अरावली में मिला प्राचीन काल का खजाना, चट्टानों पर हो रही खूबसूरत नक्काशी

Jageshwar prasad | Jun 08, 2026, 16:58 IST
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अरावली में प्राचीन मानव गतिविधियों के दुर्लभ निशान मिले
अरावली में प्राचीन मानव गतिविधियों के दुर्लभ निशान मिले

गुड़गांव के भोंडसी अरावली जंगलों में प्रागैतिहासिक पेट्रोग्लिफ्स और पाषाण काल के औजार मिले हैं। ASI इसकी जांच कर रही है, ऐतिहासिक स्थानों पर भू-माफिया का भी खतरा है।

अरावली की पहाड़ियों पर वन्यजीवों के रास्ते पर प्राचीन काल का नायाब खजाना मिला है। चट्टानों की सतह पर जगह-जगह ऐसी नक्काशी या डिज़ाइन किए गए चित्र हैं, जो प्रागैतिहासिक काल के अवशेष एक साथ बचे हुए दिखाई देते हैं।

चार महीने पहले गुड़गांव के भोंडसी अरावली जंगलों की पथरीली चट्टानों के बीच वन्यजीवों के एक रास्ते (वाइल्डलाइफ ट्रेल) ने प्रकृति प्रेमियों को एक अनोखी चट्टान तक पहुंचा दिया। इस चट्टान की सतह पर दर्जनों उकेरे गए प्याले के आकार के गड्ढे (कप-मार्क्स), ज्यामितीय ग्रिड (चौखाने) और एक पैर के आकार की बड़ी नक्काशी बनी हुई थी।

​उस जगह की पहचान अब प्राचीन पेट्रोग्लिफ्स (चट्टानों पर नक्काशी या डिज़ाइन किए गए चित्र), संभावित पत्थरों वाले खेल के बोर्ड (गेम बोर्ड) और पत्थरों के औजारों के एक समूह के रूप में की गई है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अरावली क्षेत्र उभरते हुए व्यापक पुरातात्विक पैटर्न का एक हिस्सा है, जहां एक ही परिदृश्य में कई प्रागैतिहासिक काल के अवशेष एक साथ बचे हुए दिखाई देते हैं।

अरावली पर्वत श्रृंखला प्री कैंब्रियन में निर्मित पर्वत श्रृंखला है। इसका विस्तार गुजरात के पालनपुर से दिल्ली के रायसीना हिल्स तक है। इसका सर्वाधिक हिस्सा राजस्थान में आता है, जबकि विस्तार हरियाणा में भी है जहां ये खोज हुई है।

मानव इतिहास की अटूट कड़ी​

दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में पीएचडी स्कॉलर और फैकल्टी मेंबर आकाश गुप्ता ने भोंडसी से मिली इन सामग्रियों की जांच की है। उन्होंने कहा कि यहां एक ऐतिहासिक निरंतरता (क्रोनोलॉजिकल कंटिन्यूटी) देखने को मिल रही है।

भोंडसी अरावली जंगलों में प्रागैतिहासिक पेट्रोग्लिफ्स और औजार मिले
भोंडसी अरावली जंगलों में प्रागैतिहासिक पेट्रोग्लिफ्स और औजार मिले


मानव गतिविधि की दुर्लभ निरंतरता

यह खोज बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह शुरुआती औजार बनाने की परंपराओं को बाद के धार्मिक, प्रतीकात्मक और सामाजिक जीवन से जोड़ने वाली मानव गतिविधि की एक दुर्लभ निरंतरता को दर्शाती है।

​गुप्ता ने बताया कि फ्रांसीसी पुरातत्वविद् आंद्रे लेरोई-गौरहान जैसे विद्वान चट्टानों पर हाथ से की गई नक्काशी को मानसिक और संज्ञानात्मक विकास (कॉग्निटिव शिफ्ट) के प्रमाण के रूप में देखते थे। इस नई खोज को संदर्भ में रखते हुए उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में लोअर पैलियोलिथिक (पुरापाषाण काल) से लेकर मेसोलिथिक (मध्यपाषाण काल) तक के संकेत मिले हैं।
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उन्होंने बताया कि यहां मिले हैंडएक्स (हस्त-कुठार) और क्लीवर्स (कुल्हाड़ी जैसे औजार) शुरुआती पाषाण-औजार परंपराओं की ओर इशारा करते हैं, जबकि अन्य औजार बाद की मिडल पैलियोलिथिक गतिविधि (3,00,000 से 50,000 वर्ष पहले) को दर्शाते हैं।

वहीं, कप्यूल्स (प्याले के आकार के गड्ढे) और रॉक-आर्ट जैसे निशान बाद के प्रतीकात्मक या धार्मिक चरणों के होने की अधिक संभावना है। विशेष रूप से मेसोलिथिक काल के, जब प्रागैतिहासिक समुदायों को पेंटिंग, दफनाने की प्रथाओं और सामाजिक जीवन के अन्य प्रतीकों को छोड़ने के लिए जाना जाता है।

