतें, यह उनके पक्ष में जाएगा: डॉ सुनीलम
UP में 2017 में मुस्लिम विधायकों का अनुपात 17% से गिरकर 6% पर आ गया था। यह बीजेपी की सुनियोजित साजिश रहती है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय को अपोजीशन पार्टियों का समर्थन करना चाहिए, क्योंकि यह लोकतंत्र और संविधान को बचाने की दिशा में आवश्यक है।
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उनका मानना है कि मुस्लिम पार्टी बनाने का प्रयास आत्मघाती साबित हो सकता है, क्योंकि इससे विभाजन होगा और इससे मुस्लिम नेतृत्व को नुकसान होगा। फिलहाल मुस्लिम समुदाय ने बहुत धैर्य और संयम दिखाया है, जो अंततः उनके पक्ष में जाएगा।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (First Past The Post) चुनाव प्रणाली भी इसके लिए जिम्मेदार है। इस व्यवस्था में बहुसंख्यक समुदाय को फायदा होता है और अल्पसंख्यक समुदाय, जो एक जगह केंद्रित नहीं होते, उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है।
लोकसभा में भी यही तस्वीर है। 18वीं लोकसभा में 545 में से सिर्फ 24 सांसद मुस्लिम हैं। इनमें से एक भी BJP का नहीं है।
यह बहस अब सिर्फ संख्याओं की नहीं रही। यह लोकतंत्र (Democracy)में प्रतिनिधित्व की बहस बन गई है। आने वाले चुनावों में यह सवाल और तेज होने की संभावना है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह खबर इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह किसी एक पार्टी की आलोचना नहीं है, बल्कि पूरी चुनावी राजनीति का आईना है। Congress, TMC और अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने भी कई राज्यों में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया।
सामाजिक न्याय की दृष्टि से किसी भी समुदाय का विधायिका से पूरी तरह बाहर होना, नीति निर्माण में उसकी आवाज का खत्म होना है। डिजिटल मीडिया में इस विषय पर एकतरफा और भड़काऊ कंटेंट की भरमार है। इसलिए तथ्यों पर आधारित, संतुलित और संविधान-सम्मत रिपोर्टिंग और भी जरूरी हो जाती है।
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