उर्दू और फारसी के उपयोग पर विवाद, I&B ministry के इस बयान से भड़क गए मीडिया वाले
CHAKRESH | Sept 26, 2025, 14:01 IST
language dispute Hindi Urdu Persian language dispute I B ministry
भारत में उर्दू और फारसी शब्दों के उपयोग को लेकर सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा उठाए गए कदम पर विवाद हो गया है। क्या यह भाषा की शुद्धता का मामला है, या कुछ और? जानें इस इस खबर में विस्तार से...
भारत में भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और राजनीति का भी आईना है। हाल ही में एक अनूठा विवाद (language dispute) सामने आया- सूचना और प्रसारण मंत्रालय (I&B) ने देश के पांच बड़े हिंदी न्यूज चैनल (TV9 भारतवर्ष, आज तक, ABP, Zee News और TV18) को एक दर्शक की शिकायत फॉरवर्ड की। इसमें आरोप था कि ये चैनल लगभग 30% उर्दू शब्दों का प्रयोग करते हैं। महाराष्ट्र निवासी शिकायतकर्ता एसके श्रीवास्तव मानते हैं कि यह जनता के साथ धोखा और आपराधिक कृत्य है।
PIB Fact Check और सरकारी बयानों में स्पष्ट किया गया कि यह महज एक शिकायत है, कोई औपचारिक आदेश या प्रतिबंध नहीं।
क्या कभी ध्यान दिया है, हमारे रोजमर्रा संवाद में कौन-से शब्द किस भाषा से आते हैं? मेज, कुर्सी, दुकान, अदालत, हव्वा, खत, तस्वीर, आईना, कागज- यह सूची हजारों शब्दों की है। इनमें से अधिकांश शब्द अरबी-फारसी के रास्ते उर्दू (Hindi Urdu Persian) होते हुए हमारे जीवन में घुलमिल गए हैं।
इन शब्दों को निकालेंगे तो संवाद अधूरा हो जाएगा। आज कोई खत बोले या पत्र-माहौल एक सा रहता है।
समाचार चैनल स्क्रिप्टिंग के दौरान सहज, आकर्षक और बोधगम्य भाषा का चयन करते हैं। शब्दों का दोहराव न हो, इसके लिए संवाद शैली में कभी भरोसा, कभी यकीन, कभी विश्वास- तीनों का इस्तेमाल होता है। चैनल के संपादक जानते हैं कि आम आदमी को वही भाषा समझ आएगी जो उसके घर-दफ्तर या सड़क-परचूनी में बोली जाती है। यह भी हकीकत है कि लोगों को चैनल की भाषा हास्यास्पद या क्लिष्ट लगे तो TRP खुद गिरने लगती है, चाहे कोई भी रीजन हो।
दरअसल I&B (Ministry of Information and Broadcasting) नियमों में भाषा प्रतिशत तय करने का प्रावधान ही नहीं है- कानून सिर्फ अश्लीलता, राष्ट्र विरोध, सामाजिक शालीनता पर नियंत्रण, चैनल की मुख्य भाषाओं की घोषणा जैसी औपचारिकताओं तक सीमित है। सरकार की राजभाषा नीति भले हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देती हो, पर चैनलों पर वह बाध्यकारी नहीं।
जिन शब्दों पर आपत्ति हुई, वही मंत्रालय की ऑफिशियल वेबसाइट, पीआईबी रिलीज या सरकारी कम्युनिकेशन में भी इस्तेमाल होते हैं। सरकारी बयान में कथित, तहत, शिकायत, नियम- सब उर्दू-फारसी जड़ों के हैं। क्या टीवी न्यूज चैनलों पर आदेश लागू करना और सरकार पर नहीं- यह विडंबना नहीं तो और क्या है?
2025 में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र नगर परिषद के एक साइनबोर्ड पर उर्दू की चुनौती वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा-
भाषा कोई धर्म नहीं, यह संस्कृति और समाज की पहचान का मापदंड है। उर्दू गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है।
हकीकत है कि दैनिक हिंदी भी उर्दू शब्दों के बिना अधूरी है, खुद हिंदी भी फारसी शब्द हिंदवी से बना है।
भाषा कोई दीवार नहीं, संवाद की पुल है। विविधता की ताकत को कमजोरी मत बनाओ।
समाज में उर्दू के लिए मुसलमानों की भाषा जैसी धारणा एकतरफा, वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टि से गलत है। 150 से ज्यादा साल के हिंदी लेखन-पठन- चाहे प्रेमचंद हो, शिवपूजन सहाय या जयशंकर प्रसाद- उसमें उर्दू के शब्द और रवानगी दिखेगी ही।
क्या कहता है कानून?
