ऑपरेशन सिंदूर के धमाकों के बीच प्रोजेक्ट GIB से बचाई सोन चिरैया की पुकार
Amresh Kushwaha | Jul 23, 2025, 17:04 IST
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भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, प्रोजेक्ट GIB के तहत सोन चिरैया (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) की सुरक्षा और संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों की कहानी।
मई में जब सेना के जवान ऑपरेशन सिंदूर से सीमा पर दुश्मन को धराशायी कर रहे थे, उसी दौरान सीमा के अंदर एक और युद्ध लड़ा जा रहा था - दुर्लभ जानवरों को बचाने का… ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की खत्म होती प्रजाति को बचाने का… भारत का गौरवशाली पक्षी, जिसे राजस्थान में सोन चिरैया के नाम से जाना जाता है, अब नजर नहीं आता। मुश्किल से 150 पक्षी बचे हैं। चलिए जानते हैं, कैसा था यह अभियान…
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ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जो पहले पूरे उपमहाद्वीप में झुंडों में देखे जाते थे, अब जंगली में 150 से कम बच गए हैं। उच्च-तनाव वाली बिजली लाइनों से टकराव, घटते आवास, और मानवीय हस्तक्षेप ने इस प्रतीकात्मक पक्षी को विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया है। इस संकट का मुकाबला करने के लिए 2018 में प्रोजेक्ट GIB (Great Indian Bustard) की शुरुआत की गई थी, जो पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय वन्यजीव संस्थान और राजस्थान वन विभाग की संयुक्त पहल है। दरअसल, जैसलमेर के रामदेवरा और सुदासरी प्रजनन केंद्र खोले गए हैं, जो सोन चिरैया की संख्या बढ़ाने की दिशा में बढ़ा काम कर रहे हैं।
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मई में जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के चलते लगभग युद्ध के हालात बन गए थे और ऑपरेशन सिंदूर शुरू हो चुका था। ऐसे में जैसलमेर के दोनों प्रजनन केंद्रों पर संकट के बादल छा गए थे। एक डर लगातार होने वाले शोर का और दूसरा किसी भी समय किसी बम या मिसाइल के गिर जाने का… ऐसे में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और राजस्थान वन विभाग ने बड़ा फैसला किया। तनाव खत्म होने तक सोन चिरैया के बच्चों को अजमेर शिफ्ट करने का…
10 मई की रात को, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और राजस्थान वन विभाग की एक संयुक्त टीम ने बड़ा अभियान शुरू किया। टीम ने जैसलमेर के रामदेवरा और सुदासरी प्रजनन केंद्रों से 5 से 28 दिनों की आयु के नौ GIB चूजों को एक सुरक्षित स्थान पर, जो अजमेर के पास अरेवर गांव में था, स्थानांतरित किया। यह यात्रा लगभग 200 किलोमीटर की थी, जो लगभग 10 घंटे में पूरी की गई। यात्रा के दौरान विशेष रूप से डिजाइन की गई सॉफ्ट सस्पेंशन वाहन, गद्देदार डिब्बे और रेत पर बिछी चादरों का उपयोग किया गया, ताकि तनाव को कम किया जा सके और सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित की जा सके।
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डेजर्ट नेशनल पार्क के DFO ब्रिजमोहन गुप्ता ने कहा कि हर चूजा अब उम्मीद का प्रतीक है। इसे सुरक्षित रूप से पहुंचाना हमारी नैतिक, वैज्ञानिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी थी।
18 जून तक, इन चूजों को उनके मूल प्रजनन केंद्रों में सुरक्षित रूप से वापस लाया गया, जब क्षेत्र को सुरक्षित घोषित किया गया। अब, जब ये बस्टर्ड चूजे निगरानी रखने वाले पशु चिकित्सकों की देखरेख में चहकते और खाते हैं, तो उनकी जीवित रहने की कहानी न केवल संरक्षण की एक जीत का प्रतीक है, बल्कि संकट के बीच दयालुता की भी जीत है।
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ऑपरेशन सिंदूर (operation sindoor) केवल एक वन्यजीव हस्तांतरण अभियान नहीं था, बल्कि यह उस संवेदनशील चेहरे को दिखाता है जिसे अक्सर सुरक्षा और युद्ध के शोर में अनसुना कर दिया जाता है। जहां एक ओर बॉर्डर पर सैन्य अभियान चल रहा था, वहीं उसी समय पर्यावरण का शांति दूत - सोन चिरैया - युद्ध के बीच सुरक्षित जीवन खोज रही थी।
ऑपरेशन सिंदूर ने यह साफ कर दिया है कि राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा में नहीं, बल्कि अपने पर्यावरण और जैव विविधता को बचाने में भी निहित है। जिस दिन एक चूजा सुरक्षित पहुंचा, उस दिन न केवल एक पक्षी की जान बची, बल्कि भारत ने अपनी संवेदनशीलता और वैज्ञानिक दिशा में भी एक मजबूत कदम रखा।
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वर्तमान में बस्टर्ड की वैश्विक आबादी 150 से भी कम रह गई है। इसके लुप्त होने के तीन प्रमुख कारण माने गए हैं:
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वन्यजीव संरक्षण | वन्यजीव संरक्षण अधिनियम | Wildlife Conservation
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इधर ऑपरेशन सिंदूर, उधर प्रोजेक्ट GIB
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मई में जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के चलते लगभग युद्ध के हालात बन गए थे और ऑपरेशन सिंदूर शुरू हो चुका था। ऐसे में जैसलमेर के दोनों प्रजनन केंद्रों पर संकट के बादल छा गए थे। एक डर लगातार होने वाले शोर का और दूसरा किसी भी समय किसी बम या मिसाइल के गिर जाने का… ऐसे में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और राजस्थान वन विभाग ने बड़ा फैसला किया। तनाव खत्म होने तक सोन चिरैया के बच्चों को अजमेर शिफ्ट करने का…
और आई 10 मई की रात
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बेहद अहम रहा अभियान
घर वापस लौट चुके चूजे
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पर्यावरणीय और सामाजिक संदेश
ऑपरेशन सिंदूर ने यह साफ कर दिया है कि राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा में नहीं, बल्कि अपने पर्यावरण और जैव विविधता को बचाने में भी निहित है। जिस दिन एक चूजा सुरक्षित पहुंचा, उस दिन न केवल एक पक्षी की जान बची, बल्कि भारत ने अपनी संवेदनशीलता और वैज्ञानिक दिशा में भी एक मजबूत कदम रखा।
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सोन चिरैया की संख्या में गिरावट के पीछे के कारण
- हाई-वोल्टेज पावर लाइनों से टकराव के कारण आकस्मिक मौतें
- घटता प्राकृतिक आवास (खासतौर पर घास के मैदान)
- मानवजनित हस्तक्षेप और विकास कार्य
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