नीतीश कुमार; कॉफी हाउस से राज्यसभा तक, एक इंजीनियर के बिहार निर्माता बनने की पूरी कहानी
Jitendra Shrivastava | Apr 14, 2026, 18:26 IST
Photograph: (THESOOTR)
PATNA. बिहार की सियासत में नीतीश कुमार की पहचान सुशासन बाबू के नाम से रही है। उन्होंने जब राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपा तो वो सिर्फ कुर्सी नहीं छोड़ रहे थे, बल्कि करीब दो दशकों के उस प्रभाव को भी विराम दे रहे थे, जिसने बिहार को एक नई पहचान दी।
बिहार की राजनीति में एक युग का अंत हो गया। करीब 20 साल तक बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया। अब वह राज्यसभा जा रहे हैं। लेकिन यह कहानी सिर्फ एक इस्तीफे की नहीं है।
यह कहानी है उस मेज थपथपाने वाले संकल्प की, उस साइकिल वाली लड़की के सपने की और उस चतुर राजनेता की, जिसने मात्र 2.8% वोट बैंक के दम पर दो दशकों तक सूबे पर राज किया।
एक दिन
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बात 1977 की है। बिहार के नालंदा जिले के हरनौत से नीतीश कुमार चुनाव हार चुके थे। मायूसी का आलम था, लेकिन हौसला कम नहीं हुआ था। पटना के डाक बंगला चौराहे के पास एक कॉफी हाउस हुआ करता था। वहां पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की महफिल जमती थी।
एक दिन बहस के दौरान जोश में आकर नीतीश कुमार ने मेज थपथपाई। उन्होंने गरज कर कहा था, एक दिन मैं इस राज्य का मुख्यमंत्री बनूंगा। उस वक्त लोग हंसे होंगे, क्योंकि उनके साथी लालू प्रसाद यादव 29 साल की उम्र में सांसद बन चुके थे।
एक और साथी मिथिलेश कुमार सिंह विधायक बन गए थे। लेकिन नीतीश, जो 1972 में बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग कर चुके थे, अभी खाली हाथ थे।
सफलता ने उन्हें लंबे समय तक छकाया। 1985 में जाकर उन्होंने पहली बार हरनौत से चुनाव जीता। तब तक लालू यादव बड़े नेता बन चुके थे। 1990 से 2005 तक बिहार में लालू युग रहा।
नीतीश केंद्र में मंत्री रहे, लेकिन बिहार की सत्ता उनसे दूर रही। साल 2000 में वह महज 7 दिन के लिए सीएम बने, पर बहुमत साबित नहीं कर पाए। लेकिन 2005 में उन्होंने वह कर दिखाया जो नामुमकिन लगता था-लालू के अभेद्य दुर्ग को ढहा दिया।
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2005 में जब नीतीश ने सत्ता संभाली, बिहार की पहचान गड्ढों वाली सड़कों से होती थी। शाम ढलते ही लोग घरों में दुबक जाते थे। नीतीश ने इसे बदला।
पहला कार्यकाल (2005-2010) में उनका पूरा ध्यान सड़कों और पुलों पर रहा। गांवों को शहरों से जोड़ा गया। दूसरे कार्यकाल (2010-2015) में स्कूल, अस्पताल और सरकारी भवनों की बाढ़ आ गई। उन्होंने बिहार म्यूजियम, सम्राट कन्वेंशन सेंटर और बापू टावर जैसे आधुनिक स्मारक बनवाए। लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि नीतीश ईंट-पत्थर के विकास में उलझ गए।
नीतीश ने स्कूल तो बनवाए, लेकिन उनमें शिक्षक नहीं थे। अस्पताल बने, लेकिन डॉक्टर नदारद रहे। आज भी बिहार के बड़े नेता इलाज के लिए दिल्ली जाते हैं। पटना मेडिकल कॉलेज (PMCH), जो कभी देश का गौरव था, आज अपनी साख खो चुका है।