टेलीविजन नेटवर्क अधिनियम 1995 और टेलीविजन नेटवर्क नियम 1994 में भाषा प्रतिशत का कोई प्रावधान नहीं है।
टेलीविजन नेटवर्क अधिनियम 1995 और उसके तहत बने टेलीविजन नेटवर्क नियम 1994 में भाषा प्रतिशत से संबंधित कोई प्रावधान नहीं है। इन नियमों में केवल विषय वस्तु की शालीनता, राष्ट्रीय हित, अश्लीलता आदि पर रोक लगाने की बात की गई है, लेकिन भाषा के प्रतिशत पर कोई नियंत्रण नहीं है।
जब चैनलमिनिस्ट्री ऑफ इंफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग (MIB) से अपलिंकिंग या डाउनलिंकिंग की अनुमति प्राप्त करते हैं, तो वे अपनी चैनल की भाषा जैसे हिंदी, इंग्लिश, मलयालम आदि घोषित करते हैं। यह सिर्फ एक औपचारिकता होती है, जिसका उद्देश्य मुख्य भाषा का उल्लेख करना है। इसमें यह जरूरी नहीं होता कि उस भाषा में कितना प्रतिशत कंटेंट होगा।
भारत सरकार की राजभाषा नीति के तहत सरकारी कामकाज और संचार में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के प्रयास किए जाते हैं, लेकिन यह टेलीविजन चैनलों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।
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PIB Fact Check और सरकारी बयानों में स्पष्ट किया गया कि यह महज एक शिकायत है, कोई औपचारिक आदेश या प्रतिबंध नहीं।
इस मुद्दे को 5 प्वाइंट से ऐसे समझें
|
हिंदी और उर्दू: रोजमर्रा की जड़ों में एकता
| आम बोलचाल के शब्द: हिंदी-उर्दू जड़ाव की मिसाल | ||
|---|---|---|
| हिन्दी शब्द | मूल भाषा (स्रोत) | उपयोग की गुणवत्ता |
| आदमी | फारसी | इंसान, मनुष्य |
| अदालत | अरबी/फारसी | न्यायालय |
| उम्र | अरबी | जीवन, आयु |
| गुस्सा | अरबी | क्रोध |
| वजह | अरबी | कारण |
| मौसम | अरबी | ऋतु |
| खत | अरबी | चिट्ठी |
| तस्वीर | अरबी/फारसी | चित्र |
| किताब | अरबी | पुस्तक |
चैनलों में भाषा क्यों घुलती-मिलती है?
कानून बनाम भाषा की हकीकत
सूचना मंत्रालय, भ्रष्टाचार, और विडंबना
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: भाषा धर्म नहीं!
भाषा कोई धर्म नहीं, यह संस्कृति और समाज की पहचान का मापदंड है। उर्दू गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है।
हकीकत है कि दैनिक हिंदी भी उर्दू शब्दों के बिना अधूरी है, खुद हिंदी भी फारसी शब्द हिंदवी से बना है।
भाषा कोई दीवार नहीं, संवाद की पुल है। विविधता की ताकत को कमजोरी मत बनाओ।
I&B के नोटिस के दावों का सरकार ने खंडन किया
सामाजिक शिविरबंदी और शब्दों का धर्म
क्या कहता है कानून?
टेलीविजन नेटवर्क अधिनियम 1995 और उसके तहत बने टेलीविजन नेटवर्क नियम 1994 में भाषा प्रतिशत से संबंधित कोई प्रावधान नहीं है। इन नियमों में केवल विषय वस्तु की शालीनता, राष्ट्रीय हित, अश्लीलता आदि पर रोक लगाने की बात की गई है, लेकिन भाषा के प्रतिशत पर कोई नियंत्रण नहीं है।
चैनल की भाषा की औपचारिक घोषणा
भारत सरकार की राजभाषा नीति
FAQ
- सूचना और प्रसारण मंत्रालय और मीडिया चैनलों के बीच भाषा को लेकर विवाद क्यों है?
यह विवाद एक दर्शक की शिकायत से उत्पन्न हुआ था, जिसमें आरोप था कि प्रमुख हिंदी समाचार चैनल अपने प्रसारण में लगभग 30% उर्दू शब्दों का उपयोग करते हैं। मंत्रालय ने इस शिकायत को फॉरवर्ड किया, लेकिन कोई औपचारिक प्रतिबंध नहीं लगाया। - क्या हिंदी, उर्दू और फारसी भारत में आपस में जुड़े हुए हैं?
जी हां, रोजमर्रा की हिंदी और उर्दू में कई शब्द फारसी और अरबी से लिए गए हैं, जो भारत की जुड़ी हुई भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। - क्या सरकार मीडिया प्रसारण में भाषा के प्रतिशत को कानूनी रूप से लागू कर सकती है?
नहीं, सरकार मीडिया प्रसारण में भाषा के उपयोग के प्रतिशत पर कोई पाबंदी नहीं लगा सकती है। कानून केवल अश्लीलता, राष्ट्रविरोध और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को नियंत्रित करता है।
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