​जांच और सुरक्षा की मांग

अधिकारियों ने बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के चंडीगढ़ सर्कल और हरियाणा पुरातत्व विभाग की टीमें साइट का दस्तावेजीकरण कर रही हैं। इसमें पेट्रोग्लिफ्स और अन्य अवशेष शामिल हैं। उन्होंने एक रिपोर्ट भी सौंपी है।
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ASI चंडीगढ़ सर्कल की अधीक्षण पुरातत्वविद् (Superintending Archaeologist) कामेई अथोइलू कबुई ने कहा, इस साइट को भू-माफियाओं से बचाने की ज़रूरत है। इस संबंध में राज्य सरकार के विभाग द्वारा आगे कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
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ASI चंडीगढ़ के उप अधीक्षण पुरातत्वविद् अनिल तिवारी ने कहा, एक संक्षिप्त रिपोर्ट तैयार की गई है, लेकिन अभी भी आगे के काम और गहन शोध की बहुत गुंजाइश है।

​तेंदुए की आवाज़ ने कराया इतिहास से वास्ता

डॉ. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के स्कूल ऑफ हेरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट में पीएचडी स्कॉलर और शोधकर्ता शैलेश बैसला के अनुसार भोंडसी में यह दस्तावेजीकरण तब शुरू हुआ, जब वन्यजीव फोटोग्राफर यतिन वर्मा और रामकुमार ने फरवरी में जंगल में मिले इन कप-मार्क वाले पत्थरों की तस्वीरें साझा कीं।

​इस खोज को याद करते हुए वर्मा ने बताया कि वह अपनी टीम के साथ बर्ड-वॉचिंग (पक्षियों को देखने) के एक दौरे पर थे। हमने अपने ऊपर एक चट्टान से तेंदुए की दहाड़ सुनी। वह चट्टान स्थानीय निवासियों के बीच योग और मनोरंजन के लिए काफी लोकप्रिय है।

जब पक्षियों की आवाजें आनी बंद हुईं, तो हम इलाके की पड़ताल करने के लिए पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गए। वहां मुझे चट्टानों पर खुदे हुए कई ऐसे निशान दिखे, जो बिल्कुल उन पेट्रोग्लिफ्स (पाषाण-नक्काशी) जैसे थे, जिन्हें मैंने अक्सर रिपोर्टों और समाचार पत्रों में देखा था।

भोंडसी क्लस्टर बेहद अनोखा

बाद में स्कॉलर बैसला ने कोट गांव के एक स्थानीय विशेषज्ञ तेजवीर मावी के साथ इस स्थल का दौरा किया। मावी अरावली के भूगोल की गहरी समझ रखते हैं। उनके ज़मीनी ज्ञान ने शोधकर्ताओं को इस पूरी पहाड़ी श्रृंखला में कई प्रागैतिहासिक (prehistoric) निशानों को खोजने और पहचानने में मदद की है।

​दिल्ली की रिज से शुरू होकर गुड़गांव और फरीदाबाद तक फैले इस पहाड़ी बेल्ट में भुवनेश्वर माता मंदिर परिसर के पास स्थित भोंडसी क्लस्टर बेहद अनोखा है। यह स्थान इसलिए खास है क्योंकि यहां की खुली चट्टानों पर अलग-अलग प्रकार के प्राचीन निशानों की भरमार है।\

निशानों का संबंध धार्मिक अनुष्ठान से

बैसला के अनुसार टीम ने यहां चट्टानों पर बने कप्यूल्स (छोटे कप के आकार के गड्ढे), ज्यामितीय आकृतियां, दो खिलाड़ियों वाले बोर्ड-गेम (जैसे चौपड़ या बिसात) के पैटर्न और पैर के आकार की एक बड़ी नक्काशी को दस्तावेज़ के रूप में दर्ज किया है। उन्होंने बताया कि इन निशानों का संबंध किसी प्राचीन धार्मिक अनुष्ठान या समारोह से रहा होगा।

​इन पेट्रोग्लिफ्स के सटीक डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने के लिए टीम लिडार (LiDAR - लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग) स्कैनिंग तकनीक का उपयोग कर रही है। यह लेज़र-आधारित एक ऐसी रिमोट-सेंसिंग तकनीक है, जो चट्टानों की सतह के आकार और उसकी गहराई को बारीकी से कैमरे में कैद कर लेती है।

FAQ

  1. पेट्रोग्लिफ्स क्या होते हैं?
    पेट्रोग्लिफ्स चट्टानों की सतह पर पत्थर या धारदार औजार से उकेरे गए चित्र या निशान होते हैं। ये प्रागैतिहासिक मानवों की भाषा, धर्म और सामाजिक जीवन को समझने का जरिया हैं। दुनिया भर में इन्हें मानव सभ्यता के शुरुआती प्रमाण माना जाता है।
  2. अरावली इतनी पुरानी पर्वत श्रृंखला क्यों है?
    अरावली प्री-कैंब्रियन काल में बनी है जो करीब 150 करोड़ साल पुरानी मानी जाती है। यह दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसीलिए यहां मानव इतिहास के शुरुआती निशान मिलने की संभावना सबसे अधिक है।
  3. LiDAR तकनीक से पुरातत्व को क्या फायदा होता है?
    LiDAR यानी Light Detection And Ranging एक लेज़र आधारित तकनीक है जो चट्टानों और जमीन की सतह का बेहद सटीक त्रिआयामी नक्शा बनाती है। इससे नग्न आंखों से न दिखने वाले प्राचीन निशान भी डिजिटल रूप में दर्ज हो जाते हैं।

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