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Latest Religious News:सनातन धर्म में एकादशी और प्रदोष के व्रत को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है। एकादशी जहां भगवान विष्णु को समर्पित है। वहीं प्रदोष व्रत महादेव की कृपा पाने का माध्यम है।
हजारों साल पहले हमारे ऋषियों ने ब्रह्मांड के रहस्यों को शरीर के विज्ञान से जोड़ दिया था। सनातन धर्म में एकादशी और प्रदोष व्रत को केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि बायोलॉजिकल हीलिंग का जरिया माना गया है। आज का मॉडर्न साइंस भी इस ऑटोफैगी प्रोसेस की तारीफ कर रहे हैं जिसे हमारे पूर्वजों ने उपवास का नाम दिया था।
ये कहानी है चंद्रमा की बदलती चाल और हमारे शरीर के भीतर होने वाली अद्भुत सफाई की। जब आसमान में चांद अपनी शक्ति बढ़ाता है तब व्रत के जरिए हम अपने डाइजेशन सिस्टम और किडनी को नई जिंदगी देते हैं। आइए जानें इस प्राचीन उपवास के पीछे छिपे वैज्ञानिक तर्क के बारे में।
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चंद्रमा और मानव शरीर का अटूट संबंध
एकादशी की तिथि पूर्णिमा और अमावस्या से ठीक चार दिन पहले आती है। इस दौरान वायुमंडल का दबाव और चंद्रमा का आकर्षण बहुत शक्तिशाली हो जाता है।
हमारा शरीर 70 प्रतिशत जल से बना है। इसलिए चंद्रमा हमें प्रभावित करता है। सनातन धर्म में ऐसा माना जाता है कि यदि एकादशी पर पेट भरा हो तो शरीर के अंदर असंतुलन पैदा हो सकता है।
इससे एकाग्रता की कमी महसूस होती है। मन में बेचैनी बढ़ने लगती है। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए इस दिन अन्न त्याग का नियम बना।
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एकादशी पर चावल न खाने का साइंटिफिक रीजन
अक्सर लोग पूछते हैं कि एकादशी पर चावल खाना क्यों वर्जित माना जाता है? साइंस कहता है कि चावल में वाटर एलिमेंट को सोखने की शक्ति सबसे ज्यादा होती है। चूंकि इस दिन चंद्रमा का जल पर प्रभाव बढ़ जाता है इसलिए चावल नुकसानदायक हो सकता है।
चावल खाने से शरीर में पानी की मात्रा बढ़कर नकारात्मक असर डाल सकती है। इससे पेट में भारीपन महसूस होता है। मस्तिष्क में सुस्ती आने लगती है। पूर्वजों ने हमें अनुशासन में रखने के लिए इसे धर्म से जोड़ दिया था।
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प्रदोष और निर्जला व्रत
एकादशी तिथि (Ekadashi Tithi) के बाद आने वाला प्रदोष व्रत शरीर को पूरी तरह डिटॉक्स कर देता है। साइंस मानता है कि निर्जला व्रत रखने से हमारी किडनी और डाइजेशन सिस्टम को पूरा आराम मिलता है।
ये इंटरमिटेंट फास्टिंग का सबसे प्राचीन, शुद्ध और थोड़ा कठोर रूप माना गया है। इससे न केवल हमारी इच्छाशक्ति बढ़ती है, बल्कि शरीर न्यू एनर्जी से भर जाता है।
ये भक्ति के माध्यम से मिलने वाली एक तरह की बायोलॉजिकल हीलिंग ही है। उपवास रखने से मन शांत होता है और आध्यात्मिक विकास की गति बढ़ती है।
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नोबेल पुरस्कार और ऑटोफैगी का बड़ा खुलासा
साल 2016 में जापानी साइंटिस्ट योशिनोरी ओशुमी ने दुनिया को एक बड़ा सच बताया। उन्होंने सिद्ध किया कि उपवास करने से शरीर में ऑटोफैगी की प्रक्रिया शुरू होती है। जब हम 12 से 24 घंटे कुछ नहीं खाते तो सेल्स खुद को साफ करती हैं।
शरीर के अंदर का कचरा और खराब सेल्स खुद डिस्ट्रॉय होकर एनर्जी बन जाती हैं। सनातन धर्म का निर्जला व्रत इस सफाई की प्रक्रिया को और तेज कर देता है। ये कैंसर जैसी बीमारियों से बचाने और बुढ़ापे को रोकने का प्राकृतिक तरीका है।
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