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आज के दिन की कहानी: आज से ठीक 72 साल पहले यानी 2 जनवरी 1954 को आजाद भारत के इतिहास में एक बहुत बड़ा बदलाव आया था। उस समय के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने दो प्रमुख नागरिक पुरस्कारों की स्थापना के लिए एक आधिकारिक आदेश जारी किया था।
ये पुरस्कार थे भारत रत्न और पद्म विभूषण। यह वह समय था जब आजाद भारत अपने उन सपूतों को पहचानना चाहता था। इन्होंने देश का नाम दुनियाभर में रोशन किया था।
सरकार का मकसद उन लोगों को सम्मान देना था जिन्होंने कला, साहित्य, विज्ञान और सार्वजनिक सेवा में अपना जीवन लगा दिया। भारत रत्न देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। इसकी चमक आज भी पूरी दुनिया में बरकरार है। आइए जानें इसका इतिहास...
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आजाद भारत और सम्मान की नई सोच
आजादी मिलने के बाद भारत ने ब्रिटिश काल के सर और राय बहादुर जैसे टाइटल खत्म कर दिए थे। संविधान के आर्टिकल 18 के तहत टाइटल्स पर रोक लगा दी गई थी।
लेकिन प्रतिभा को सम्मान देने के लिए एक नए और स्वदेशी तरीके की जरूरत महसूस हुई। इसी सोच के साथ 1954 में नागरिक पुरस्कारों की शुरुआत हुई। उस वक्त इन अवॉर्ड्स का मुख्य उद्देश्य केवल देश की सेवा करने वालों को सम्मान देना था।
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1954 में पुरस्कारों की स्थापना का उद्देश्य
भारत एक नया राष्ट्र था और उसे अपने नायकों को पहचानने के लिए एक मंच चाहिए था। ब्रिटिश काल में मिलने वाले सर या नाइटहुड जैसे खिताबों को भारतीय संविधान ने खत्म कर दिया था। इसलिए, एक ऐसे स्वदेशी सम्मान की जरूरत महसूस की गई जो पूरी तरह से भारतीय और लोकतांत्रिक हो।
1954 में जब इसकी शुरुआत हुई, तब इसे केवल जीवित व्यक्तियों को देने का प्रावधान रखा गया था। हालांकि, बाद में 1955 में मरणोपरांत भी सम्मान देने का नियम जोड़ दिया गया ताकि वीरों को याद रखा जाए।
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पद्म पुरस्कारों का शुरुआती ढांचा कैसा था
शुरुआत में पद्म विभूषण को तीन श्रेणियों में बांटा गया था पहला वर्ग, दूसरा वर्ग और तीसरा वर्ग। बाद में 8 जनवरी 1955 को एक नए राष्ट्रपति नोटिफिकेशन के जरिए इनके नाम बदले गए और नए नाम रखे गए।
ये नाम थे 'पद्म विभूषण', 'पद्म भूषण' और 'पद्म श्री'। इन्हें आज हम हर साल गणतंत्र दिवस पर सुनते हैं। ये पुरस्कार किसी भी क्षेत्र में असाधारण सेवा के लिए दिए जाते हैं, चाहे वो खेल हो या समाज सेवा। 1954 से शुरू हुई यह परंपरा आज भारत की पहचान का एक अटूट हिस्सा बन चुकी है।
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भारत रत्न: देश का सबसे अनमोल रत्न
भारत रत्न देश का सबसे ऊंचा नागरिक सम्मान है जो 'असाधारण सेवा' के लिए दिया जाता है। शुरुआत में यह सम्मान कला, साहित्य, विज्ञान और सार्वजनिक सेवा तक ही सीमित रखा गया था। बाद में इसमें मानवीय प्रयास के किसी भी क्षेत्र को शामिल कर लिया गया।
क्या आप जानते हैं कि 1954 में सबसे पहले तीन महापुरुषों को यह अवॉर्ड मिला था? वे थे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, सी. राजगोपालाचारी और महान वैज्ञानिक सी.वी. रमन।
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भारत रत्न का डिजाइन पीपल के पत्ते के आकार का होता है जिस पर सूर्य की आकृति बनी होती है। इसके नीचे हिंदी में 'भारत रत्न' लिखा होता है। पीछे की तरफ अशोक स्तंभ बना होता है।
यह अवॉर्ड राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक भव्य समारोह में देश के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है। यह सम्मान किसी विशेष जाति, धर्म या लिंग के भेदभाव के बिना दिया जाता है। साल 1954 से शुरू हुई यह परंपरा आज भी भारत की आन-बान-शान बनी हुई है।
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1954 के पहले भारत रत्न विजेता कौन थे
जब 1954 में पहली बार इन पुरस्कारों की घोषणा हुई, तो पूरा देश खुशी से झूम उठा था। इस सर्वोच्च सम्मान को पाने वाले पहले तीन दिग्गज थे— डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, सी. राजगोपालाचारी और महान वैज्ञानिक सी.वी. रमन।
