मध्य प्रदेश में POCSO के हाल: 380 दिन बाद शुरू होता है ट्रायल, 20 फीसदी को ही सजा

मध्य प्रदेश में POCSO मामलों के ट्रायल में 380 दिन लग रहे हैं। यह राज्यसभा में केंद्र सरकार के लिखित जवाब से सामने आया। राज्य में यौन अपराधों के बहुत ज्यादा मामले लंबित हैं, और फास्ट-ट्रैक अदालतों में न्याय में देरी हो रही है।

author-image
CHAKRESH
New Update
mp-pocso-cases-trial-delay-380-days

News In Short

  • मध्य प्रदेश में POCSO मामलों को ट्रायल के लिए औसतन 380 दिन लगते हैं।
  • राज्य में यौन अपराधों के 10,500 से ज्यादा मामले लंबित हैं।
  • सरकार ने संसद में बताया कि MP में दोष सिद्धि दर केवल 20% है।
  • फास्ट-ट्रैक अदालतों में ये मामलों का ट्रायल होने में लगभग एक साल लगता हैं।
  • राज्य में केंद्र की ओर से POCSO अदालतों को वित्तीय सहायता दी जा रही है।

News In Detail

मध्य प्रदेश में POCSO (Protection of Children from Sexual Offences Act) मामलों की सुनवाई में औसतन 380 दिन लगते हैं। यह मामला हाल ही में राज्यसभा में सरकार द्वारा दी गई जानकारी से सामने आया। फिलहाल 10 हजार 500 से अधिक नाबालिग लड़कियां और अन्य पीड़ित न्याय का इंतजार में हैं।

मध्य प्रदेश में बच्चों के साथ न्याय प्रक्रिया की यह स्थिति किसी के लिए भी चिंता का कारण बन सकती है। खासकर तब जब यौन अपराध से जुड़े मामलों में दोषियों को सजा देने में इतनी देरी हो रही हो। राज्य सरकार के मुताबिक, दोष सिद्धि की दर मात्र 20.11% है। इसका मतलब है कि 100 में से केवल 20 अपराधियों को ही सजा मिल पाती है। यह खुलासा संसद में हुआ है। 

सरकार ने संसद में बताया

केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि मध्यप्रदेश में 10 हजार 500 से अधिक नाबालिग लड़कियों सहित घिनौने यौन अपराधों की पीड़िताएं न्याय के इंतजार में हैं। राज्य में इन मामलों की दोष सिद्धि (Conviction) दर महज 20.11% ही है। यानी 100 केस में से सिर्फ 20 अपराधियों पर ही दोष साबित हो पाता है।

देशभर में POCSO और अन्य घिनौने यौन अपराधों के लंबित मामलों पर सवाल के जवाब में केंद्र ने बताया कि फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतों (जिनमें विशेष POCSO अदालतें शामिल) में मप्र के ऐसे लंबित मामलों की संख्या चौथी सबसे अधिक है। यह उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार से पीछे है।

राज्यसभा में 11 फरवरी को महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर ने शिवसेना (यूबीटी) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी के सवाल पर दिए जवाब में इसे कुछ हद तक राहत बताया। उन्होंने कहा कि मप्र में ऐसे मामलों को फास्ट-ट्रैक अदालतों में ट्रायल के लिए औसतन 380 दिन लगना ज्यादातर राज्यों से कम है।

छत्तीसगढ़ (333 दिन), आंध्र प्रदेश (257 दिन) और पुदुच्चेरी (180 दिन) ही ऐसे राज्य हैं, जहां औसत समय मप्र से कम है। ये राज्य घिनौने यौन अपराधों के दर्ज होने से ट्रायल शुरू होने तक सबसे कम समय लेते हैं।

पहले समझते हैं क्या है POCSO कानून 

POCSO कानून बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए 2012 का बनाया गया था। इसका पूरा नाम The Protection of Children from Sexual Offences Act है। यह कानून 18 साल से कम उम्र के बच्चों (लड़के-लड़कियां दोनों) को यौन हमला, यौन उत्पीड़न, अश्लील सामग्री के उपयोग और पोर्नोग्राफी जैसे अपराधों से सुरक्षा देता है। इसमें महिला और पुरुष दोनों को आरोपी बनाया जा सकता है और कानून आरोपी को कठोर सजा का प्रावधान करता है।

प्रमुख अपराध और सजा

  • यौन हमला: स्पर्श या घुसपैठ शामिल, 10 साल से उम्रकैद तक सजा।
  • गंभीर यौन हमला: मौत की सजा संभव (2019 संशोधन)।
  • बाल पोर्नोग्राफी: 5-7 साल जेल और जुर्माना।
  • हर अपराध की रिपोर्ट जरूरी है, अन्यथा छह माह की सजा।

विशेष प्रावधान

  • विशेष अदालतें (POCSO कोर्ट): तेज ट्रायल के लिए।
  • बाल-अनुकूल प्रक्रिया: बच्चे का बयान वीडियो रिकॉर्डिंग से, गोपनीयता सुनिश्चित।

राज्य के न्यायालयों की स्थिति

मध्य प्रदेश में POCSO के मामलों का ट्रायल शुरू होने से पहले औसतन 380 दिन लगते हैं। छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश में औसतन समय 333 और 257 दिन लगते हैं, जो मध्य प्रदेश से कम है।

केंद्र सरकार ने इस मामले में अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि राज्यों में इस दिशा में काम किया जा रहा है, और सरकार ने फास्ट-ट्रैक अदालतों की संख्या बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए हैं।

केंद्र और राज्य सरकार की जिम्मेदारी

केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था राज्य के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसका मतलब यह है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की जांच और अभियोजन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। हालांकि, केंद्र सरकार महिला सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है और इसके लिए कई कदम उठा रही है।

सरकार द्वारा फास्ट-ट्रैक अदालतों के माध्यम से बच्चों के यौन अपराध मामलों के लिए विशेष अदालतों का गठन किया गया है। इन अदालतों का मुख्य उद्देश्य पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाना है।

फास्ट-ट्रैक अदालतों की उपलब्धि

फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन किया गया है और देशभर में 31 दिसंबर 2025 तक 774 ऐसी अदालतें काम कर रही हैं। इनमें 398 विशेष POCSO अदालतें भी शामिल हैं, जिन्होंने 3.66 लाख से अधिक मामलों का निपटारा किया है।

लेकिन मध्य प्रदेश में इस प्रकार की अदालतों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। राज्य में 67 फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतें कार्यरत हैं, जबकि उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में इनकी संख्या ज्यादा है।

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश में POCSO मामलों की सुनवाई में काफी समय लगता है और इसका असर पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिल पाने के रूप में देखा जा सकता है। इसके बावजूद, राज्य सरकार और केंद्र सरकार इस दिशा में कई प्रयास कर रहे हैं ताकि पीड़ितों को जल्द न्याय मिल सके।

Thesootr Prime के इन कंटेट को भी जरूर पढ़ें...

16वां वित्त आयोग: एमपी को भारी नुकसान, कर्नाटक मालामाल

मांसाहार पर कितना खर्च करते हैं भारतीय? आंकड़े आपको हैरान कर देंगे

MP में ग्रामीण जल-परीक्षण प्रयोगशाला के हाल, बिना उपकरण और स्टाफ के देश में सबसे साफ पानी का दावा

आपकी ऑनलाइन दुनिया पर पुलिस की नजर: 5 चौंकाने वाली बातें जो आपको जाननी चाहिए

महिला सुरक्षा यौन अपराध Thesootr Prime The Protection of Children from Sexual Offences मध्य प्रदेश POCSO
Advertisment