भोपाल के 40 स्कूलों में RTE कोटे में शून्य एडमिशन, 20 अप्रैल से दूसरा दौर
Manya Jain | Apr 17, 2026, 16:29 IST
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भोपाल के 40 नामी स्कूलों में आरटीई कोटे के तहत एक भी एडमिशन नहीं हुआ। मध्यप्रदेश में 1200 प्राइवेट स्कूल 25% आरक्षण की शर्त पूरी नहीं कर पाए। पहला फेज 15 अप्रैल को खत्म हुआ। दूसरा फेज 20 अप्रैल के बाद शुरू होगा।
MP Education News.भोपाल के 40 बड़े स्कूलों में आरटीई (RTE) कोटे में एक भी बच्चे का एडमिशन नहीं हुआ। मध्यप्रदेश में 1200 से ज्यादा प्राइवेट स्कूल 25% सीट भरने की शर्त से पीछे रह गए। पहले फेज में राज्यभर में 1 लाख 6 हजार से ज्यादा बच्चों को सीट मिली थी। लेकिन जिन बच्चों के नाम निकले, वे डॉक्यूमेंट वैरिफिकेशन के लिए नहीं आए। अब 20 अप्रैल के बाद दूसरा फेज शुरू होगा, जिसमें खाली सीटें भरने की कोशिश होगी।
भोपाल के नामी स्कूलों के क्लासरूम में गरीब बच्चों की कुर्सियां खाली रह गई हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम यानी आरटीई (RTE - Right to Education) एक्ट 2009 के तहत हर प्राइवेट स्कूल को 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए रखनी होती हैं। यह कानून 1 अप्रैल 2010 से लागू है। इसके तहत सरकार फीस का पैसा सीधे ऑनलाइन ट्रांसफर के जरिए स्कूलों को देती है।
भोपाल में 40 बड़े स्कूल ऐसे निकले, जहां सीबीएसई और एमपी बोर्ड दोनों से मान्यता प्राप्त है। इन सभी में आरटीई कोटे में एक भी एडमिशन नहीं हुआ। राज्य शिक्षा केंद्र ने ऐसे स्कूलों की लिस्ट सार्वजनिक कर दी है।
सिर्फ भोपाल ही नहीं, पूरे मध्यप्रदेश में 1200 से ज्यादा प्राइवेट स्कूल 25% सीटें भरने की अनिवार्य शर्त से पीछे रहे। पहले फेज में राज्यभर से 1 लाख 78 हजार 714 बच्चों का वेरिफिकेशन हुआ था। लॉटरी के जरिए इनमें से 1 लाख 6 हजार 51 बच्चों को सीटें अलॉट की गई थीं। इनमें 54 हजार 746 लड़के और 51 हजार 305 लड़कियां शामिल थीं।
हर अभिभावक को एसएमएस अलर्ट भेजे गए थे। उन्हें कहा गया था कि वे स्कूल जाकर एडमिशन की औपचारिकता पूरी करें। लेकिन बड़ी संख्या में अभिभावक आए ही नहीं।
स्कूल प्रबंधन का कहना है कि उन्होंने कोई एडमिशन नहीं रोका। उनके मुताबिक जिन बच्चों का नाम लॉटरी में आया, उनके परिवार ही नहीं आए। इसे वे "नो-शो" यानी गैरहाजिरी का मामला बता रहे हैं।
दूसरी तरफ शिक्षा विभाग के अधिकारियों का रुख सख्त है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ कहा, "जो स्कूल एडमिशन में देरी या मना करेंगे, उन पर सख्त कार्रवाई होगी।" उन्होंने अभिभावकों से कहा कि शिकायत के लिए जिला परियोजना समन्वयक यानी डीपीसी (DPC - District Project Coordinator) के दफ्तर में तुरंत संपर्क करें।
15 अप्रैल को पहला फेज बंद हो गया। अब 20 अप्रैल के बाद दूसरा फेज शुरू होगा। इसमें वे सीटें फिर से ऑफर होंगी जो पहले फेज में खाली रह गई हैं। पहले वाले आवेदक दोबारा ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर स्कूलवार सीटें देख सकते हैं। वे अपनी पसंद भी अपडेट कर सकते हैं।
यह दूसरा मौका उन बच्चों के लिए अहम है, जो पहले फेज में सीट नहीं पा सके। इसका मकसद है कि कोई भी पात्र बच्चा पीछे न छूटे।
मध्यप्रदेश में ग्रामीण इलाकों में आरटीई की पहुंच पहले से बेहतर हुई है। लेकिन शहरों में, खासकर भोपाल के बड़े नामी स्कूलों में, यह कानून कागजों पर ही सिमटा नजर आता है। जो स्कूल ऊंची फीस और प्रतिस्पर्धा के लिए जाने जाते हैं, वही इस कानून को लेकर सबसे ज्यादा उदासीन हैं।
