पुरुषों से 3 साल ज्यादा जीती हैं भारतीय महिलाएं, डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में खुलासा
Kaushiki | Jul 04, 2026, 12:00 IST
Indian Women Health Status
भारत में महिलाओं की लाइफ एक्सपेक्टेंसी पुरुषों से अधिक है पर उनका हेल्दी लाइफस्पैन बहुत कम है। डब्ल्यूएचओ की नई रिपोर्ट के मुताबिक महिलाएं जीवन के आखिरी दस से ज्यादा साल गंभीर बीमारियों में बिताती हैं। एनीमिया इसकी एक बहुत बड़ी वजह बनकर उभरा है।
समझें क्या है पूरा मामला
- भारत में बेहतर मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से एवरेज लाइफ एक्सपेक्टेंसी काफी बढ़ गई है।
- पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की एवरेज उम्र ज्यादा है पर वे सेहतमंद नहीं हैं।
- वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन यानी डब्ल्यूएचओ ने इसे लेकर नए आंकड़े जारी किए हैं।
- भारतीय महिलाएं अपने जीवन के आखिरी दस से अधिक साल गंभीर अस्वस्थता में बिताती हैं।
- देश में बढ़ता एनीमिया का स्तर महिलाओं की गिरती इम्यूनिटी का सबसे मुख्य कारण है।
बेहतर मेडिकल फैसिलिटीज का नया दौर
अब लोग पहले के मुकाबले ज्यादा लंबा जीवन जी रहे हैं। बीमारियों पर काबू पाया जा रहा है और जीवन स्तर भी सुधरा है। साइंस और टेक्नोलॉजी की मदद से खतरनाक संक्रामक बीमारियों पर काफी हद तक काबू पा लिया गया है।
इस कारण मृत्यु दर में भारी गिरावट आई है। डब्ल्यूएचओ की नई रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के बाकी देशों की तरह भारत में भी महिलाएं ज्यादा जीती हैं। वे पुरुषों के मुकाबले अधिक साल जीवित रहती हैं।
लाइफ एक्सपेक्टेंसी का असली सच
अगर हम स्टैटिस्टिक्स पर नजर डालें तो भारतीय महिलाओं की एवरेज लाइफ एक्सपेक्टेंसी इस समय लगभग 69 वर्ष दर्ज की गई है। दूसरी तरफ अगर हम पुरुषों की एवरेज उम्र की बात करें तो ये आंकड़ा केवल 65.8 साल ही देखा गया है।
इसका सीधा गणित यह है कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले औसतन तीन साल ज्यादा जीवित रहती हैं। सुनने में ये काफी अच्छा लगता है, लेकिन जैसे ही हम हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी के आंकड़ों को देखते हैं तो पूरा का पूरा खेल पूरी तरह बदल जाता है।
क्या कहता है हेल्दी लाइफस्पैन का डेटा
वहीं पुरुषों के केस में यह हेल्दी लाइफस्पैन 58 साल का देखा गया है। यानी दोनों के स्वस्थ जीवन में कोई बड़ा अंतर नहीं है। इस पूरे कैलकुलेशन को अगर हम बहुत ही सिंपल और आसान भाषा में समझें तो ये स्थिति काफी डरावनी और चिंताजनक महसूस होती है।
इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय महिलाएं अपने जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा गंभीर बीमारियों और शारीरिक लाचारी के बीच गुजारती हैं।
एक एवरेज इंडियन वुमन अपनी पूरी जिंदगी के आखिरी 10 साल खराब हेल्थ कंडीशन में बिताने पर मजबूर होती है। इस लंबे समय के दौरान वे किसी न किसी क्रोनिक डिजीज, जोड़ों के दर्द या शारीरिक लाचारी से लगातार संघर्ष करती रहती हैं।
Women Health Challenges
पुरुषों और महिलाओं की सेहत का अंतर