इन तीनों हस्तियों ने शिक्षा, राजनीति और विज्ञान के क्षेत्र में भारत का नाम पूरे विश्व में रोशन किया था। डॉ. राधाकृष्णन एक महान दार्शनिक थे, जबकि सी.वी. रमन ने फिजिक्स में नोबेल पुरस्कार जीतकर भारत का मान बढ़ाया था। सी. राजगोपालाचारी आजाद भारत के आखिरी गवर्नर जनरल थे और एक कुशल राजनेता भी रहे।
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विवादों और पाबंदियों का दौर
भारत रत्न और पद्म पुरस्कारों का सफर हमेशा से इतना आसान और विवादों से मुक्त नहीं रहा है। 1977 में जब मोरारजी देसाई की सरकार आई, तो इन पुरस्कारों को अचानक पूरी तरह बंद कर दिया गया था।
जनता पार्टी की सरकार का मानना था कि ये सम्मान डिग्रीज के समान हैं। समानता के खिलाफ हैं। हालांकि, 1980 में इंदिरा गांधी की सरकार ने सत्ता में आते ही इन पुरस्कारों को दोबारा बहाल कर दिया। इसके बाद 1990 के दशक में भी कुछ अदालती फैसलों की वजह से इन्हें कुछ समय के लिए रोका गया था।
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कुल मिलाकर साल 1954 से शुरू हुआ भारत रत्न और पद्म पुरस्कारों का यह सफर सिर्फ सम्मान की बात नहीं। बल्कि भारतीय प्रतिभा और संघर्ष की पहचान है। तमाम विवादों और रुकावटों के बावजूद ये पुरस्कार आज भी हर भारतीय के लिए गौरव का सबसे बड़ा प्रतीक बने हुए हैं।
Reference Links
02 जनवरी की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं
आज का इतिहास में हर दिन का अपना एक अलग महत्व होता है। 02 जनवरी का दिन भी इतिहास (आज की यादगार घटनाएं) में कई महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए दर्ज है। इस दिन दुनिया में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी।
आइए जानते हैं 02 जनवरी (आज की तारीख का इतिहास) को भारत और विश्व में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में, जो आपके सामान्य ज्ञान को बढ़ा सकती हैं-
विश्व इतिहास की प्रमुख घटनाएं...
1839: फ्रांसीसी फोटोग्राफर लुई दागुएरे ने दुनिया के सामने चांद की पहली तस्वीर पेश की थी।
1843: ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में पहली बार नियमित डाक सेवा और 'लेटर बॉक्स' की शुरुआत हुई।
1882: लंदन में दुनिया का पहला कोयला आधारित बिजली स्टेशन (होलबोर्न वायडक्ट) चालू किया गया था।
1890: ऐलिस सेंगर व्हाइट हाउस में काम करने वाली पहली महिला कर्मचारी बनीं।
1900: अमेरिका ने चीन के साथ व्यापार के लिए प्रसिद्ध 'ओपन डोर' नीति की घोषणा की थी।
1942: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना ने फिलीपींस की राजधानी मनीला को अपने कब्जे में लिया।
1959: सोवियत संघ ने चांद की ओर जाने वाला दुनिया का पहला अंतरिक्ष यान 'लूना-1' लॉन्च किया था।
1967: हॉलीवुड अभिनेता रोनाल्ड रीगन ने कैलिफोर्निया के गवर्नर के रूप में शपथ लेकर अपना राजनीतिक सफर शुरू किया।
1971: स्कॉटलैंड के ग्लासगो में फुटबॉल मैच के दौरान हुई भगदड़ में 66 लोगों की मौत हो गई थी।
2004: नासा के 'स्टारडस्ट' अंतरिक्ष यान ने धूमकेतु वाइल्ड 2 के पास से उड़कर उसके कणों के नमूने लिए।
2008: इतिहास में पहली बार कच्चे तेल (Oil) की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुँच गई थी।
2013: मॉरिटानिया देश में पर्यावरण सुरक्षा के लिए प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल पर पूरी तरह बैन लगा दिया गया।
2016: सऊदी अरब में शिया मौलवी निम्र अल निम्र समेत 47 लोगों को एक साथ फांसी दी गई थी।
भारत की महत्वपूर्ण घटनाएं
1954: भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न अवार्ड देने की शुरुआत आज ही के दिन हुई थी।
1757: रॉबर्ट क्लाइव ने नवाब सिराजुद्दौला को हराकर कलकत्ता (अब कोलकाता) पर फिर से कब्जा कर लिया था।
1975: बिहार के समस्तीपुर में एक बम विस्फोट में तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा की हत्या कर दी गई थी।
1989: मशहूर नाट्यकर्मी सफदर हाशमी पर एक नाटक के दौरान हमला हुआ, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
1994: दक्षिण मैक्सिको में सेना और विद्रोहियों के बीच हुई भीषण जंग में 57 लोगों की जान चली गई थी।
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