बिजली बिल का टेंशन खत्म! क्या है PFBR तकनीक, जिससे आम आदमी को मिलेगी सस्ती बिजली?
Aman Vaishnav | Apr 07, 2026, 14:51 IST
india pfbr nuclear reactor thorium self reliance energy
भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया है। अब भारत में बिजली की कीमतों से बड़ी राहत मिलेगी। खास बात ये है कि इससे भारत को बिजली बनाने के लिए दूसरे देशों से ईंधन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
भारत ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है जो देश को परमाणु ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेगी। इससे भारत को बिजली बनाने के लिए कनाडा जैसे देशों से ईंधन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
दरअसल भारत का एडवांस परमाणु रिएक्टर PFBR (फास्ट ब्रीडर रिएक्टर) दूसरे चरण में ऐसी स्टेज तक पहुंच चुका है जहां यह खुद ही ईंधन पैदा करेगा और बिजली भी बनाएगा। वहीं तीसरे चरण में थोरियम का इस्तेमाल होगा।
सबसे बड़ी बात ये है कि भारत के पास थोरियम का सबसे बड़ा भंडार है जो कुल 25 फीसदी है। इससे भारत को भविष्य में और भी बड़ी ऊर्जा उपलब्ध हो सकती है।
देखा जाए तो भारत में 2047 तक आबादी 150 करोड़ के आसपास हो सकती है। इससे जायज है कि बिजली की मांग बहुत बढ़ेगी। शहरीकरण के चलते बिजली की खपत तेजी से बढ़ी है। भारत के लिए यह बड़ी चुनौती है कि वह बिजली उत्पादन बढ़ाए और साथ ही इसकी कीमतों को काबू में रखे।
जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए भारत को कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को सीमित रखना भी जरूरी है। ऐसे में परमाणु ऊर्जा से पैदा होने वाली बिजली एक बड़ा बदलाव ला सकती है।
तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित PFBR रिएक्टर ने क्रिटिकैलिटी की अहम स्टेज हासिल कर ली है। इसका मतलब है कि अब परमाणु विखंडन में इतने न्यूट्रॉन पैदा हो रहे हैं कि खुद ब खुद न्यूक्लियर रिएक्शन शुरू हो जाता है। इससे परमाणु बिजली बनने लगती है।
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भारत में अलग-अलग प्रकार की बिजली की कीमतें अलग-अलग हैं
परमाणु ऊर्जा: पुराने परमाणु संयंत्रों, जैसे तारापुर 1-2 से बिजली की कीमत 92 पैसे से 1.20 रुपए प्रति यूनिट तक हो सकती है। वहीं नए परमाणु संयंत्रों जैसे कुडनकुलम से बिजली की कीमत 4 से 6 रुपए प्रति यूनिट तक होती है।
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जल विद्युत संयंत्र: पुराने जल विद्युत संयंत्रों से बिजली सबसे सस्ती होती है। हालांकि जो नए बड़े जल विद्युत संयंत्र बन रहे हैं, उनसे बिजली की लागत 5 से 7 रुपए प्रति यूनिट तक हो सकती है। इनमें विस्थापन और पर्यावरण से जुड़े मुआवजे की लागत ज्यादा होती है।
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कोयला (थर्मल प्लांट्स): पुराने कोयला संयंत्रों से बिजली 3.50 से 5 रुपए प्रति यूनिट तक होती है। लेकिन कोयले की बढ़ती कीमतें, ग्लोबल वार्मिंग की चिंता और परिवहन खर्च के कारण नए कोयला संयंत्रों की बिजली की लागत 6 से 8 रुपए तक हो सकती है।
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हाइड्रो प्लांट साल भर एक जैसी बिजली नहीं दे सकते क्योंकि गर्मियों में पानी की कमी हो जाती है। वहीं परमाणु संयंत्र साल के 365 दिन बराबर बिजली देते रहते हैं। इससे पावर ग्रिड को स्थिरता मिलती है। इसके कारण बैकअप पावर की जरूरत नहीं पड़ती।
एक परमाणु संयंत्र को बिजली बनाने के लिए बहुत कम जगह की जरूरत होती है। वहीं जल विद्युत संयंत्रों के लिए बड़े-बड़े बांध बनाने पड़ते हैं। इसके चलते हजारों एकड़ जंगल डूब जाते हैं।
टिहरी डैम इसका अच्छा उदाहरण है। अब कलपक्कम के PFBR जैसे परमाणु रिएक्टरों की मदद से भारत अपनी पुरानी परमाणु राख (Waste) को ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर सकेगा। इससे भविष्य में बिजली की कीमतें और भी कम हो सकती हैं।
भारत में अभी कुल बिजली उत्पादन की क्षमता 524 गीगावॉट है। इसमें से 47.4 फीसदी बिजली कोयला और गैस से बनने वाले संयंत्रों से आती है। हाइड्रो पावर से 51.2 गीगावॉट बिजली बनती है, जो कुल उत्पादन का 9.8 फीसदी है।
