सैलरी इंक्रीमेंट के बाद भी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का वेतन 31% कम, PLFS सर्वे 2025 में हुआ खुलासा
Kaushiki | Apr 01, 2026, 13:37 IST
plfs-survey-2025
PLFS 2025 सर्वे के मुताबिक बेरोजगारी घटकर 3.1% रह गई है। महिलाओं का इंक्रीमेंट बढ़ा है, लेकिन उनकी सैलरी अब भी पुरुषों के मुकाबले 31% कम है। 61.3 करोड़ लोग कार्यरत हैं।
PLFS Survey 2025: भारत की इकोनॉमी को लेकर एक बहुत ही पॉजिटिव खबर सामने आई है। हाल ही में जारी पीएलएफएस सर्वे-2025 (PLFS Survey) के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि देश में बेरोजगारी का दौर अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अब करीब 61.3 करोड़ लोग काम कर रहे हैं।
ये हमारी आर्थिक मजबूती का बड़ा संकेत है। दिलचस्प बात ये है कि इस बार महिलाओं के इंक्रीमेंट की रफ्तार पुरुषों से भी तेज रही है। हालांकि, सैलरी के मामले में अभी भी एक बड़ा अंतर बना हुआ है।
फिलहाल देश में करीब 61.3 करोड़ लोगों के पास अपना काम है। इसका मतलब है कि हमारी इकोनॉमी अब क्राइसिस मोड से बाहर आ रही है। आइए, इस सर्वे की हर छोटी-बड़ी बात को विस्तार से समझते हैं।
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इस साल सैलरी के मामले में एक दिलचस्प बदलाव देखा गया है। महिलाओं के वेतन में पुरुषों के मुकाबले ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज हुई है। नियमित नौकरी करने वाले पुरुषों का वेतन 5.90% की दर से बढ़ा है। वहीं, महिलाओं के वेतन में 7.16% की शानदार ग्रोथ देखी गई है। यह आंकड़े बताते हैं कि महिलाएं अब वर्कफोर्स में मजबूत हो रही हैं।
इंक्रीमेंट ज्यादा होने के बावजूद, कुल कमाई में अभी भी बड़ा अंतर है। सर्वे कहता है कि महिलाओं का वेतन पुरुषों से 31% कम है। रुपयों में देखें तो यह अंतर लगभग 59 सौ रुपए प्रति माह का है।
महिलाएं या तो कम वेतन वाले क्षेत्रों में काम कर रही हैं। या फिर उन्हें समान काम के लिए कम पैसे मिल रहे हैं। यह स्थिति समान अवसर के दावों पर सवाल उठाती है।
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अच्छी बात यह है कि बेरोजगारी (Indian Economy) दर 3.3% से गिरकर 3.1% हो गई है। शिक्षित लोगों के बीच भी बेरोजगारी 0.5% तक कम हुई है।
अब युवाओं की बेरोजगारी दर भी सिंगल डिजिट में आ चुकी है। यानी पिछले एक साल में रोजगार के हालात काफी सुधरे हैं। शहरों में रहने वाली महिलाओं की बेरोजगारी दर भी अब 6.4% है।
सर्वे में एक बहुत ही चिंताजनक बात भी सामने आई है। देश की 67.8% आबादी कम से कम माध्यमिक स्तर तक शिक्षित है। लेकिन सिर्फ 4.2% लोगों के पास ही तकनीकी या प्रोफेशनल ट्रेनिंग है। इसे ही हम स्किल गैप कहते हैं। डिग्री होने के बाद भी हुनर की कमी एक बड़ी समस्या है।
सर्वे के मुताबिक, 15-29 साल के 25% युवा कुछ नहीं कर रहे। वे न तो पढ़ाई कर रहे हैं और न ही जॉब। यह ग्रुप न ही किसी तरह की ट्रेनिंग का हिस्सा है। 61.3 करोड़ कामकाजी आबादी होने के बाद भी यह बड़ी चुनौती है। शिक्षा और बाजार की जरूरत के बीच तालमेल बिठाना जरूरी है।
PLFS का फुल फॉर्म Periodic Labour Force Survey है। इसे भारत सरकार का राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) कंडक्ट करता है। आसान भाषा में कहें तो, यह एक ऐसा सरकारी सर्वे है जो देश में रोजगार और बेरोजगारी के ताजा हालातों का पता लगाता है।
यह सर्वे इसलिए किया जाता है ताकि सरकार को पता चल सके कि कितने लोगों के पास काम है और कितने युवा नौकरी की तलाश में हैं। इससे ग्रामीण और शहरी इलाकों में लेबर मार्केट के उतार-चढ़ाव को समझने में मदद मिलती है।
इसी डेटा के आधार पर सरकार नई नीतियां और रोजगार योजनाएं बनाती है। यह सर्वे साल में कई बार (तिमाही और वार्षिक) डेटा इकट्ठा करता है ताकि देश की इकोनॉमी की सही तस्वीर सामने आ सके।
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ये हमारी आर्थिक मजबूती का बड़ा संकेत है। दिलचस्प बात ये है कि इस बार महिलाओं के इंक्रीमेंट की रफ्तार पुरुषों से भी तेज रही है। हालांकि, सैलरी के मामले में अभी भी एक बड़ा अंतर बना हुआ है।
फिलहाल देश में करीब 61.3 करोड़ लोगों के पास अपना काम है। इसका मतलब है कि हमारी इकोनॉमी अब क्राइसिस मोड से बाहर आ रही है। आइए, इस सर्वे की हर छोटी-बड़ी बात को विस्तार से समझते हैं।
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सैलरी और इंक्रीमेंट का गणित
सैलरी गैप की कड़वी सच्चाई
महिलाएं या तो कम वेतन वाले क्षेत्रों में काम कर रही हैं। या फिर उन्हें समान काम के लिए कम पैसे मिल रहे हैं। यह स्थिति समान अवसर के दावों पर सवाल उठाती है।
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बेरोजगारी दर में आई गिरावट
अब युवाओं की बेरोजगारी दर भी सिंगल डिजिट में आ चुकी है। यानी पिछले एक साल में रोजगार के हालात काफी सुधरे हैं। शहरों में रहने वाली महिलाओं की बेरोजगारी दर भी अब 6.4% है।
स्किल गैप की बड़ी चिंता
युवाओं के सामने खड़ी चुनौतियां
क्या होता है PLFS
यह सर्वे इसलिए किया जाता है ताकि सरकार को पता चल सके कि कितने लोगों के पास काम है और कितने युवा नौकरी की तलाश में हैं। इससे ग्रामीण और शहरी इलाकों में लेबर मार्केट के उतार-चढ़ाव को समझने में मदद मिलती है।
इसी डेटा के आधार पर सरकार नई नीतियां और रोजगार योजनाएं बनाती है। यह सर्वे साल में कई बार (तिमाही और वार्षिक) डेटा इकट्ठा करता है ताकि देश की इकोनॉमी की सही तस्वीर सामने आ सके।
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