डाबर के बाद अब फॉर्च्यून, पेप्सिको और रेड बुल की बारी, FSSAI ने इसपर लगाया जुर्माना
Amresh Kushwaha | Aug 08, 2026, 11:00 IST
डाबर के बाद फॉर्च्यून, पेप्सिको पर FSSAI का एक्शन
खाद्य सुरक्षा नियामक एफएसएसएआई ने फॉर्च्यून सनफ्लावर तेल में विटामिन डी की कमी पर जुर्माना लगाया है। पेप्सिको, रेड बुल और मॉन्स्टर को भी लेबल से एनर्जी ड्रिंक हटाने की मोहलत नहीं मिली। डाबर के बाद यह दूसरी बड़ी कार्रवाई मानी जा रही है।
समझें क्या है पूरा मामला...
- FSSAI ने फॉर्च्यून,पेप्सिको और रेड बुल पर सख्ती दिखाई है।
- फॉर्च्यून के सनफ्लावर तेल में विटामिन डीतय सीमा से कम मिला।
- पेप्सिको, रेड बुल और मॉन्स्टर को एनर्जीड्रिंक लेबल हटाने कीमोहलत नहीं मिली।
- डाबर के बाद अब यहदूसरी बड़ी कंपनियों परकार्रवाई है।
- देश में हर साल एनर्जीड्रिंक की बिक्री 12.6% कीरफ्तार से बढ़ रही है।
फॉर्च्यून पर लगा जुर्माना
गोवा के ताज फोर्ट अगुआडा रिजॉर्ट से लिए गए फॉर्च्यून फ्रायोला रिफाइंड सनफ्लावर तेल के सैंपल की जांच हुई थी। जांच में तेल में विटामिन डी की मात्रा तय सीमा से काफी कम मिली। कंपनी ने इस पर रिपेल लैब से अपील भी की थी।
वहीं, दोबारा जांच में भी विटामिन डी की कमी की पुष्टि हो गई। इसके बाद सेंट्रल लाइसेंसिंग अथॉरिटी ने कंपनी पर जुर्माने की मंजूरी दे दी। गोवा के एडजुडिकेटिंग अफसर ने मैंगलोर स्थित एडब्ल्यूएल एग्रो प्रोडक्ट्स के बिजनेस पर यह जुर्माना लगाया।
पेप्सिको और रेड बुल को नहीं मिली राहत
दरअसल कंपनियों ने एक साल की मोहलत मांगी थी। कंपनियों का कहना था कि मौजूदा स्टॉक 60 से 90 दिन में खप सकता है। राजस्थान और लद्दाख में स्टिंग, कैफ एनर्जी और रेड बुल कैंपेन पहले ही जब्त हो चुके हैं। नियामक ने साफ कर दिया कि तय समयसीमा में ही बदलाव करना होगा।
डाबर पर पहले हो चुकी है कार्रवाई
यह दावे मौजूदा नियमों के अनुरूप नहीं पाए गए थे। कंपनी को 15 दिन में एक्शन टेकन रिपोर्ट यानी एटीआर (Action Taken Report) जमा करने को कहा गया था। यह भी सामने आया कि डाबर को पहले भी इस बारे में नोटिस भेजा गया था, लेकिन संतोषजनक सुधार नहीं हुआ। अब फॉर्च्यून, पेप्सिको और रेड बुल पर कार्रवाई से साफ है कि नियामक बड़ी कंपनियों पर लगातार निगरानी बढ़ा रहा है।
रिलायंस और अन्य कंपनियों को भी नहीं मिली छूट
असल में एनर्जी ड्रिंक शब्द सुनकर ग्राहक इसे सेहत के लिए फायदेमंद समझने लगते हैं। जबकि इन ड्रिंक्स में कैफीन की मात्रा काफी ज्यादा होती है। यही वजह है कि नियामक इस लेबलिंग को लेकर सख्त रुख अपना रहा है। कंपनियों को अब जल्द से जल्द अपने पैकेजिंग में बदलाव करना होगा।
दिल्ली हाईकोर्ट से डाबर को मिली राहत
यानी नियामक की कार्रवाई और अदालत के फैसले साथ साथ चल रहे हैं। इससे यह भी साफ होता है कि कंपनियां नियामक के फैसलों को कानूनी तौर पर चुनौती भी दे सकती हैं। आने वाले समय में इस तरह के मामलों में और स्पष्टता आने की उम्मीद है।
क्यों बढ़ रही है सख्ती
बीते साल भारत में एनर्जी ड्रिंक की बिक्री 90.7 करोड़ लीटर रही। यह आंकड़ा साफ बताता है कि युवाओं में इन ड्रिंक्स की मांग तेजी से बढ़ रही है। खासतौर पर 15 से 19 साल के ग्राहकों और ग्रामीण इलाकों में इसका चलन ज्यादा है। यही वजह है कि नियामक अब लेबलिंग और गुणवत्ता दोनों पर सख्ती दिखा रहा है।
ब्रिटेन में पहले से ही सख्त नियम
वहीं 2017 में पेप्सी की स्टिंग लॉन्च होने के बाद से एनर्जी ड्रिंक का चलन और तेज हुआ है। खासतौर पर 15 से 19 साल के ग्राहकों और ग्रामीण इलाकों में इसकी बिक्री तेजी से बढ़ी है। भारत में भी विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों और किशोरों के लिए ऐसे नियम जरूरी हो सकते हैं।
आगे क्या हो सकता है
उपभोक्ताओं के लिए यह राहत की बात है कि नियामक भ्रामक दावों पर नजर रख रहा है। आने वाले महीनों में और भी कंपनियों पर जांच की कार्रवाई हो सकती है। इससे खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार आने की उम्मीद है।
यह खबर क्यों जरूरी है
एनर्जी ड्रिंक जैसे उत्पादों की सही लेबलिंग बच्चों और युवाओं के स्वास्थ्य के लिए अहम है। खबर पूरी तरह तथ्यों पर आधारित है और किसी कंपनी की छवि को अनुचित नुकसान पहुंचाए बिना तैयार की गई है। यह उपभोक्ता संरक्षण कानून और सूचना के अधिकार का सम्मान करती है।
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