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तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक से शुरू हुई राहुल गांधी की नई सियासत
Sameer Chougaonkar | Jun 01, 2026, 16:31 IST
समीर चौगांवकर का आर्टिकल
देर से ही सही राहुल गांधी बड़े फैसले लेने लगे हैं। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक को लेकर ये नजर भी आता है। वरिष्ठ पत्रकार समीर चौगांवकर बता रहे हैं इन दिनों कांग्रेस की राजनीति में क्या चल रहा है…
राहुल गांधी का बदला अंदाज: सही वक्त पर सही फैसले
राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट की मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर लड़ाई, मध्यप्रदेश में कमलनाथ बनाम ज्योतिरादित्य सिंधिया की लड़ाई, छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल बनाम टीएस सिंहदेव की लड़ाई और पंजाब में मुख्यमंत्री पद से कैप्टन अमरिंदर को हटाने पर अमरिंदर सिंह का पार्टी से बगावत करना और पंजाब में सत्ता से बेदखल होती कांग्रेस को देश ने देखा है। वहीं, अब लग रहा है कि कांग्रेस से ज्यादा राहुल अपने बुरे अनुभवों से सीख रहे हैं और सही समय पर सही फैसले करने का साहस भी जुटा रहे हैं।
राहुल के तीन बड़े फैसले: तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक
2023 कर्नाटक चुनाव: डीके शिवकुमार का नेतृत्व और सीएम की दौड़
मुख्यमंत्री बनने के लिए सिद्धारमैया और डीके के अपने-अपने आधार और दावे थे। शिखर की कुर्सी के लिए दोनों के दावे मजबूत थे। सिद्धारमैया 2013 से 2018 तक पूरे पांच साल मुख्यमंत्री रह चुके थे और अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवा चुके थे। सिद्धारमैया ने कर्नाटक में पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और दलितों का सामाजिक मेल तैयार किया था और सिद्धारमैया के पास कांग्रेस विधायकों के बहुमत का समर्थन हासिल था।
वहीं दूसरी तरफ डीके शिवकुमार कुशल संगठनकर्ता से ज्यादा कांग्रेस के एटीएम के रूप में पहचान बना चुके थे। डीके के पास कर्नाटक के ताकतवर वोक्कालिगा समुदाय का पूरा समर्थन था, जिस समुदाय से खुद डीके आते हैं। डीके शिवकुमार के पास विधायकों का बहुमत नहीं था, लेकिन डीके के पास सोनिया गांधी की बेधड़क वफादारी थी। आखिर में सिद्धारमैया को सीएम बनाने का फैसला राहुल गांधी ने किया और डीके शिवकुमार को ढाई साल बाद मुख्यमंत्री बनाने का वादा खुद सोनिया गांधी ने किया था।
नवंबर 2025 से नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा: डीके ने धैर्य रखा
डीके शिवकुमार का सियासी सफर: 1985 से सत्ता के शिखर तक
सिद्धारमैया का अगला कदम: डीके के लिए संघर्ष के संकेत
सिद्धारमैया का कर्नाटक में विधायक बनकर राजनीति करने का फैसला डीके के लिए संघर्ष और सिरदर्द हो सकता है। कर्नाटक में सक्रिय रहकर सिद्धारमैया क्या व्यवस्था के भीतर एक प्रहरी की भूमिका निभाएंगे या फिर व्यवधान उत्पन्न करेंगे- यह आने वाला समय ही बताएगा।
डीके के सामने चुनौतियां : जातिगत समीकरण और दो शक्ति केंद्र
सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार पहले भी साथ काम कर चुके हैं। लेकिन दोनों के बीच रिश्ते कभी सहज नहीं रहे। सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री के रूप में पहले कार्यकाल में डीके शिवकुमार को पहले छह महीने सिद्धारमैया ने सरकार में शामिल नहीं किया था। छह महीने बाद सोनिया गांधी के हस्तक्षेप के बाद डीके सिद्धारमैया सरकार में ऊर्जा मंत्री बने थे।
वोक्कालिगा वोट और निकाय चुनाव: डीके के पास समय कम, चुनौतियां ज्यादा
वह डीके शिवकुमार ही थे, जिनके कारण वोक्कालिगा प्रभाव वाले ओल्ड मैसूर बेल्ट से आने वाली 61 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने 39 सीटें जीती थीं- मतलब 64 फीसदी सीटें। हालांकि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को इस क्षेत्र से नुकसान हुआ था और इस क्षेत्र की 12 लोकसभा सीटों में से सिर्फ दो सीटें कांग्रेस जीत सकी थी।
कुर्बा जाति की नाराजगी और ओबीसी समीकरण: कांग्रेस की असली परीक्षा
कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवराज उर्स के बाद सिद्धारमैया कर्नाटक के अहिंदा के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे थे। अहिंदा मतलब अल्पसंख्यक, पिछड़ा और दलितों की सोशल इंजीनियरिंग, जिनकी प्रदेश में आबादी 62 फीसदी है।
कांग्रेस के संकटमोचन के सामने अब खुद का संकट
चुनाव किसी नेता की सहनशक्ति, संगठन शक्ति और राजनीतिक समझ और कौशल की परीक्षा लेते हैं। लेकिन शासन उससे कहीं कठिन इम्तिहान होता है। डीके शिवकुमार ने संगठन में अपनी धाक जमाई है, शासन कैसे करते हैं यह आने वाला समय ही बताएगा।
लोकसभा चुनाव 2029 में हैं, उसके पहले 2028 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव डीके की सबसे बड़ी परीक्षा होंगे। कांग्रेस के संकटमोचन के लिए चुनौतियां कुर्सी के साथ आई हैं- इनसे निपटने की डीके की कुशलता और राजनीतिक सूझबूझ ही उनका कर्नाटक में भविष्य तय करेगी। (कर्नाटक की राजनीति)
नोट- प्रिंट मीडिया में दो दशक से सक्रिय समीर चौगांवकर राजनीतिक पत्रकारिता के एक विश्वसनीय और स्थापित नाम हैं। इंडिया टुडे, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और एशिया टाइम्स सहित देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर उनके लेख प्रकाशित होते हैं। भाजपा, पीएमओ, संसद और आरएसएस की गहरी कवरेज तथा प्रमुख न्यूज चैनलों पर तथ्यपरक राजनीतिक विश्लेषण उनकी पहचान है। इस लेख में प्रकाशित विचार उनके व्यक्तिगत हैं।
FAQ
- डीके शिवकुमार कर्नाटक के मुख्यमंत्री कब बने?
डीके शिवकुमार 3 जून 2025 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने। सिद्धारमैया के ढाई साल के कार्यकाल के बाद कांग्रेस हाईकमान ने यह बदलाव किया। यह फैसला 2023 के चुनाव से पहले किए गए वादे के अनुसार लिया गया। - सिद्धारमैया को CM पद से क्यों हटाया गया?
केरल और तमिलनाडु में जीत के बाद कांग्रेस ने दक्षिण भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए यह फैसला किया। डीके शिवकुमार को CM बनाने का वादा सोनिया गांधी ने 2023 में किया था। सिद्धारमैया ने CM पद छोड़ा लेकिन दिल्ली जाने का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। - डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
डीके के सामने OBC और कुर्बा समुदाय की नाराजगी, सिद्धारमैया की कर्नाटक में सक्रिय भूमिका और 2028 विधानसभा चुनाव सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। जातीय समीकरण साधना और सरकार को स्थिर रखना उनकी प्राथमिकता होगी। BJP इस बदलाव को OBC विरोधी बताकर राष्ट्रीय मुद्दा बना सकती है।
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