CBSE Three-Language Policy: सीबीएसई के नए नियम से बच्चों पर बढ़ा दबाव, पैरेंट्स नाराज
Manya Jain | May 23, 2026, 19:22 IST
CBSE Three-Language Policy
सीबीएसई बोर्ड ने सत्र 2026-27 से कक्षा 9वीं के लिए तीन-भाषा नीति लागू कर दी है। इसमें दो भारतीय भाषाएं चुनना अनिवार्य है। इस फैसले से विदेशी भाषा पढ़ रहे छात्रों और उनके अभिभावकों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- सीबीएसई ने नौवीं क्लास से तीन भाषाएं पढ़ना पूरी तरह अनिवार्य कर दिया है।
- नए नियम के तहत इनमें से दो भारतीय भाषाएं होना बहुत जरूरी है।
- इस फैसले से विदेशी भाषा सीख रहे छात्रों को बड़ा झटका लगा है।
- अभिभावकों ने इस नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
- स्कूलों के सामने अब नए शिक्षक ढूंढने और टाइम-टेबल बदलने की चुनौती है।
CBSE के नए नियम से छात्र और पेरेंट्स परेशान
एक छात्र पिछले तीन साल से लगातार जर्मन भाषा सीख रहा था। उसका सपना जर्मनी जाकर ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने का था। लेकिन अब नए नियम के कारण उसे अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। ऐसे कई मामले अब सामने आ रहे हैं।
क्या है CBSE की नई तीन-भाषा नीति का पूरा गणित?
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राहत की बात बस यह है कि दसवीं में तीसरी भाषा का बोर्ड एग्जाम नहीं होगा। अगर कोई बच्चा फ्रेंच या जर्मन पढ़ना चाहता है तो क्या होगा? वह इसे चौथी अतिरिक्त भाषा के तौर पर पढ़ सकता है। बशर्ते उसके स्कूल में इसकी पढ़ाई होती हो।
अचानक हुए बदलाव से नाराज हैं अभिभावक?
अभिभावक रूपा ने बताया कि उनके बेटे को अब फ्रेंच भाषा छोड़नी पड़ सकती है। नौवीं क्लास में बच्चों पर मुख्य विषयों का पहले से ही बहुत दबाव होता है। ऐसे में बिल्कुल शुरू से संस्कृत जैसी नई भाषा सीखना बच्चों के लिए बहुत मुश्किल काम है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद
इस नीति के क्रियान्वयन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर हुई है। कई अन्य अभिभावक भी कानूनी रास्ता अपनाने का मन बना रहे हैं। स्कूलों में कक्षाएं शुरू होने के बाद यह आदेश आने से नाराजगी और बढ़ गई है।
यूनिट टेस्ट आने से बढ़ा बच्चों में भ्रम
अब बीच सत्र में अचानक नियम बदलने से बच्चे बेहद तनाव में आ गए हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी पुरानी पढ़ाई जारी रखें या नई भाषा सीखें। इस असमंजस से बच्चों की मुख्य विषयों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है।
स्कूलों के सामने खड़ी हुई दिक्कतें
इसके अलावा स्कूलों के पास योग्य भाषा शिक्षकों की भी भारी कमी है। कई प्रिंसिपलों ने माना कि उनके पास सभी क्षेत्रीय भाषाओं के टीचर नहीं हैं। ऐसे में मजबूरी में उन्हें संस्कृत को ही विकल्प के रूप में चुनना पड़ेगा।
प्रतियोगी परीक्षाओं पर पड़ सकता है असर
आगे चलकर बच्चों को कई तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बैठना होता है। भाषा के इस नए बोझ से बच्चों की रैंकिंग पर असर पड़ सकता है। एमएम पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल रूमा पाठक ने भी माना कि इसके लिए बेहतर तालमेल की जरूरत थी।
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