आपकी ऑनलाइन दुनिया पर पुलिस की नजर: 5 चौंकाने वाली बातें जो आपको जाननी चाहिए
CHAKRESH | Jan 06, 2026, 15:22 IST
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Thesootr Prime भारत के कई राज्यों में पुलिस अब स्थायी रूप से आपकी सोशल मीडिया गतिविधियों पर नजर रख रही है। मणिपुर हिंसा के बाद सर्विलांस नेटवर्क में तेजी आई है।
हम फेसबुक पर तस्वीरें साझा करते हैं, ट्विटर पर बहस करते हैं और व्हाट्सएप पर संवाद करते हैं, यह मानते हुए कि ये हमारी निजी बातचीत हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन ऑनलाइन गतिविधियों पर और कौन नजर रख रहा है?
20 अगस्त 2025 के राज्यसभा उत्तर ( अनस्टार्ड प्रश्न संख्या 3102 ) में सरकार ने माना है कि साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन और प्रयोगशालाओं का राज्य/UT‑वार डेटा BPR&D संकलित करता है। जबकि पुलिस व पब्लिक ऑर्डर राज्य का विषय हैं। इसलिए सोशल मीडिया मॉनिटरिंग (डिजिटल पुलिसिंग) की तैनाती राज्य पुलिस के स्तर पर तय होती है।
हाल ही में सामने आए आंकड़ों से एक हैरान करने वाली तस्वीर उभरती है। यह जानकारी गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले एक पुलिस थिंक टैंक, 'पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो' (BPR&D) की वार्षिक रिपोर्ट से सामने आई है। रिपोर्ट बताती है कि पूरे भारत में पुलिस द्वारा सोशल मीडिया की निगरानी में वृद्धि हुई है। यह कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि आधुनिक पुलिसिंग के बदलते चेहरे को दर्शाती है।
आपके सोशल मीडिया बिहेवियर पर पुलिस की नजर के क्या असर हैं, आइए thesootr Prime में विस्तार से समझते हैं।
आंकड़ों से साफ है कि सोशल मीडिया पर निगरानी के लिए समर्पित पुलिस इकाइयों का नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है। 1 जनवरी, 2020 को 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में ऐसे 262 समर्पित सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल थे। चार साल बाद, 1 जनवरी, 2024 तक यह संख्या बढ़कर 365 हो गई है।
1 जनवरी, 2024 तक, सबसे अधिक ऑपरेशनल सेल वाले शीर्ष पांच राज्य थे।
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मणिपुर का मामला उदाहरण है कि कैसे जमीनी संघर्ष डिजिटल निगरानी में वृद्धि को गति देता है। राज्य में 3 मई, 2023 को जातीय हिंसा भड़कने के बाद, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल की संख्या में भारी वृद्धि देखी गई। 1 जनवरी, 2023 को मणिपुर में केवल 3 सेल थे, जो 1 जनवरी, 2024 तक बढ़कर 16 हो गए।
सबसे विरोधाभासी तथ्य यह है कि यह विस्तार उस समय हुआ, जब राज्य में लगभग 140 दिनों के लिए इंटरनेट सेवाएं निलंबित थीं। इसका मतलब है कि जब आम जनता के लिए इंटरनेट बंद कर दिया जाता है, तब भी राज्य की निगरानी क्षमताएं सक्रिय रूप से बढ़ाई जा रही हैं।
BPR&D, राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस सुधार, शोध और डेटा संकलन की नोडल एजेंसी है। यह “Data on Police Organizations (DoPO)” और अन्य प्रकाशनों में राज्यों के साइबर/डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का डेटा जारी करती है।
पर आ रही जानकारी को समझने और उसे “actionable intelligence” में बदलने के लिए पुलिस की क्षमता निर्माण करती है। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य है कि संवेदनशील मुद्दों, विरोध प्रदर्शन और अफवाह आदि पर रियल‑टाइम में पुलिस की ओर से प्रतिक्रिया दी जा सके।
BPR&D मॉडल के अनुसार “सोशल मीडिया लैब” सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध डेटा (Facebook, Twitter/X, YouTube, ब्लॉग, WhatsApp‑जैसे प्लेटफॉर्म पर खुली सूचनाएं) की मॉनिटरिंग करता है।
