बांकीपुर-दतिया उपचुनाव में बीजेपी टिकट विवाद के पीछे की इनसाइड स्टोरी: पीढ़ीगत बदलाव का ट्रेलर?
Sameer Chougaonkar | Jul 13, 2026, 14:23 IST
बीजेपी में पीढ़ीगत बदलाव का ट्रेलर
बांकीपुर और दतिया उपचुनाव में टिकट वितरण को लेकर बीजेपी में मचे घमासान ने पार्टी के भीतर पीढ़ीगत बदलाव और आंतरिक सत्ता संघर्ष को उजागर कर दिया है। नितिन नबीन और नरोत्तम मिश्रा दोनों को झटका लगा है।
बांकीपुर और दतिया उपचुनाव क्यों बने राष्ट्रीय चर्चा का विषय?
बिहार की बांकीपुर सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के इस्तीफे के कारण खाली हुई और मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट कांग्रेस विधायक को सजा होने के कारण खाली हुई।
विधानसभा सीट खाली होने पर उपचुनाव की घोषणा होना सामान्य है। ऐसे में उपचुनाव राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां नहीं बटोरते। लेकिन बांकीपुर और दतिया विधानसभा सीट में टिकट वितरण में ही ऐसी असामान्य स्थितियां उत्पन्न हुईं कि पूरे देश ने इन दोनों सीटों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
मजेदार बात यह है कि दोनों सीटें कांग्रेस की गुटबाजी या अंतर्कलह के कारण नहीं, बल्कि अनुशासित और संगठित मानी जाने वाली भारतीय जनता पार्टी में मचे उठापटक के कारण चर्चा में रहीं।
नितिन नबीन का बांकीपुर से क्या रिश्ता है?
नितिन नबीन से पहले उनके पिता नबीन किशोर सिन्हा बांकीपुर सीट से लगातार चार बार विधायक चुने गए थे। साल 2006 में पिता के निधन के बाद हुए उपचुनाव में नितिन नबीन पहली बार विधानसभा पहुंचे। उसके बाद उन्होंने इस सीट को अपना राजनीतिक घर बना लिया था। अचानक राष्ट्रीय अध्यक्ष बने नितिन नबीन को पार्टी ने राज्यसभा भेजा और नितिन नबीन को दो दशक बाद बांकीपुर सीट छोड़नी पड़ी।
बांकीपुर में नितिन नबीन का वोट ग्राफ क्या कहता है?
चार दशक से नितिन नबीन के परिवार की चुनावी कहानी इस सीट की अहमियत समझाती है। साल 2006 के उपचुनाव में उन्हें 76 हजार 25 वोट मिले। 2010 में परिसीमन के बाद बनी बांकीपुर सीट से वे 78 हजार 771 वोटों के साथ जीते।
2015 में जब नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव का महागठबंधन बिहार में भाजपा पर भारी पड़ा, तब भी बांकीपुर में नितिन नबीन ने 86759 वोट हासिल किए और सीट पर जीत दर्ज की। साल 2020 में कोविड की छाया में मतदान कम हुआ फिर भी वे 83 हजार 68 वोटों के साथ जीते। साल 2025 में उन्होंने अपना सबसे बड़ा आंकड़ा छुआ और 98 हजार 299 वोट पाए।
यह ग्राफ बताता है कि बांकीपुर में भाजपा की जीत सिर्फ पार्टी वोट पर निर्भर नहीं थी। उसमें नितिन नबीन की निजी उपलब्धता, संपर्क और स्थानीय भरोसे की बड़ी भूमिका थी।
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बांकीपुर में टिकट को लेकर क्या घमासान मचा?