परमाणु बिजली संयंत्रों से 8.8 गीगावॉट यानी करीब 1.7 फीसदी बिजली उत्पादन होता है। वहीं, सौर ऊर्जा से करीब 216 गीगावॉट बिजली बनती है, जो 27 फीसदी है, और पवन ऊर्जा से 10.5 फीसदी बिजली उत्पादन होता है।
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2047 तक भारत का लक्ष्य है कि एटामिक पावर से 100 गीगावॉट बिजली बने, जो कुल उत्पादन का 5 प्रतिशत होगा। सौर ऊर्जा से 1200 गीगावॉट बिजली बनाई जाएगी, जो 57 प्रतिशत होगी।
पवन ऊर्जा से 400 गीगावॉट बिजली का उत्पादन होगा, जो 19 प्रतिशत होगा। हाइड्रो प्लांट से 116 गीगावॉट बिजली बनाई जाएगी, जो 5.5 प्रतिशत होगी, और थर्मल प्लांट से 250 गीगावॉट बिजली का उत्पादन होगा, जो कुल 12-13 प्रतिशत होगा।
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दरअसल भारत का एडवांस परमाणु रिएक्टर PFBR (फास्ट ब्रीडर रिएक्टर) दूसरे चरण में ऐसी स्टेज तक पहुंच चुका है जहां यह खुद ही ईंधन पैदा करेगा और बिजली भी बनाएगा। वहीं तीसरे चरण में थोरियम का इस्तेमाल होगा।
सबसे बड़ी बात ये है कि भारत के पास थोरियम का सबसे बड़ा भंडार है जो कुल 25 फीसदी है। इससे भारत को भविष्य में और भी बड़ी ऊर्जा उपलब्ध हो सकती है।
भारत में बढ़ती बिजली की मांग
जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए भारत को कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को सीमित रखना भी जरूरी है। ऐसे में परमाणु ऊर्जा से पैदा होने वाली बिजली एक बड़ा बदलाव ला सकती है।
तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित PFBR रिएक्टर ने क्रिटिकैलिटी की अहम स्टेज हासिल कर ली है। इसका मतलब है कि अब परमाणु विखंडन में इतने न्यूट्रॉन पैदा हो रहे हैं कि खुद ब खुद न्यूक्लियर रिएक्शन शुरू हो जाता है। इससे परमाणु बिजली बनने लगती है।
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भारत में अलग-अलग प्रकार की बिजली की कीमतें अलग-अलग हैं
परमाणु ऊर्जा: पुराने परमाणु संयंत्रों, जैसे तारापुर 1-2 से बिजली की कीमत 92 पैसे से 1.20 रुपए प्रति यूनिट तक हो सकती है। वहीं नए परमाणु संयंत्रों जैसे कुडनकुलम से बिजली की कीमत 4 से 6 रुपए प्रति यूनिट तक होती है।
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जल विद्युत संयंत्र: पुराने जल विद्युत संयंत्रों से बिजली सबसे सस्ती होती है। हालांकि जो नए बड़े जल विद्युत संयंत्र बन रहे हैं, उनसे बिजली की लागत 5 से 7 रुपए प्रति यूनिट तक हो सकती है। इनमें विस्थापन और पर्यावरण से जुड़े मुआवजे की लागत ज्यादा होती है।
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कोयला (थर्मल प्लांट्स): पुराने कोयला संयंत्रों से बिजली 3.50 से 5 रुपए प्रति यूनिट तक होती है। लेकिन कोयले की बढ़ती कीमतें, ग्लोबल वार्मिंग की चिंता और परिवहन खर्च के कारण नए कोयला संयंत्रों की बिजली की लागत 6 से 8 रुपए तक हो सकती है।
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बजली कैसे मिलेगी सस्ती?
इसका एक सबसे बड़ा फायदा
टिहरी डैम इसका अच्छा उदाहरण है। अब कलपक्कम के PFBR जैसे परमाणु रिएक्टरों की मदद से भारत अपनी पुरानी परमाणु राख (Waste) को ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर सकेगा। इससे भविष्य में बिजली की कीमतें और भी कम हो सकती हैं।
भारत में कुल बिजली उत्पादन क्षमता
परमाणु बिजली संयंत्रों से 8.8 गीगावॉट यानी करीब 1.7 फीसदी बिजली उत्पादन होता है। वहीं, सौर ऊर्जा से करीब 216 गीगावॉट बिजली बनती है, जो 27 फीसदी है, और पवन ऊर्जा से 10.5 फीसदी बिजली उत्पादन होता है।
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ये है नया लक्ष्य
पवन ऊर्जा से 400 गीगावॉट बिजली का उत्पादन होगा, जो 19 प्रतिशत होगा। हाइड्रो प्लांट से 116 गीगावॉट बिजली बनाई जाएगी, जो 5.5 प्रतिशत होगी, और थर्मल प्लांट से 250 गीगावॉट बिजली का उत्पादन होगा, जो कुल 12-13 प्रतिशत होगा।
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FAQ
- PFBR क्या है और यह कैसे काम करता है?
यह एक विशेष प्रकार का एडवांस परमाणु रिएक्टर है। यह बिजली बनाने के साथ-साथ खुद का ईंधन भी पैदा करता है। इसमें ईंधन के रूप में यूरेनियम और प्लूटोनियम का इस्तेमाल होता है। यह तकनीक भारत को परमाणु ऊर्जा में आत्मनिर्भर बना देगी।
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