16वां वित्त आयोग: एमपी को भारी नुकसान, कर्नाटक मालामाल

16वीं वित्त आयोग की रिपोर्ट में टैक्स रेवेन्यू बंटवारे के नए फॉर्मूले में कर्नाटक को सबसे ज्यादा फायदा हुआ, जबकि एमपी को भारी नुकसान हुआ। एमपी के अलावा सीजी और राजस्थान भी नुकसान में हैं। ऐसे में इन राज्यों को टैक्स रेवेन्यू का बहुत कम हिस्सा मिलेगा।

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CHAKRESH
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5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला

  1. 16th Finance Commission ने केंद्र और राज्य सरकारों के बीच टैक्स रेवेन्यू बंटवारे का नया टैक्स फॉर्मूला तैयार किया है।

  2. इस फॉर्मूले में राज्यों की आर्थिक दक्षता यानी एफिशिएंसी और जीडीपी योगदान को ज्यादा महत्व दिया गया है।

  3. इससे कर्नाटक को सबसे ज्यादा फायदा हुआ, जबकि मध्य प्रदेश को भारी नुकसान हुआ है।

  4. मध्य प्रदेश टैक्स रेवेन्यू: एमपी का हिस्सा 7.85% से घटकर 7.35% हो गया, जिससे राज्य को 7677 करोड़ रुपए कम मिलेंगे।

  5. यही हाल राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश यानी पूरे उत्तर भारत का है।

16वां वित्त आयोग: नए फॉर्मूले में बदलाव

16वें वित्त आयोग ने 2026 से 2031 तक के लिए केंद्र और राज्यों के बीच टैक्स रेवेन्यू के बंटवारे का नया फॉर्मूला पेश किया है। इस फॉर्मूले में खास तौर पर "एफिशिएंसी" पर ध्यान दिया गया है। यानी जो राज्य जीडीपी में ज्यादा योगदान देते हैं, उन्हें ज्यादा पैसा मिलेगा।

बता दें कि नए फार्मूले के तहत जीडीपी में योगदान को 10 प्रतिशत वेटेज दिया गया है। इसका असर कर्नाटक जैसे अधिक औद्योगिक और विकसित राज्यों पर पड़ा। कर्नाटक पहले से ही मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस और टेक्नोलॉजी क्षेत्र में मजबूत है। इसके परिणाम स्वरूप कर्नाटक का हिस्सा 3.65% से बढ़कर 4.13% हो गया है। अब उसे 7 हजार 387 करोड़ रुपए अतिरिक्त मिलेंगे।

मध्यप्रदेश को झटका

इसके विपरीत, मध्य प्रदेश जैसे राज्य, जो अभी भी कृषि पर निर्भर हैं। एमपी का प्रति व्यक्ति उत्पादन भी कम है। ऐसे में एमपी को नए फॉर्मूले से नुकसान हुआ है। एमपी का हिस्सा घटकर 7.35% हो गया है, जो पहले 7.85% था। इसका मतलब है कि राज्य को सात हजार 677 करोड़ रुपए कम मिलेंगे। मध्य प्रदेश का हिस्सा घटकर एक लाख 12 हजार करोड़ रुपए हो गया है। यानी अब विकास योजनाओं और बुनियादी ढांचे पर खर्च नहीं हो पाएंगे।

इस कमी के कारण राज्य सरकार को अपने प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए टैक्स बढ़ाने, कर्ज लेने या योजनाओं को धीमा करने का विकल्प हो सकता है। अगर राज्य अपनी राजस्व वसूली तेज नहीं करता, तो इसे स्वास्थ्य, शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर फंडिंग की कमी महसूस हो सकती है।

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कर्नाटक को क्यों मिला फायदा?