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हालांकि यह प्रवृत्ति राष्ट्रव्यापी है, लेकिन कुछ राज्यों ने अपनी निगरानी क्षमताओं में विस्फोटक वृद्धि की है। असम और पश्चिम बंगाल इसके सबसे चौंकाने वाले उदाहरण हैं।
सोशल मीडिया की निगरानी अब केवल साइबर अपराध (Cyber crime) जांच का एक हिस्सा नहीं रही, बल्कि इसे एक अलग और औपचारिक पुलिस कार्य के रूप में स्थापित किया जा रहा है। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि पुलिस ने 2021 से सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल को साइबर क्राइम पुलिस स्टेशनों से अलग, एक विशिष्ट इकाई के रूप में गिनना शुरू कर दिया।
इसी के साथ, साइबर क्राइम पुलिस (cyber police) स्टेशनों की संख्या भी जनवरी 2020 में 376 से बढ़कर जनवरी 2024 में 624 हो गई। इन दोनों इकाइयों का अलग-अलग और एक साथ बढ़ना एक रणनीतिक बदलाव का संकेत है। इसका अर्थ है कि ऑनलाइन भाषण और अभिव्यक्ति की निगरानी अब एक विशेष, स्था और संस्थागत पुलिस गतिविधि बन गई है, न कि केवल अपराध होने पर की जाने वाली जांच।
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इस डिजिटल विस्तार की कहानी में एक बड़ा विरोधाभास भी छिपा है। एक तरफ जहां एक परिष्कृत डिजिटल निगरानी तंत्र का निर्माण किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर पुलिस बल में कर्मचारियों की भारी कमी है।
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि देश भर में पुलिस के कुल 27 लाख 55 हजार 274 स्वीकृत पदों के मुकाबले 5 लाख 92 हजार 109 पद खाली थे। यह विरोधाभास पुलिस बलों के भीतर प्राथमिकताओं में हो रहे बदलाव को उजागर करता है- जहां डिजिटल दुनिया पर नजर रखना, वास्तविक दुनिया में पुलिस की भौतिक उपस्थिति को मजबूत करने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।
ये आंकड़े एक स्पष्ट कहानी बताते हैं: भारत में पुलिस द्वारा सोशल मीडिया की निगरानी का तेजी से, औपचारिक रूप से और व्यापक रूप से विस्तार हो रहा है। यह सिर्फ तकनीक का उपयोग नहीं है, बल्कि पुलिसिंग के दृष्टिकोण में एक मूलभूत परिवर्तन है, जिसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं।
जैसे-जैसे हमारी दुनिया ज़्यादा डिजिटल होती जा रही है, हमें यह सोचना होगा: नागरिकों की सुरक्षा और उनकी निजता के बीच सही संतुलन क्या है? और यह संतुलन बनाने का अधिकार किसे है?
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The sootr Prime Podcast
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- भारत में सोशल मीडिया निगरानी करने के लिए पुलिस की इकाइयां बढ़ रही हैं।
- मणिपुर में हिंसा के बाद पुलिस ने अपनी निगरानी क्षमताओं में तेजी से वृद्धि की।
- असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य अपनी निगरानी नेटवर्क को तेजी से बढ़ा रहे हैं।
- यह निगरानी साइबर अपराध से जुड़ी नहीं है, बल्कि एक स्थायी पुलिस गतिविधि बन गई है।
- दूसरी ओर पुलिस बल में कर्मचारियों की कमी भी एक चिंता का विषय बनकर उभर रही है।
सरकार ने संसद में माना- रखते हैं नजर
हाल ही में सामने आए आंकड़ों से एक हैरान करने वाली तस्वीर उभरती है। यह जानकारी गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले एक पुलिस थिंक टैंक, 'पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो' (BPR&D) की वार्षिक रिपोर्ट से सामने आई है। रिपोर्ट बताती है कि पूरे भारत में पुलिस द्वारा सोशल मीडिया की निगरानी में वृद्धि हुई है। यह कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि आधुनिक पुलिसिंग के बदलते चेहरे को दर्शाती है।
आपके सोशल मीडिया बिहेवियर पर पुलिस की नजर के क्या असर हैं, आइए thesootr Prime में विस्तार से समझते हैं।
1. पुलिस की सोशल मीडिया सेल हर जगह हैं
