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इस समय दुनियाभर में एपस्टीन फाइल्स सुर्खियों में हैं। इसमें एक के बाद एक कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। इसने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सेक्स तस्करी नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। ठीक एपस्टीन फाइल्स जैसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के बांदा से सामने आया है।
यहां भी बच्चों के साथ हुए भयावह शोषण और एक अंतरराष्ट्रीय डिजिटल नेटवर्क का खुलासा हुआ है। इसने न केवल भारत बल्कि दुनिया भर को चौंका दिया है। इस मामले में भी कई जघन्य अपराधों का पर्दाफाश हुआ है। इसके बाद आरोपी पति-पत्नी को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाते हुए 12 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है।
डिजिटल दुनिया का काला सच
एक पेन ड्राइव, 679 तस्वीरें और 33 बर्बाद हुई मासूम जिंदगियां। बांदा से सामने आया ये मामला किसी भी पत्थर दिल इंसान को रुला देगा। यहां भरोसे का कत्ल हुआ और मासूमियत को बाजार बना दिया गया है। डिजिटल दुनिया के अंधेरे में छिपे इस खौफनाक सच को जानना हर माता-पिता के लिए जरूरी है।
इस पूरे मामले की जड़ें एक अंतरराष्ट्रीय गिरोह से जुड़ी हुई पाई गई थीं। इंटरपोल ने भारत सरकार को बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री अपलोड होने की सूचना दी थी। जांच शुरू हुई तो एक सरकारी कर्मचारी का काला चेहरा समाज के सामने आया है। यह मामला सिर्फ अपराध नहीं बल्कि मानवता पर एक गहरा धब्बा है।
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अंतरराष्ट्रीय इनपुट से खुला राज
यह मामला एक अंतरराष्ट्रीय सूचना से शुरू हुआ है। जांच एजेंसियों को पता चला कि भारत से कोई व्यक्ति बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो इंटरनेट पर अपलोड कर रहा था। मामला काफी गंभीर था इसलिए इंटरपोल के माध्यम से जानकारी शेयर की गई। जब जांच आगे बढ़ी तो एक पेन ड्राइव मिली। वहीं से ऐसा राज खुला जिसने सभी को चौंका दिया है।
पेन ड्राइव में कैद खौफनाक सच
इस पेन ड्राइव में 679 आपत्तिजनक फोटो और वीडियो मिले थे। हर एक फोटो अपनी एक अलग कहानी बयां कर रहा था। दर्द, डर और जबरन छीनी गई मासूमियत की कहानी। जांच में एक हैरान कर देने वाला एंगल सामने आया। इस पूरे नेटवर्क के पीछे एक सरकारी कर्मचारी पूर्व जूनियर इंजीनियर रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती का हाथ था।
समाज में सम्मानित नजर आने वाला ये आदमी असल में एक संगठित अपराध का हिस्सा था। रामभवन चित्रकूट में एक किराए के कमरे में रहता था। वहीं से इस गंदे काम को अंजाम दे रहा था। उसकी पत्नी भी इस अपराध में पूरी तरह से शामिल थी।
मासूमों को फंसाने का तरीका
दोनों मिलकर बच्चों को अपने जाल में फंसाते थे। कभी तो उन्हें लुभाकर और कभी डर दिखाकर। जांच में पता चला कि आरोपी बच्चों को फुसलाने के लिए कई अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल करते थे। वो उन्हें पैसे, गिफ्ट देने का लालच देते थे। मोबाइल और वीडियो गेम्स का बहाना बनाते थे। धीरे-धीरे उनका भरोसा जीतकर शोषण करना शुरू कर देते थे। कुछ बच्चों की उम्र तो सिर्फ 3 से 10 साल के बीच थी। वो समझ ही नहीं पाते थे कि उनके साथ क्या हो रहा है।
डार्क वेब और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क
यह बहुत डरावना था कि इन बच्चों के साथ जो अपराध किए जा रहे थे उन्हें रिकॉर्ड किया जाता था। फिर ये वीडियो और फोटो डार्क वेब के जरिए विदेशों में भेजे जाते थे। इससे आरोपी मोटी रकम कमाते थे। यह मामला सिर्फ यौन शोषण तक सीमित नहीं था। यह एक पूरी तरह से संगठित डिजिटल नेटवर्क था। जांच में यह भी सामने आया कि 2010 से 2020 तक यह गिरोह लगातार काम कर रहा था।
दो लाख से ज्यादा आपत्तिजनक फाइलें (वीडियो और फोटो) अलग-अलग देशों में भेजी गईं थी। इसका नेटवर्क करीब 47 देशों तक फैल चुका था। यानी एक छोटे से शहर से शुरू हुआ यह अपराध अब पूरी दुनिया में फैल चुका था। इस केस का सबसे दर्दनाक पहलू उन बच्चों की हालत थी, जो इस पूरे घटनाक्रम के शिकार बने थे।
कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
मेडिकल रिपोर्ट्स में यह सामने आया कि कई बच्चों को गंभीर शारीरिक नुकसान हुआ था। कुछ बच्चों के शरीर के अंगों की संरचना ही बदल गई थी। कई बच्चों को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा था। शारीरिक नुकसान से कहीं ज्यादा गहरा असर मानसिक था। डर और दूसरों पर विश्वास खत्म हो जाना। कई बच्चे आज भी उस मानसिक आघात से बाहर नहीं निकल पाए हैं।
इस मामले की जांच CBI को सौंप दी गई है। CBI ने डिजिटल फॉरेंसिक, मेडिकल रिपोर्ट्स और गवाहों के बयान के आधार पर एक मजबूत केस तैयार किया है। 74 गवाहों के बयान, डिजिटल डिवाइस से सबूत मिले हैं। अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन की पुष्टि भी हो गई है। इन सबूतों से यह साफ हो गया कि यह सिर्फ कुछ छोटी घटनाओं का मामला नहीं था, बल्कि यह एक सोची-समझी साजिश थी।
पीड़ितों को दस-दस लाख का मुआवजा
लंबी सुनवाई के बाद POCSO कोर्ट ने इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर में रखा है। मतलब कि सबसे ज्यादा जघन्य अपराध की श्रेणी में। कोर्ट ने कहा कि यह अपराध बहुत ही घिनौना है। इसमें बच्चों का शोषण किया गया है। आरोपी ने बच्चों के साथ विश्वास का गलत इस्तेमाल किया है।
इसी कारण कोर्ट ने रामभवन और उसकी पत्नी को फांसी की सजा सुनाई है। साथ ही उन पर करीब 12 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी कहा कि सभी पीड़ित बच्चों को दस-दस लाख रुपए का मुआवजा दिया जाए।
क्या बच्चे सच में सुरक्षित हैं?
यह सब अचानक नहीं हुआ। यह एक सोची-समझी लंबे समय से चल रही योजना थी। सवाल यह है कि क्या हमारे बच्चे सच में सुरक्षित हैं? क्या डिजिटल दुनिया हमारे बच्चों के लिए खतरे की वजह बन रही है? सबसे बड़ी बात- क्या हम जो कुछ भी हमारे आसपास हो रहा है, उसे सही तरीके से समझ पा रहे हैं?
लोग कहते हैं कि आजकल डिजिटल दुनिया जितनी सुविधाजनक है उतनी ही खतरनाक भी हो सकती है। बच्चों की ऑनलाइन एक्टिविटी पर नजर रखना जरूरी है। अजनबियों से संपर्क करना खतरनाक हो सकता है। छोटे-छोटे लालच बड़े अपराधों में बदल सकते हैं।
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