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सुशासन बाबू यानीनीतीश कुमार की सबसे बड़ी जीत थी- बिहार से जंगलराज के ठप्पे को हटाना। कांग्रेस के दौर में दंगे होते थे, लालू के दौर में जातीय नरसंहार होते थे। नीतीश के राज में बिहार ने बड़े जातीय दंगों या सांप्रदायिक हिंसा से मुक्ति पाई।
नीतीश ने पुलिस में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई। आज बिहार में देश में सबसे ज्यादा महिला पुलिसकर्मी हैं। एक किस्सा मशहूर है। साल 2020 में तत्कालीन डीजीपी गुप्तेशवर पांडेय सादे कपड़ों में चेकिंग पर निकले।
नीतीश कुमार ने दो महिला सिपाहियों से मजाक में पूछा, क्या तुम्हें बंदूक चलानी आती है? उन बहादुर बेटियों ने तुरंत उन पर बंदूक तान दी और कहा कि पीछे हटिए। डीजीपी को अपनी पहचान बतानी पड़ी। नीतीश ने ऐसी पुलिस फोर्स तैयार की।
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नीतीश कुमार ने कर्पूरी ठाकुर के कोटा के भीतर कोटा के सपने को आगे बढ़ाया। लालू ने पिछड़ों को आवाज दी, तो नीतीश ने उन्हें योजनाएं दीं।
एक बार नीतीश ने इंटरव्यू में कहा था, अगर मुझे बिहार की तस्वीर बनानी हो, तो मैं उस लड़की की तस्वीर बनाऊंगा जो साइकिल चलाकर स्कूल जा रही है। और उन्होंने यह सच कर दिखाया।
नौवीं क्लास की लड़कियों को मुफ्त साइकिल, ड्रेस और स्कॉलरशिप देकर उन्होंने बिहार के घरों के भीतर साइलेंट क्रांति कर दी। उन्होंने अति-पिछड़ों (EBC) और दलितों का एक नया वोट बैंक तैयार किया। इसी सोशल इंजीनियरिंग की वजह से वह दशकों तक बिहार की राजनीति के तीसरे ध्रुव बने रहे।
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नीतीश कुमार का सबसे बड़ा हुनर था-गठबंधन। वह जानते थे कि उनके पास अपना बड़ा वोट बैंक नहीं है (कुर्मी समाज मात्र 2.8% है), लेकिन वह जानते थे कि सत्ता की चाबी किसके पास है।
1996 में बीजेपी के साथ आए, फिर 2013 में अलग हुए। 2015 में लालू के साथ आए, फिर 2017 में बीजेपी के साथ। वह राजनीति के ऐसे खिलाड़ी रहे जिन्होंने बीजेपी और आरजेडी, दोनों को अपने इशारों पर नचाया। वह हमेशा किंगमेकर भी रहे और किंग भी।
अब जब नीतीश राज्यसभा जा रहे हैं, सवाल उठता है कि क्या वह बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह या कर्पूरी ठाकुर की बराबरी कर पाएंगे?
श्रीकृष्ण सिंह ने उद्योग और शिक्षा के संस्थान बनाए। कर्पूरी ठाकुर ने सामाजिक न्याय की राह दिखाई। नीतीश ने इन दोनों का मिश्रण करने की कोशिश की।
नीतीश ने बिहार को अंधेरे से बाहर निकाला। उन्होंने बुनियादी ढांचा दिया। लेकिन वह बिहार को 'इंडस्ट्रियल हब' नहीं बना पाए। वह शिक्षा की गुणवत्ता में पिछड़ गए। उन्होंने कॉमन स्कूल सिस्टम लागू नहीं किया।
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नीतीश कुमार का बिहार से जाना एक दौर की समाप्ति है। वह एक ऐसे इंजीनियर थे, जिन्होंने टूटे हुए बिहार की मरम्मत तो की, लेकिन उसे नई उड़ान देने के लिए जो बड़े रिस्क चाहिए थे, शायद गठबंधन की मजबूरी में वह ले नहीं पाए।
फिर भी, जब-जब बिहार की सड़कों पर कोई लड़की साइकिल चलाकर स्कूल जाएगी, नीतीश कुमार की विरासत मुस्कुराती नजर आएगी।
