MP में ग्रामीण जल-परीक्षण प्रयोगशाला के हाल, बिना उपकरण और स्टाफ के देश में सबसे साफ पानी का दावा

मध्य प्रदेश की ग्रामीण जल-परीक्षण प्रयोगशालाओं की हालत खस्ता है। 2019 और 2025-26 के आंकड़े दर्शाते हैं कि पानी की गुणवत्ता की जांच के लिए बुनियादी सुविधाओं और उपकरणों की भारी कमी है, जिससे सरकारी आंकड़ों पर सवाल खड़ा होता है।

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CHAKRESH
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mp water quality laboratories issues 2026
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5 प्वाइंट में समझें खबर के मायने

1. मध्य प्रदेश में जल-परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थिति बेहद खस्ता है।

2. 2019 और 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि जल प्रदूषण के आंकड़े संदेहजनक हैं।

3. प्रयोगशालाओं में बुनियादी सुविधाओं और उपकरणों की भारी कमी है।

4. विशेषज्ञ कर्मचारियों की कमी के कारण जांच पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

5. सिस्टम की खामियां और सरकारी चुप्पी इस समस्या को और बढ़ा रही हैं।

चौंकाने वाला अंतर: सरकारी आंकड़ों और राष्ट्रीय औसत के बीच

सबसे पहली और चिंताजनक बात सरकारी आंकड़ों में दिखने वाला बड़ा अंतर है। 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण मध्य प्रदेश में जांचे गए पानी के नमूनों में से केवल 0.6% में ही दूषित (contamination) पाया गया है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत के सामने भी फीका है। बता दें कि पूरे देश में दूषित पानी पाए जाने का औसत 13% है, जो मध्य प्रदेश के आंकड़े से 20 गुना से भी ज्यादा है।

यह हैरान करने वाला आंकड़ा एक सवाल भी खड़ा करता है। क्या मध्य प्रदेश का पानी सचमुच इतना साफ है, या फिर जांच का सिस्टम ही इतना कमजोर है कि वह गंदगी पकड़ ही नहीं पा रहा? 2019 का एक सर्वेक्षण इसका जवाब देना शुरू करता है।

प्रयोगशालाओं की खस्ता हालत: जगह और बुनियादी सुविधाओं का अभाव

2019 में 56 ग्रामीण प्रयोगशालाओं के एक सर्वेक्षण ने इन सुविधाओं की दयनीय स्थिति को उजागर किया था। जांच में पाया गया कि ये प्रयोगशालाएं सिर्फ नाम के लिए थीं। क्योंकि उनमें बुनियादी सुविधाओं का भी भारी अभाव था। सर्वेक्षण की कुछ मुख्य कमियां यह थीं:
तीन-चौथाई (लगभग 75%) प्रयोगशालाएं निर्धारित जगह के मानदंडों को पूरा नहीं करती थीं।

82% से अधिक प्रयोगशालाओं में जैविक परीक्षण (biological testing) के लिए कोई अलग जगह नहीं थी।अधिकांश प्रयोगशालाओं में इंटरनेट और टेलीफोन कनेक्शन तक नहीं थे।

जब किसी प्रयोगशाला में बैक्टीरिया जैसी जैविक अशुद्धियों की जांच के लिए अलग और सुरक्षित जगह ही न हो, तो वहां से मिले आंकड़ों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। यह सीधे तौर पर आधिकारिक आंकड़ों को प्रभावित करता है।

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काम के लिए औजार ही नहीं: उपकरणों की भारी कमी

बिना सही उपकरणों के कोई भी प्रयोगशाला काम नहीं कर सकती। 2019 का सर्वेक्षण यही दिखाता है कि इन प्रयोगशालाओं में आवश्यक परीक्षण उपकरणों की भारी कमी थी। यह कमी सीधे तौर पर बताती है कि दूषित पानी पाए जाने के आंकड़े इतने कम क्यों हैं!
आंकड़े बताते हैं कि 50% प्रयोगशालाएं पानी की गुणवत्ता के 13 बुनियादी मापदंडों की जांच भी नहीं कर सकती थीं।

इससे भी बुरी बात यह है कि लगभग दस में से नौ प्रयोगशालाओं में खतरनाक भारी धातुओं (heavy metals) की जांच करने की कोई क्षमता नहीं थी। अगर आपके पास जांचने के उपकरण ही नहीं हैं, तो आप गंदगी का पता कैसे लगाएंगे?

खाली कुर्सियां, झूठे नतीजे: विशेषज्ञों के बिना कैसे होगी जांच?

एक प्रयोगशाला को चलाने के लिए विशेषज्ञ कर्मचारियों की आवश्यकता होती है, लेकिन मध्य प्रदेश की इन ग्रामीण प्रयोगशालाओं में कर्मचारियों की भारी कमी थी। 2019 के सर्वेक्षण के अनुसार, स्थिति कुछ इस प्रकार थी:
लगभग 79% प्रयोगशालाओं में माइक्रोबायोलॉजिस्ट नहीं थे।

  • 86% प्रयोगशालाओं में अटेंडेंट नहीं थे।
  • 91% प्रयोगशालाओं में सैंपलिंग असिस्टेंट नहीं थे।

विशेषज्ञों के बिना, अत्याधुनिक उपकरण भी महज डिब्बे हैं। जब 79% प्रयोगशालाओं में माइक्रोबायोलॉजिस्ट ही नहीं हैं, तो जैविक संदूषण की विश्वसनीय जांच की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह सीधे तौर पर बताता है कि क्यों जैविक परीक्षण के लिए अलग जगह तक नहीं थी।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ 

मैनिट की प्रोफेसर वर्षा रोकाडे कहती हैं कि "सब कुछ स्टडी में है", लेकिन यह समस्या का हल नहीं है। यह सिस्टम की अंदर की खामियों को दर्शाता है। इस स्थिति के पीछे का बड़ा कारण सरकारी ढांचागत खामियां हैं। यह स्पष्ट है कि इन प्रयोगशालाओं में कमी और सरकारी विभागों की चुप्पी इस समस्या को बढ़ा रही है।

आगे क्या: सरकार को गंभीर होना पड़ेगा

सरकार को इस गंभीर समस्या का समाधान शीघ्र करना चाहिए। प्रयोगशालाओं में बुनियादी ढांचे में सुधार, सही उपकरणों की आपूर्ति और विशेषज्ञ कर्मचारियों की नियुक्ति से ही जल परीक्षण की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जल की जांच में कोई भी कमी न हो, ताकि राज्य के नागरिकों को सुरक्षित और शुद्ध पानी मिल सके।

निष्कर्ष:

मध्य प्रदेश के जल परीक्षण प्रयोगशालाओं की यह स्थिति यह दर्शाती है कि हमारे जल की गुणवत्ता (Water Quality in MP) पर कितना भरोसा किया जा सकता है। जब परीक्षण की नींव ही कमजोर हो, तो हमें अपने पीने के पानी की शुद्धता पर कैसे विश्वास हो सकता है?

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