बांकीपुर सीट राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की थी, तो उम्मीदवार भी उन्होंने ही तय करना था। नितिन नबीन ने अपने करीबी अभिषेक कुमार को बिना स्थानीय नेताओं से चर्चा किए टिकट घोषित कर दिया था। अभिषेक के मैदान में उतरते ही उनको मैदान से खदेड़ने की बिसात बिछाने की तैयारी शुरू हो गई थी।
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के साथ संगठन के कई पूर्व पदाधिकारियों ने मिलकर अभिषेक कुमार के पिता के लालू के साथ चारा की कमाई साझा करने वाले दागदार इतिहास से दिल्ली के बड़े नेताओं को अवगत कराया। साथ ही, प्रशांत किशोर की जीत की संभावना व्यक्त कर दी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अभिषेक कुमार सिन्हा को टिकट देने पर गहरी निराशा जाहिर की।
दिल्ली में अमित शाह सक्रिय हुए और राष्ट्रीय अध्यक्ष को शाह ने पटना भेजकर मामले का पटाक्षेप करने के लिए कहा।
बिहार के दिग्गज नेताओं और संघ के प्रभावशाली नेताओं के एकसाथ विरोध ने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष को अपने चयन पर विचार करने पर विवश किया। नितिन नबीन दबाव को दरकिनार करने की स्थिति में नहीं थे, ऐसे में कदम पीछे खींचकर संघ परिवार से जुड़े और नितिन नबीन के भी भरोसेमंद रहे नीरज कुमार को उतार दिया गया।
भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में यह पहला मामला है जब राष्ट्रीय अध्यक्ष को अपनी ही सीट पर अपने पसंद के उम्मीदवार को दबाव में बदलना पड़ा हो।
जनसुराज के प्रशांत किशोर के इस सीट से चुनाव लड़ने और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की सीट होने के कारण बांकीपुर पहले से ही हाईप्रोफाइल सीट बन गई है। ऐसे में उम्मीदवार को लेकर बीजेपी में हुई उठापटक ने बीजेपी की चिंता बढ़ा दी है। देखना दिलचस्प होगा कि बांकीपुर का बांका कौन बनता है।
दतिया में नरोत्तम मिश्रा का टिकट कैसे कटा?
दतिया विधानसभा सीट से चुनाव हार चुके बीजेपी के नरोत्तम मिश्रा दतिया उपचुनाव में अपना टिकट तय मानकर चल रहे थे। पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार घोषित होने से पहले ही नामांकन फार्म खरीद लिया। घर पर और पार्टी कार्यालय में बैठकें करने लगे। पोस्टर छपवा लिए। टीम तैयार कर ली।
दतिया जिलाध्यक्ष और पदाधिकारियों के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को भोजन पर आमंत्रित कर लिया। नरोत्तम का बेटा पिता के फिर से गृह मंत्री बनने की बात करने लगा।
नरोत्तम मिश्रा के दावे क्या थे?
नरोत्तम मिश्रा ने भोपाल से लेकर दिल्ली तक सबको साधने का दंभ भरा, लेकिन सब धरा रह गया। उम्मीदवार का नाम घोषित होते ही नरोत्तम के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। नरोत्तम की जगह आशुतोष तिवारी को टिकट दिया। एक ब्राह्मण का टिकट काटा तो दूसरे ब्राह्मण को टिकट दे दिया। बड़े नेता का टिकट काटकर छोटे नेता को टिकट दे दिया।
दतिया में हिंसक विरोध क्यों भड़का?
पूरे देश में पार्टी की किरकिरी होते देख नरोत्तम को तत्काल भोपाल बुलाया गया। दतिया में तेवर दिखाने वाले नरोत्तम के तेवर भोपाल पहुंचते ही ठंडे पड़ गए।
पार्टी ने नरोत्तम को क्या संदेश दिया?
पार्टी ने साफ कर दिया कि कोई सीट किसी की बपौती नहीं है। कोई पार्टी से बड़ा समझने की भूल न करे। पार्टी है तो सब कुछ है वरना कुछ भी नहीं है। संगठन सर्वोपरि है। मोह से मुक्त होना है, और दूसरों के लिए जगह खाली करनी है। फिलहाल नरोत्तम ने अपमान का घूंट पी लिया है। नरोत्तम को नितिन नबीन की टीम में जगह देकर दिल्ली लाया जाता है, या प्रदेश में ही कार्यकर्ता बनाकर छोड़ दिया जाता है, यह देखना बाकी है।
क्या बीजेपी में अब पीढ़ीगत बदलाव की शुरुआत हो चुकी है?
