भारत 1991 जैसे संकट में: सब्सिडी सुधार क्यों जरूरी है, समझें पूरा मामला
Chakresh | May 26, 2026, 13:47 IST
Subsidi-reform-2026
भारत 1991 जैसे आर्थिक संकट की कगार पर है। खाद और खाद्यान्न सब्सिडी 4.5 लाख करोड़ रुपए से ऊपर जा सकती है। thesootr Prime में समझें सब्सिडी सुधार की इस कड़वी हकीकत को…
समझें क्या है पूरा मामला
- भारत का रुपया कमजोर हो रहा है और राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है।
- मध्य पूर्व के संकट से तेल और खाद की कीमतें दोगुनी हो गई हैं।
- यूरिया सब्सिडी इतनी बड़ी है कि खाद तस्करी होकर नेपाल और बांग्लादेश पहुंच रही है।
- खाद और खाद्यान्न सब्सिडी मिलाकर 4.50 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का बोझ है।
- अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि बिना बड़े सब्सिडी सुधार के 1991 जैसा संकट टाला नहीं जा सकता।
इसकी भरपाई होती है महंगाई से, टैक्स से और रुपए की कमजोरी से। और इसका हल है- सब्सिडी सुधार…जो सब्सिडी किसानों को जाती दिखती है, उसका बड़ा हिस्सा असल में आप जैसे आम नागरिकों की कमाई को चुपके से खा जाता है। दरअसल…
यूरिया की कीमत का खेल
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बिहार का उदाहरण समझिए
फिर बाकी खाद कहां जाती है? सीमावर्ती जिलों से नेपाल की तरफ। इस सस्ती खाद की तस्करी को मुमकिन बनाती है वो भारी सब्सिडी, जो यूरिया की असली कीमत का 90 फीसदी तक कवर करती है।
यह सिर्फ बिहार की समस्या नहीं है। यह उस पूरे सिस्टम की खामी है जो किसी भी चीज को इतना सस्ता कर दे कि लोग उसे बर्बाद करें या तस्करी करने लगें।
सिस्टम का ब्लैक होलदरअसल भारत में यूरिया इतनी सस्ती है कि किसान से ज्यादा उद्योग इस्तेमाल करते हैं। और जो बचती है, वो नेपाल और बांग्लादेश पहुंच जाती है। सरकार एक किलो यूरिया पर करीब 800 रुपए से ज्यादा की सब्सिडी देती है।किसान को मिलती है 70 रुपए प्रति किलो में। बाजार में वही यूरिया 935 रुपए प्रति किलो से ऊपर है। यह अंतर इतना बड़ा है कि यह सिस्टम नहीं, एक ब्लैक होल है, जो सब्सिडी सुधार के बिना भरा ही नहीं जा सकता… |
80 करोड़ को मुफ्त अनाज, गरीबी 11 फीसदी
World Bank के पैमाने पर तो यह आंकड़ा 5.3 फीसदी तक आ गया है। अगर गरीबी इतनी कम है, तो 57 फीसदी आबादी को मुफ्त अनाज क्यों? इस सवाल का जवाब अर्थशास्त्र में नहीं, राजनीति में मिलता है।
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तो क्या 1991 वाला मौका फिर आया है!
अब फिर वैसी ही राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए। पीएम नरेंद्र मोदी ने खुद मंत्रिमंडल से सुधारों की मांग की है, लेकिन असली सुधार कागजों पर नहीं, सब्सिडी की फाइलों में होना चाहिए।
समझें 1991 से पहले क्या था
अब 2026 में एक बार फिर वैसी ही स्थिति बन रही है। रुपया कमजोर है। मध्य पूर्व में तनाव से तेल और खाद दोनों महंगे हो गए हैं। विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं।
असली ब्रह्मास्त्र क्या है?