प्रतिशत के हिसाब से देखें तो महिलाएं अपनी पूरी लाइफ का लगभग 15.5% हिस्सा पूरी तरह से अस्वस्थ होकर गुजारती हैं। पुरुषों के लिए बीमारी में बिताए जाने वाले जीवन का यह आंकड़ा केवल 11.9% ही दर्ज किया गया है जो कि काफी कम है। यह अंतर दिखाता है कि हमारे समाज में महिलाओं को बेहतर मेडिकल केयर और स्पेशल अटेंशन की बहुत ज्यादा जरूरत है।
उनकी इस नाजुक स्थिति को लेकर हमारी सरकारों, हेल्थ एक्सपर्ट्स और पूरे समाज को बहुत गहराई से सोचने की सख्त जरूरत है। जब तक हम महिलाओं की इस क्रिटिकल कंडीशन पर काम नहीं करेंगे तब तक एक स्वस्थ और मजबूत समाज का निर्माण करना पूरी तरह असंभव होगा।
एनीमिया बना सेहत का सबसे बड़ा दुश्मन
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे ने हाल ही में देश के अंदर एनीमिया के शिकार लोगों पर एक बहुत ही चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है। यह लेटेस्ट रिपोर्ट साफ बताती है कि भारत में महिलाओं के बीच एनीमिया की स्थिति कितनी ज्यादा भयावह और अलार्मिंग स्टेज पर पहुंच चुकी है।
डेटा के मुताबिक देश में 15 से लेकर 49 इयर्स के एज ग्रुप की लगभग 57% महिलाएं इस समय एनीमिया की गंभीर समस्या से पीड़ित हैं। यानी हमारे देश की आधे से अधिक महिला आबादी के शरीर में जरूरत के मुताबिक पर्याप्त खून ही मौजूद नहीं है।
यह बेहद चिंताजनक है। इसके विपरीत अगर हम पुरुषों में खून की कमी का आंकड़ा देखें तो यह सिर्फ 25.1% ही पाया गया है जो महिलाओं से काफी बेहतर है।
Women Health Challenges
कमजोर इम्यूनिटी और बढ़ती बीमारियां
यह गंभीर समस्या सिर्फ रोजमर्रा की मामूली थकान या कमजोरी तक ही सीमित नहीं रहती। यह अंदर ही अंदर उनके पूरे सिस्टम को खोखला करती है। खून की कमी महिलाओं की नेचुरल इम्यूनिटी को बहुत ज्यादा कमजोर और डैमेज कर देती है। कमजोर इम्यूनिटी होने के कारण वे बहुत आसानी से और जल्दी-जल्दी दूसरी खतरनाक इन्फेक्शियस बीमारियों की चपेट में आने लगती हैं।
बढ़ती उम्र के साथ यह हेल्थ रिस्क और ज्यादा मल्टीप्लाय हो जाता है। इसका सीधा असर उनके होने वाले बच्चों की सेहत पर भी पड़ता है। एक अस्वस्थ और कमजोर मां कभी भी एक पूरी तरह से हेल्दी और तंदुरुस्त बच्चे को जन्म नहीं दे सकती। यह एक मेडिकल फैक्ट है।
भविष्य की बड़ी चुनौतियां
इतनी बड़ी बुजुर्ग आबादी को संभालना और उन्हें मेडिकल सपोर्ट देना देश की इकॉनमी और हेल्थ सिस्टम के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होगी। ऐसे भविष्य में सिर्फ लोगों की एवरेज उम्र बढ़ा देना ही काफी नहीं होगा। हमें उनके जीवन की क्वालिटी पर भी ध्यान देना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे देश के बुजुर्ग एक पूरी तरह से डिग्निफाइड, इंडिपेंडेंट और हेल्दी लाइफ जिएं।
डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट मेंविशेष रूप से बुजुर्ग महिलाओं को स्वस्थ रखना हमारी नेशनल हेल्थ पॉलिसी की सबसे बड़ी और कठिन परीक्षा साबित होने वाला है। इस बड़ी समस्या से निपटने के लिए हमारी सरकारों को अभी से बहुत ही ठोस, प्रैक्टिकल और कड़े कदम उठाने की सख्त जरूरत है। सरकारों को ग्रासरूट लेवल पर महिलाओं के सही न्यूट्रिशन और उनके हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर विशेष फोकस करना होगा। तभी यह स्थिति (whoIndian Women ageing) पूरी तरह सुधरेगी।
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