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यह कहानी है उस मेज थपथपाने वाले संकल्प की, उस साइकिल वाली लड़की के सपने की और उस चतुर राजनेता की, जिसने मात्र 2.8% वोट बैंक के दम पर दो दशकों तक सूबे पर राज किया।
एक दिन मुख्यमंत्री बनूंगा
nitish kumar
बात 1977 की है। बिहार के नालंदा जिले के हरनौत से नीतीश कुमार चुनाव हार चुके थे। मायूसी का आलम था, लेकिन हौसला कम नहीं हुआ था। पटना के डाक बंगला चौराहे के पास एक कॉफी हाउस हुआ करता था। वहां पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की महफिल जमती थी।
एक दिन बहस के दौरान जोश में आकर नीतीश कुमार ने मेज थपथपाई। उन्होंने गरज कर कहा था, एक दिन मैं इस राज्य का मुख्यमंत्री बनूंगा। उस वक्त लोग हंसे होंगे, क्योंकि उनके साथी लालू प्रसाद यादव 29 साल की उम्र में सांसद बन चुके थे।
एक और साथी मिथिलेश कुमार सिंह विधायक बन गए थे। लेकिन नीतीश, जो 1972 में बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग कर चुके थे, अभी खाली हाथ थे।
सफलता ने उन्हें लंबे समय तक छकाया। 1985 में जाकर उन्होंने पहली बार हरनौत से चुनाव जीता। तब तक लालू यादव बड़े नेता बन चुके थे। 1990 से 2005 तक बिहार में लालू युग रहा।
नीतीश केंद्र में मंत्री रहे, लेकिन बिहार की सत्ता उनसे दूर रही। साल 2000 में वह महज 7 दिन के लिए सीएम बने, पर बहुमत साबित नहीं कर पाए। लेकिन 2005 में उन्होंने वह कर दिखाया जो नामुमकिन लगता था-लालू के अभेद्य दुर्ग को ढहा दिया।
इंफ्रास्ट्रक्चर मैन की छवि
nitish kumar (2)
2005 में जब नीतीश ने सत्ता संभाली, बिहार की पहचान गड्ढों वाली सड़कों से होती थी। शाम ढलते ही लोग घरों में दुबक जाते थे। नीतीश ने इसे बदला।
पहला कार्यकाल (2005-2010) में उनका पूरा ध्यान सड़कों और पुलों पर रहा। गांवों को शहरों से जोड़ा गया। दूसरे कार्यकाल (2010-2015) में स्कूल, अस्पताल और सरकारी भवनों की बाढ़ आ गई। उन्होंने बिहार म्यूजियम, सम्राट कन्वेंशन सेंटर और बापू टावर जैसे आधुनिक स्मारक बनवाए। लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि नीतीश ईंट-पत्थर के विकास में उलझ गए।
नीतीश ने स्कूल तो बनवाए, लेकिन उनमें शिक्षक नहीं थे। अस्पताल बने, लेकिन डॉक्टर नदारद रहे। आज भी बिहार के बड़े नेता इलाज के लिए दिल्ली जाते हैं। पटना मेडिकल कॉलेज (PMCH), जो कभी देश का गौरव था, आज अपनी साख खो चुका है।
सुशासन का चेहरा, कानून का राज
nitish kumar (7)
सुशासन बाबू यानीनीतीश कुमार की सबसे बड़ी जीत थी- बिहार से जंगलराज के ठप्पे को हटाना। कांग्रेस के दौर में दंगे होते थे, लालू के दौर में जातीय नरसंहार होते थे। नीतीश के राज में बिहार ने बड़े जातीय दंगों या सांप्रदायिक हिंसा से मुक्ति पाई।
नीतीश ने पुलिस में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई। आज बिहार में देश में सबसे ज्यादा महिला पुलिसकर्मी हैं। एक किस्सा मशहूर है। साल 2020 में तत्कालीन डीजीपी गुप्तेशवर पांडेय सादे कपड़ों में चेकिंग पर निकले।
नीतीश कुमार ने दो महिला सिपाहियों से मजाक में पूछा, क्या तुम्हें बंदूक चलानी आती है? उन बहादुर बेटियों ने तुरंत उन पर बंदूक तान दी और कहा कि पीछे हटिए। डीजीपी को अपनी पहचान बतानी पड़ी। नीतीश ने ऐसी पुलिस फोर्स तैयार की।