1 जनवरी, 2024 तक, सबसे अधिक ऑपरेशनल सेल वाले शीर्ष पांच राज्य थे।
- बिहार (52)
- महाराष्ट्र (50)
- पंजाब (48)
- पश्चिम बंगाल (38)
- असम (37)
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2. मणिपुर के संघर्ष ने दी डिजिटल निगरानी को हवा
सबसे विरोधाभासी तथ्य यह है कि यह विस्तार उस समय हुआ, जब राज्य में लगभग 140 दिनों के लिए इंटरनेट सेवाएं निलंबित थीं। इसका मतलब है कि जब आम जनता के लिए इंटरनेट बंद कर दिया जाता है, तब भी राज्य की निगरानी क्षमताएं सक्रिय रूप से बढ़ाई जा रही हैं।
BPR&D क्या है और क्या करता है
BPR&D प्रोजेक्ट का विजन क्या है सोशल मीडिया
BPR&D किन- किन प्लेटफार्म पर नजर रखता है
- सार्वजनिक भावना (sentiment) का विश्लेषण किया जाता है।
- इन्फ्लुएंसर्स और ग्रुप्स के बिहेवियर पर नजर रखी जाती है।
- डिजिटल “chatter” में अचानक वृद्धि पर नजर रखी जाती है।
- कानून‑व्यवस्था प्रभावित करने वाले “inflammatory posting” पर Red flag तैयार करती है।
कुछ राज्यों में निगरानी का विस्फोटक विस्तार
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हालांकि यह प्रवृत्ति राष्ट्रव्यापी है, लेकिन कुछ राज्यों ने अपनी निगरानी क्षमताओं में विस्फोटक वृद्धि की है। असम और पश्चिम बंगाल इसके सबसे चौंकाने वाले उदाहरण हैं।
- असम ने 2022 में सिर्फ 1 मॉनिटरिंग सेल से 2024 तक 37 सेल स्थापित कर लिए, जो कि 37 गुना की आश्चर्यजनक वृद्धि है।
- पश्चिम बंगाल ने भी 2022 में सिर्फ 2 सेल से अपने नेटवर्क का विस्तार करते हुए 2024 तक 38 सेल स्थापित कर लिए।
- इसी दौरान, पंजाब ने भी अपनी क्षमता को दोगुना करते हुए 24 सेल से बढ़ाकर 48 सेल कर दिया।
यह सिर्फ 'निगरानी' नहीं, बल्कि पुलिसिंग का एक नया रूप है
इसी के साथ, साइबर क्राइम पुलिस (cyber police) स्टेशनों की संख्या भी जनवरी 2020 में 376 से बढ़कर जनवरी 2024 में 624 हो गई। इन दोनों इकाइयों का अलग-अलग और एक साथ बढ़ना एक रणनीतिक बदलाव का संकेत है। इसका अर्थ है कि ऑनलाइन भाषण और अभिव्यक्ति की निगरानी अब एक विशेष, स्था और संस्थागत पुलिस गतिविधि बन गई है, न कि केवल अपराध होने पर की जाने वाली जांच।
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विरोधाभास: बढ़ती डिजिटल निगरानी, घटते पुलिसकर्मी
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि देश भर में पुलिस के कुल 27 लाख 55 हजार 274 स्वीकृत पदों के मुकाबले 5 लाख 92 हजार 109 पद खाली थे। यह विरोधाभास पुलिस बलों के भीतर प्राथमिकताओं में हो रहे बदलाव को उजागर करता है- जहां डिजिटल दुनिया पर नजर रखना, वास्तविक दुनिया में पुलिस की भौतिक उपस्थिति को मजबूत करने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।
निष्कर्ष
जैसे-जैसे हमारी दुनिया ज़्यादा डिजिटल होती जा रही है, हमें यह सोचना होगा: नागरिकों की सुरक्षा और उनकी निजता के बीच सही संतुलन क्या है? और यह संतुलन बनाने का अधिकार किसे है?
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The sootr Prime Podcast
FAQ
- क्या सोशल मीडिया पर निगरानी करना कानूनी है?
हां, सोशल मीडिया पर निगरानी करना कानूनी है, लेकिन यह सार्वजनिक डोमेन पर उपलब्ध जानकारी तक ही सीमित है। निजी या एन्क्रिप्टेड संचार पर कोई निगरानी नहीं की जाती है। - क्या सोशल मीडिया पर निगरानी से नागरिकों की निजता प्रभावित होती है?
यह एक बड़ा सवाल है। हालांकि सरकार ने इसे सार्वजनिक जानकारी के रूप में रखने का वादा किया है, फिर भी इसे लेकर चिंता बनी रहती है। - क्या बढ़ती निगरानी से पुलिस की कार्यक्षमता पर असर पड़ रहा है?
हां, रिपोर्टों के अनुसार पुलिस में कर्मचारियों की कमी है, जबकि डिजिटल निगरानी में लगातार वृद्धि हो रही है। यह एक चिंता का विषय बन सकता है।
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