इस तरह का DBT (Direct Benefit Transfer) लागू होने के बाद खाद की कीमत बाजार तय करे। इससे तस्करी रुकेगी, नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटेशियम का असंतुलन ठीक होगा और सरकार को सालाना 40 हजार से 50 हजार करोड़ की बचत होगी। यह राशि देश के हर किसान परिवार को सीधे दी जा सकती है या स्कूल और अस्पताल में लगाई जा सकती है।
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अगर नहीं हुआ तो?
- अगर होर्मुज जलसंधि तीन महीने और बंद रही तो GDP विकास दर 6 फीसदी से नीचे जाएगी।
- CPI महंगाई 6 फीसदी से ऊपर जाएगी। RBI को repo rate बढ़ाना होगा।
- इसका सीधा मतलब है: आपके होम लोन और कार लोन की EMI बढ़ेगी। बाजार में ब्याज दरें चढ़ेंगी। रोजगार और निवेश दोनों धीमे होंगे।
- रुपया अगर 100 रुपए प्रति डॉलर तक पहुंचा, तो हर आयातित चीज महंगी होगी। पेट्रोल, खाद, दवाइयां सब।
सुधार: राजनीति सबसे बड़ी दीवार
यही सोच सुधारों को रोकती है। लेकिन जब आर्थिक संकटइतना बड़ा हो कि रुपया 100 की तरफ बढ़े, महंगाई 6 फीसदी से ऊपर जाए, और विदेशी निवेशक भाग रहे हों, तब शायद राजनीतिक हिसाब भी बदले।
गुलाटी और जुनेजा जैसे अर्थशास्त्री कहते हैं कि Direct Benefit Transfer (DBT) यानी सीधे किसान के खाते में सब्सिडी भेजने से लीकेज रुकेगी। इससे सालाना 40 हजार रुपए से 50 हजार करोड़ की बचत हो सकती है। PM-Kisan जैसी योजना से जोड़ने पर यह संभव भी है।
अब आप क्या करें
- अपने नेता से पूछें कि आपके जिले में खाद सब्सिडी का पैसा किसानों तक पहुंचा या नहीं।
- यह अभी जरूरी है क्योंकि बजट सत्र और सुधारों की खिड़की अभी खुली है। देर हुई तो महंगाई और बढ़ेगी।
- आगे देखें: RBI की अगली मौद्रिक नीति समीक्षा और मानसून 2026 का हाल क्या रहता है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
महंगाई और रुपए की कमजोरी सबसे पहले गरीब और मध्यम वर्ग को तोड़ती है। सब्सिडी सुधार सिर्फ आर्थिक नहीं, सामाजिक न्याय का सवाल भी है।
Refrence:
- Indian Express
- Ministry of Finance Discussion Paper 1993
- PIB (Press Information Bureau) - NBS Scheme 2010 व Fertilizer DBT
- Green Gubre Group - Fertilizer Subsidy Reforms 2025
- PMFias.com Subsidies in India
FAQ
- यूरिया सब्सिडी इतनी बड़ी क्यों है?
भारत में यूरिया की कीमत सरकार तय करती है, जो अंतरराष्ट्रीय कीमत से बहुत कम है। सरकार बीच का पूरा फर्क खुद भरती है। इससे यूरिया इतनी सस्ती हो जाती है कि खेती से बाहर भी इसका गलत इस्तेमाल होता है और पड़ोसी देशों में तस्करी होती है। - DBT से सब्सिडी सुधार कैसे होगा?
DBT यानी Direct Benefit Transfer में सरकार किसान के खाते में सीधे पैसे भेजती है। किसान खुद बाजार से खाद खरीदता है। इससे बिचौलिए और तस्करी का रास्ता बंद होता है। PM-Kisan से जोड़ने पर यह लागू करना संभव है। - 1991 जैसा संकट क्या मतलब है?
1991 में भारत के पास विदेशी मुद्रा खत्म हो रही थी। सरकार को सोना गिरवी रखना पड़ा था। तब बड़े आर्थिक सुधार हुए जिन्होंने अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। 2026 में फिर वैसी ही स्थिति बन रही है, जहां बड़े फैसलों की जरूरत है।
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