सामाजिक न्याय व साइकिल का सपना
nitish kumar (3)
नीतीश कुमार ने कर्पूरी ठाकुर के कोटा के भीतर कोटा के सपने को आगे बढ़ाया। लालू ने पिछड़ों को आवाज दी, तो नीतीश ने उन्हें योजनाएं दीं।
एक बार नीतीश ने इंटरव्यू में कहा था, अगर मुझे बिहार की तस्वीर बनानी हो, तो मैं उस लड़की की तस्वीर बनाऊंगा जो साइकिल चलाकर स्कूल जा रही है। और उन्होंने यह सच कर दिखाया।
नौवीं क्लास की लड़कियों को मुफ्त साइकिल, ड्रेस और स्कॉलरशिप देकर उन्होंने बिहार के घरों के भीतर साइलेंट क्रांति कर दी। उन्होंने अति-पिछड़ों (EBC) और दलितों का एक नया वोट बैंक तैयार किया। इसी सोशल इंजीनियरिंग की वजह से वह दशकों तक बिहार की राजनीति के तीसरे ध्रुव बने रहे।
आधी आबादी का पूरा हक
- देश में महिला आरक्षण पर सालों तक बहस होती रही, लेकिन नीतीश ने काम करके दिखाया।
- 2006 में पंचायतों में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया। सरकारी नौकरियों और पुलिस में 35% आरक्षण दिया।
- 'जीविका' (NRLM) के जरिए 1.8 करोड़ महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया। आज ये महिलाएं दीदी की रसोई चलाती हैं। वे बिहार को खुले में शौच से मुक्त करने की रीढ़ हैं।
गठबंधन की राजनीति के जादूगर
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nitish kumar (5)
नीतीश कुमार का सबसे बड़ा हुनर था-गठबंधन। वह जानते थे कि उनके पास अपना बड़ा वोट बैंक नहीं है (कुर्मी समाज मात्र 2.8% है), लेकिन वह जानते थे कि सत्ता की चाबी किसके पास है।
1996 में बीजेपी के साथ आए, फिर 2013 में अलग हुए। 2015 में लालू के साथ आए, फिर 2017 में बीजेपी के साथ। वह राजनीति के ऐसे खिलाड़ी रहे जिन्होंने बीजेपी और आरजेडी, दोनों को अपने इशारों पर नचाया। वह हमेशा किंगमेकर भी रहे और किंग भी।
इतिहास उन्हें कैसे याद रखेगा?
श्रीकृष्ण सिंह ने उद्योग और शिक्षा के संस्थान बनाए। कर्पूरी ठाकुर ने सामाजिक न्याय की राह दिखाई। नीतीश ने इन दोनों का मिश्रण करने की कोशिश की।
नीतीश ने बिहार को अंधेरे से बाहर निकाला। उन्होंने बुनियादी ढांचा दिया। लेकिन वह बिहार को 'इंडस्ट्रियल हब' नहीं बना पाए। वह शिक्षा की गुणवत्ता में पिछड़ गए। उन्होंने कॉमन स्कूल सिस्टम लागू नहीं किया।
एक युग की समाप्ति
nitish kumar (6)
नीतीश कुमार का बिहार से जाना एक दौर की समाप्ति है। वह एक ऐसे इंजीनियर थे, जिन्होंने टूटे हुए बिहार की मरम्मत तो की, लेकिन उसे नई उड़ान देने के लिए जो बड़े रिस्क चाहिए थे, शायद गठबंधन की मजबूरी में वह ले नहीं पाए।
फिर भी, जब-जब बिहार की सड़कों पर कोई लड़की साइकिल चलाकर स्कूल जाएगी, नीतीश कुमार की विरासत मुस्कुराती नजर आएगी।
ये खबरें भी पढ़ें...
नीतीश कुमार ने दिया CM पद से इस्तीफा, बिहार के नए मुख्यमंत्री का ऐलान थोड़ी देर में
बिहार में नई सरकार की तैयारी: नीतीश कुमार ने दिया संकेत, अब दिल्ली में निभाएंगे नई भूमिका
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया नई पारी का ऐलान, बोले- राज्यसभा सदस्य बनना चाहता हूं
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