इस बात की पूरी संभावना है कि अगले कुछ महीनों में मध्य प्रदेश सरकार में बड़ा फेरबदल होगा और गुजरात की तर्ज पर सारे मंत्री बदल दिए जाएंगे। कई दिग्गजों का नपना तय है। बस तारीख तय होना बाकी है। टिकट नरोत्तम का कटा है, और सूखकर कांटा तमाम दिग्गज नेता हो रहे हैं। बारी-बारी सब नरोत्तम बनेंगे, कोई आज बना है, कोई कल बनेगा।
आने वाले दिनों में तमाम राज्यों में नरोत्तम प्रकरण देखने को मिलेंगे। बीजेपी ने 45 साल के नितिन नबीन को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर केंद्र के साथ प्रदेश में भी पीढ़ीगत बदलाव करने का तय किया है। लंबे समय से राजनीति में जमे हुए नेताओं को नए चेहरों के लिए जगह खाली करनी होगी। यह बदलाव हर राज्य में होगा।
दोनों सीटों पर मुकाबला कितना कड़ा है?
दतिया में भाजपा से संघ, संगठन, सरकार और प्रशासन चुनाव लड़ेगा और कांग्रेस से घनश्याम सिंह के व्यक्तिगत संपर्क और उनकी मोहक मुस्कान।
अगर आशुतोष तिवारी हारते हैं, तो ठीकरा नरोत्तम पर फूटेगा और 2028 के विधानसभा चुनाव में नरोत्तम या उनके परिवार का पत्ता हमेशा के लिए इस सीट से पार्टी काट देगी। अगर आशुतोष जीतते हैं तो यह संगठन और मोहन सरकार के कामकाज की जीत मानी जाएगी और 2028 में आशुतोष तिवारी फिर से बीजेपी के उम्मीदवार होंगे।
मतलब यह सीट अब नरोत्तम के हाथ से निकल चुकी है। भाजपा जीते या हारे, नुकसान हर हाल में नरोत्तम का होना है।
बांकीपुर-दतिया प्रकरण से बीजेपी के लिए क्या सीख निकलती है?
बांकीपुर सीट पर राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की प्रतिष्ठा दांव पर है। दतिया सीट पर प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और मुख्यमंत्री मोहन यादव की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।
दतिया विधानसभा उप-चुनाव का परिणाम मध्य प्रदेश की राजनीति को नए सिरे से लिखने वाला साबित होगा, भले भाजपा जीते या हारे।
नोट- प्रिंट मीडिया में दो दशक से सक्रिय समीर चौगांवकर राजनीतिक पत्रकारिता के एक विश्वसनीय और स्थापित नाम हैं। इंडिया टुडे, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और एशिया टाइम्स सहित देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर उनके लेख प्रकाशित होते हैं। भाजपा, पीएमओ, संसद और आरएसएस की गहरी कवरेज तथा प्रमुख न्यूज चैनलों पर तथ्यपरक राजनीतिक विश्लेषण उनकी पहचान है।इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।
FAQ
- बांकीपुर सीट क्यों खाली हुई?
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के राज्यसभा जाने और विधायक पद से इस्तीफा देने के कारण बांकीपुर सीट खाली हुई। वे लगभग 20 साल इस सीट के विधायक रहे थे। - दतिया में नरोत्तम मिश्रा का टिकट क्यों कटा?
पार्टी ने संगठन और मुख्यमंत्री मोहन यादव के कामकाज को प्राथमिकता देते हुए नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को टिकट दिया। इससे नरोत्तम समर्थकों में नाराजगी फैली। - बांकीपुर में उम्मीदवार कैसे बदला गया?
नितिन नबीन ने पहले अभिषेक कुमार को टिकट दिया था, लेकिन सीएम सम्राट चौधरी, रविशंकर प्रसाद और संघ के विरोध के बाद अमित शाह के हस्तक्षेप से नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया गया। - दतिया-बांकीपुर उपचुनावों का बड़ा राजनीतिक संदेश क्या है?
दोनों प्रकरण बीजेपी में शुरू हो रहे पीढ़ीगत बदलाव का संकेत हैं, जहां पुराने दिग्गज नेताओं को संगठन के फैसले के आगे झुकना पड़ रहा है।
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