स्मार्टफोन बताएगा फेफड़ों का हाल, जानकारी देने वाले ऐप को एम्स ने दी मंजूरी

एआई आधारित श्वासा ऐप फेफड़ों की गंभीर बीमारियों जैसे अस्थमा और सीओपीडी की स्क्रीनिंग करेगा। एम्स के परीक्षण में इसे स्पाइरोमेट्री के विकल्प के रूप में सफल पाया गया है।

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Anjali Dwivedi
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News In Short

  • कर्नाटक के स्टार्टअप ने फेफड़ों की जांच के लिए श्वासा नाम का एआई-आधारित मोबाइल ऐप विकसित किया है।

  • पिछले साल एम्स दिल्ली द्वारा 460 लोगों पर किए गए परीक्षण में यह ऐप 90% तक सटीक पाया गया है।

  • मरीज को बस फोन के माइक्रोफोन के पास खांसना होता है और 8 मिनट में रिपोर्ट मिल जाती है।

  • यह ऐप अस्थमा और सीओपीडी जैसी गंभीर बीमारियों की शुरुआती स्क्रीनिंग में मददगार है।

  • ऐप का इस्तेमाल कर्नाटक में शुरू हो गया है और अब टीबी की पहचान के लिए भी इस पर शोध जारी है।

News In Detail

तकनीक की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब इंसानी जान बचाने के काम आ रही है। कर्नाटक के एक स्टार्टअप ने एक ऐसा जादुई मोबाइल ऐप श्वासा (Shwaasa) तैयार किया है, जो फेफड़ों की बीमारी को पहचानने के तरीके को पूरी तरह बदल देगा। अच्छी खबर यह है कि देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान एम्स (AIIMS) ने भी इस ऐप की सटीकता को अपनी मान्यता दे दी है।

एआई ऐसे करेगा कमाल

इस ऐप की सबसे बड़ी खूबी इसका बेहद सरल इस्तेमाल है। इसके लिए किसी भारी मशीन या जटिल टेस्ट की जरूरत नहीं है। मरीज को बस अपने स्मार्टफोन के सामने खांसना होता है। फोन का माइक्रोफोन खांसी की आवाज को रिकॉर्ड करता है और ऐप का खास एआई एल्गोरिदम उसका एनालिसिस शुरू कर देता है। महज आठ मिनट के भीतर यह ऐप बता देता है कि आपके फेफड़े स्वस्थ हैं या फिर आपको अस्थमा या सीओपीडी जैसी बीमारी के संकेत हैं।

एम्स के टेस्ट में 90% तक सटीक नतीजे

एम्स-दिल्ली ने पिछले साल अपने बल्लभगढ़ केंद्र में 460 लोगों पर इस ऐप का कड़ा परीक्षण किया। जब इसके नतीजों की तुलना फेफड़ों की जांच के मानक टेस्ट स्पाइरोमेट्री (Spirometry) से की गई, तो नतीजे हैरान करने वाले थे। गंभीर मामलों में यह ऐप बहुत सटीक रहा। सामान्य और असामान्य मामलों के बीच अंतर करने में इसकी सटीकता 90 प्रतिशत पाई गई। वहीं, अस्थमा और सीओपीडी की पहचान करने में यह 82 से 87 प्रतिशत तक सही साबित हुआ।

ग्रामीण इलाकों के लिए संजीवनी बनेगा श्वासा

भारत में सीओपीडी (Chronic Obstructive Pulmonary Disease) बीमारियों का एक प्रमुख कारण है। एम्स के डॉक्टर हर्षल रमेश साल्वे के अनुसार, देश के कई जिला अस्पतालों और प्राथमिक केंद्रों में फेफड़ों की जांच के लिए जरूरी स्पाइरोमेट्री मशीनें उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में 'श्वासा' ऐप एक बड़ी कमी को दूर कर सकता है। इसे चलाने के लिए किसी खास प्रशिक्षण की जरूरत नहीं है, इसलिए इसे आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (Ayushman Arogya Mandir) और छोटे स्वास्थ्य केंद्रों में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।

टीबी की पहचान के लिए भी चल रही है रिसर्च

श्वासा ऐप की उपयोगिता सिर्फ खांसी और अस्थमा तक सीमित नहीं रहने वाली है। एम्स वर्तमान में एक रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत यह जांच कर रहा है कि क्या यह ऐप टीबी (Tuberculosis) की स्क्रीनिंग में भी मदद कर सकता है। फिलहाल इसका इस्तेमाल कर्नाटक और कुछ अन्य राज्यों में शुरू हो चुका है, और जल्द ही इसे फरीदाबाद के निजी डॉक्टरों के साथ मिलकर बड़े स्तर पर आजमाने की योजना है।

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