इंटरकास्ट मैरिज के समर्थन में RSS प्रमुख मोहन भागवत, कहा-जाति को भूलें, राजनीति खुद सुधर जाएगी
Anjali Dwivedi | May 08, 2026, 12:47 IST
mohan bhagwat rss inter caste marriage support
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अंतरजातीय विवाह का समर्थन करते हुए कहा कि विवाह सिर्फ एक व्यक्तिगत बंधन नहीं, बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि समाज को इसे एक जिम्मेदारी के रूप में देखना चाहिए, ताकि समाज में जातिवाद और भेदभाव को खत्म किया जा सके।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने समाज में जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए अंतरजातीय विवाहों का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल जातिगत भेदभाव का फायदा उठाते हैं और यही कारण है कि समाज में ये भेदभाव बने रहते हैं।
कर्नाटक के मैसूरु में JSS महाविद्यापीठ में एक विशेष व्याख्यान देते हुए मोहन भागवत ने लोगों से जाति आधारित भेदभाव को भूल जाने की अपील की। उन्होंने संविधान और कानून से आगे बढ़कर इसे खत्म करने के लिए सक्रिय कदम उठाने का आह्वान किया है।
भागवत ने कहा कि अगर समाज खुद इन भेदभावों को दूर करने के लिए कदम उठाएगा, तो फिर राजनीतिक दल इन्हें वोटों के लिए इस्तेमाल करना बंद कर देंगे। उन्होंने कहा कि राजनीतिज्ञ जाति का फायदा उठाते हैं। वे काम के आधार पर वोट नहीं पा सकते, लेकिन जाति के जरिए वोट हासिल कर लेते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि समाज को जाति को भूलना होगा, तब राजनीति खुद सुधर जाएगी। जाति खत्म करने की कोशिश किए बिना लोगों को ऐसा व्यवहार करना चाहिए जैसे कोई जाति है ही नहीं। केवल कानून और संविधान में दिए गए उपायों का ही नहीं, बल्कि सभी सकारात्मक कदमों का समर्थन करें। अंतरजातीय विवाह करने वाले लोगों का समर्थन करें।
भागवत ने यह भी बताया कि RSS के दूसरे सरसंघचालक एम एस गोलवलकर ने भी अंतरजातीय विवाह (Inter Caste marriage) का समर्थन किया था। वे इसे सामाजिक भेदभाव खत्म करने का एक तरीका मानते थे और यही सोच समाज को अपनानी चाहिए।
मोहन भागवत ने समाज में बदलाव के लिए इतिहास का उदाहरण देते हुए कहा कि, महाराष्ट्र में पहला अंतरजातीय विवाह साल 1942 में हुआ था। उस समय उस विवाह को दो महत्वपूर्ण हस्तियों ने अपना आशीर्वाद दिया था- एक डॉ. भीमराव आंबेडकर और दूसरे RSS के तत्कालीन प्रमुख एम. एस. गोलवलकर।
गोलवलकर जी ने उस समय पत्र लिखकर खुशी जताई थी कि यह विवाह केवल व्यक्तिगत इच्छा नहीं, बल्कि समाज के लिए एक बड़ा उदाहरण है कि कोई जाति नहीं होती।
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि आज भी हमारा दृष्टिकोण यही होना चाहिए। यदि समाज जाति को भूल जाएगा, तो राजनीति से इसका प्रभाव स्वतः खत्म हो जाएगा और नेता भी जाति आधारित राजनीति करना छोड़ देंगे।
भागवत ने लोगों से अपील की कि वे अपने दैनिक जीवन और बोलचाल में भी सुधार करें। उन्होंने कहा कि अक्सर हमारी भाषा में कुछ ऐसे शब्द शामिल होते हैं जो अनजाने में भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। ये शब्द हमारी रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन गए हैं, लेकिन ये दूसरों को ठेस पहुंचा सकते हैं। संघ प्रमुख के अनुसार, हमें अपनी भाषा को शुद्ध और संवेदनशील बनाना होगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल बड़े-बड़े उपदेश देने से बदलाव नहीं आएगा, बल्कि हमें छोटे-छोटे कार्यों से शुरुआत करनी चाहिए। हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि सामने वाले व्यक्ति को कभी यह महसूस न हो कि वह हमसे अलग या छोटा है।
किसी को भी यह अहसास नहीं होना चाहिए कि हम उसे अपने बराबर नहीं मानते। समाज में अपनत्व का भाव जगाने के लिए हमें उन दूरियों को खत्म करना होगा जो हमारे व्यवहार और शब्दों से पैदा होती हैं।
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कर्नाटक के मैसूरु में JSS महाविद्यापीठ में एक विशेष व्याख्यान देते हुए मोहन भागवत ने लोगों से जाति आधारित भेदभाव को भूल जाने की अपील की। उन्होंने संविधान और कानून से आगे बढ़कर इसे खत्म करने के लिए सक्रिय कदम उठाने का आह्वान किया है।
इंटरकास्ट मैरिज करने वालों का सपोर्ट करें- भागवत
उन्होंने आगे कहा कि समाज को जाति को भूलना होगा, तब राजनीति खुद सुधर जाएगी। जाति खत्म करने की कोशिश किए बिना लोगों को ऐसा व्यवहार करना चाहिए जैसे कोई जाति है ही नहीं। केवल कानून और संविधान में दिए गए उपायों का ही नहीं, बल्कि सभी सकारात्मक कदमों का समर्थन करें। अंतरजातीय विवाह करने वाले लोगों का समर्थन करें।
भागवत ने यह भी बताया कि RSS के दूसरे सरसंघचालक एम एस गोलवलकर ने भी अंतरजातीय विवाह (Inter Caste marriage) का समर्थन किया था। वे इसे सामाजिक भेदभाव खत्म करने का एक तरीका मानते थे और यही सोच समाज को अपनानी चाहिए।
जाति भूलें तो राजनीति खुद सुधर जाएगी- मोहन भागवत
गोलवलकर जी ने उस समय पत्र लिखकर खुशी जताई थी कि यह विवाह केवल व्यक्तिगत इच्छा नहीं, बल्कि समाज के लिए एक बड़ा उदाहरण है कि कोई जाति नहीं होती।
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि आज भी हमारा दृष्टिकोण यही होना चाहिए। यदि समाज जाति को भूल जाएगा, तो राजनीति से इसका प्रभाव स्वतः खत्म हो जाएगा और नेता भी जाति आधारित राजनीति करना छोड़ देंगे।
व्यवहार और भाषा में संवेदनशीलता
उपदेश नहीं, छोटे कदमों से शुरुआत
किसी को भी यह अहसास नहीं होना चाहिए कि हम उसे अपने बराबर नहीं मानते। समाज में अपनत्व का भाव जगाने के लिए हमें उन दूरियों को खत्म करना होगा जो हमारे व्यवहार और शब्दों से पैदा होती हैं।
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