नई रिपोर्ट के अनुसार, “इनकम डिस्टेंस” यानी गरीब और अमीर राज्यों के बीच का अंतर मापने वाला पैरामीटर अब थोड़ा घटाया गया है। इस बदलाव का मुख्य कारण यह था कि जो राज्य अर्थव्यवस्था में अधिक योगदान दे रहे हैं, उन्हें और अधिक संसाधन मिलें, ताकि वे आगे भी आर्थिक इंजन बने रहें। इसी वजह से कर्नाटक और अन्य विकसित राज्यों को फायदा हुआ, जबकि मध्य प्रदेश जैसे कम विकसित राज्यों को नुकसान उठाना पड़ा।

इसके अलावा, जनसंख्या और डेमोग्राफिक परफॉर्मेंस के वेटेज में भी कुछ बदलाव किया गया है, लेकिन असली फर्क "जीडीपी योगदान" को दिया गया है। इसने आर्थिक दक्षता को तरजीह दी और गरीब राज्यों को कम प्राथमिकता दी।

अब एमपी के लिए क्या विकल्प हैं?

मध्य प्रदेश के लिए यह सवाल उठता है कि क्या वह इस नुकसान को भर पाएगा? इसके कई रास्ते हो सकते हैं। पहला, राज्य अपनी टैक्स वसूली में सुधार लाकर, प्रॉपर्टी टैक्स, एक्साइज और अन्य माध्यमों से आय बढ़ा सकता है। दूसरा रास्ता यह है कि राज्य केंद्र की योजनाओं और विशेष पैकेजों के जरिए अतिरिक्त फंडिंग प्राप्त कर सकता है।

सबसे कठिन, लेकिन प्रभावी उपाय यह है कि एमपी अपनी अर्थव्यवस्था की संरचना बदलें और उद्योग, सेवा क्षेत्र और कृषि के मूल्यवर्धन पर ध्यान केंद्रित करे। अगर राज्य आगामी वर्षों में अपनी जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय में तेज वृद्धि दिखाता है, तो अगले वित्त आयोग में इसे बेहतर स्कोर मिल सकता है।

कर्नाटक नहीं, इन राज्यों को भी बोनस

कर्नाटक के बाद केरल दूसरा सबसे बड़ा लाभ पाने वाला राज्य है।
केरल की हिस्सेदारी 1.93 से बढ़कर 2.38 प्रतिशत कर दी गई है।
इसके साथ ही केरल को 6,975 करोड़ रुपए ज्यादा मिलेंगे।
गुजरात को 4,228 करोड़ और हरियाणा को 4,090 करोड़ रुपए का लाभ दिखा।
देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला महाराष्ट्र भी प्लस में रहा।
महाराष्ट्र का हिस्सा थोड़ा बढ़कर 6.44 प्रतिशत तक पहुंच गया।

यूपी, बंगाल और बिहार भी मार झेलेंगे

सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्यों की चिंता भी बढ़ी है।
उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी में 4,884 करोड़ रुपए की कमी आई।
पश्चिम बंगाल को 4,701 करोड़ रुपए कम मिलेंगे।
बिहार को भी 1,679 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ेगा।
इन राज्यों में आबादी और पिछड़ापन दोनों बड़े मुद्दे हैं।

वित्त आयोग क्या है और क्या काम करता है?

भारतीय संविधान के आर्टिकल 280 के तहत वित्त आयोग बनता है। यह वित्त आयोग बताता है कि केंद्र का टैक्स राज्यों में कैसे बांटा जाए। कमेटी हर बार एक फॉर्मूला तय करती है और सरकार उसे लागू करती है। इस बार की सिफारिशें 1 अप्रैल 2026 से पांच साल तक चलेंगी।

16वीं वित्त आयोग की टीम में कौन कौन थे?

यह आयोग 31 दिसंबर 2023 को बनाया गया था। इसकी अध्यक्षता पूर्व नीति आयोग वाइस चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया ने की। सदस्यों में एनी जॉर्ज मैथ्यू और अर्थशास्त्री मनोज पांडा शामिल थे। एसबीआई ग्रुप के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष भी सदस्य रहे। रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर टी रबी शंकर भी इस टीम का हिस्सा थे। आयोग के सचिव ऋत्विक पांडे ने रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी।

इस लिंक से देखें 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट-

https://fincomindia.nic.in/asset/doc/commission-reports/16th-FC/reports

FAQ

16वें वित्त आयोग का फॉर्मूला क्या है?
यह एक नया तरीका है, जिसमें राज्यों के आर्थिक प्रदर्शन, जीडीपी योगदान और विकास की गति को ध्यान में रखते हुए टैक्स रेवेन्यू का बंटवारा किया जाता है।

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