शिक्षा कार्यकर्ता लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि अभिभावकों के लिए हेल्पलाइन चलाई जाए। साथ ही फीस की प्रतिपूर्ति भी जल्दी होनी चाहिए, ताकि स्कूलों पर बोझ न पड़े और वे कानून का पालन करने से न कतराएं।
राज्य सरकार अब इस मुद्दे पर नजर रख रही है। देखना यह है कि दूसरे फेज में कितनी सीटें भर पाती हैं और क्या भोपाल के शीर्ष स्कूल इस बार अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।
आरटीई एक्ट 2009 (RTE Act) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का मूल अधिकार देता है। भोपाल के 40 स्कूलों में शून्य एडमिशन यह बताता है कि कानूनी अधिकार और जमीनी हकीकत के बीच अभी भी बड़ी खाई है। यह खबर इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह सामाजिक न्याय का सीधा सवाल है।
गरीब और वंचित तबके के बच्चों को वही शिक्षा मिलनी चाहिए, जो संपन्न परिवारों के बच्चों को मिलती है। जब सरकारी तंत्र, डिजिटल पोर्टल और एसएमएस अलर्ट सब कुछ होने के बाद भी सीटें खाली रहती हैं, तो यह जागरूकता, पहुंच और जवाबदेही तीनों पर सवाल खड़ा करता है।
पारदर्शिता और सख्त निगरानी के बिना यह कानून केवल कागज पर रहेगा। डिजिटल और सामाजिक जवाबदेही के नजरिए से यह खबर हर नागरिक के लिए प्रासंगिक है।
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शिक्षा का अधिकार और खाली कुर्सियां
लेकिन इस बार पहले फेज का नतीजा निराशाजनक रहा।
1200 स्कूल पीछे रहे
हर अभिभावक को एसएमएस अलर्ट भेजे गए थे। उन्हें कहा गया था कि वे स्कूल जाकर एडमिशन की औपचारिकता पूरी करें। लेकिन बड़ी संख्या में अभिभावक आए ही नहीं।
स्कूल और सरकार क्या कह रहे हैं
दूसरी तरफ शिक्षा विभाग के अधिकारियों का रुख सख्त है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ कहा, "जो स्कूल एडमिशन में देरी या मना करेंगे, उन पर सख्त कार्रवाई होगी।" उन्होंने अभिभावकों से कहा कि शिकायत के लिए जिला परियोजना समन्वयक यानी डीपीसी (DPC - District Project Coordinator) के दफ्तर में तुरंत संपर्क करें।
20 अप्रैल के बाद दूसरा मौका
यह दूसरा मौका उन बच्चों के लिए अहम है, जो पहले फेज में सीट नहीं पा सके। इसका मकसद है कि कोई भी पात्र बच्चा पीछे न छूटे।
शहरी स्कूलों की जवाबदेही पर सवाल
शिक्षा कार्यकर्ता लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि अभिभावकों के लिए हेल्पलाइन चलाई जाए। साथ ही फीस की प्रतिपूर्ति भी जल्दी होनी चाहिए, ताकि स्कूलों पर बोझ न पड़े और वे कानून का पालन करने से न कतराएं।
राज्य सरकार अब इस मुद्दे पर नजर रख रही है। देखना यह है कि दूसरे फेज में कितनी सीटें भर पाती हैं और क्या भोपाल के शीर्ष स्कूल इस बार अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।
यह खबर क्यों जरूरी है
गरीब और वंचित तबके के बच्चों को वही शिक्षा मिलनी चाहिए, जो संपन्न परिवारों के बच्चों को मिलती है। जब सरकारी तंत्र, डिजिटल पोर्टल और एसएमएस अलर्ट सब कुछ होने के बाद भी सीटें खाली रहती हैं, तो यह जागरूकता, पहुंच और जवाबदेही तीनों पर सवाल खड़ा करता है।
पारदर्शिता और सख्त निगरानी के बिना यह कानून केवल कागज पर रहेगा। डिजिटल और सामाजिक जवाबदेही के नजरिए से यह खबर हर नागरिक के लिए प्रासंगिक है।
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