News Strike: सीएम मोहन यादव का अहम फैसला, क्या घटेगा कैलाश विजयवर्गीय का कद?

सीएम मोहन यादव ने विधानसभा में मुख्य सचेतक की नियुक्ति की योजना बनाई। इससे कैलाश विजयवर्गीय के कद पर असर पड़ सकता है। पुराने साइडलाइन विधायक की किस्मत बदल सकती है।

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Harish Divekar
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News in Short

  • मध्यप्रदेश सरकार विधानसभा में मुख्य सचेतक (Chief Whip) नियुक्त करने की योजना बना रही है।
  • विजयवर्गीय की हालिया गतिविधियों से सरकार कैलाश विजयवर्गीय के कद को घटा सकती हैं।
  • मुख्य सचेतक को विधानसभा में अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी मिलती है।
  • मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी किसी अनुभवी, पुराने और साइडलाइन विधायक को मिल सकती है। 
  • विजयवर्गीय और सीएम मोहन यादव के बीच तनाव और मनमुटाव को लेकर अटकलें बनी हुई हैं।

News in Detail

NEWS STRIKE (न्यूज स्ट्राइक) : मध्यप्रदेश की मोहन यादव सरकार ऐसा फैसला लेने जा रही है जिसका सीधा असर कैलाश विजयवर्गीय के काम और उनकी जिम्मेदारियों पर पड़ेगा। ये ऐसा फैसला है जिसे सुनकर शायद आप भी यही सवाल करेंगे कि क्या प्रदेश में अब कैलाश विजयवर्गीय का कद घटाने की तैयारी है।

पिछले कुछ दिनों से विजयवर्गीय लगातार खबरों में बने हुए हैं। कभी सीएम मोहन यादव से सीधे मनमुटाव की खबरों के चलते तो कभी इंदौर के भागीरथपुरा कांड के चलते। अब नया फैसला फिर उनकी ही ओर इशारा कर रहा है। एक तरफ माना जा रहा है कि विजयवर्गीय का कद घट सकता है। दूसरी ओर किसी ऐसे नेता की किस्मत खुल सकती है जो अब तक कोई अहम जिम्मेदारी मिलने की बाट जोह रहे हैं।

कैलाश विजयवर्गीय का अधिकार क्षेत्र घटेगा!

मध्यप्रदेश सरकार बहुत जल्दी विधानसभा में मुख्य सचेतक की नियुक्ति का फैसला ले सकती है। ये ऐसा फैसला होगा जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले नेता कैलाश विजयवर्गीय ही होंगे।

कैलाश विजयवर्गीय के पास संसदीय कार्य मंत्री का जिम्मा है। जिसे वो बखूबी संभाल भी रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से जो खबरें लगातार आ रही हैं। वो उनकी दुश्मन बन गई हैं। कैबिनेट की बैठक हो या फिर इंदौर का भागीरथपुरा कांड। दोनों ही मामलों में कैलाश विजयवर्गीय के हाथ निगेटिव पब्लिसिटी के अलावा कुछ नहीं लगा है। उनके तेवर से सीएम मोहन यादव भी नाखुश ही बताए जाते हैं।

ऐसे में मुख्य सचेतक की नियुक्ति से उनका अधिकार क्षेत्र घटेगा। आम बोलचाल की भाषा में कहें तो वो सिर्फ नाम के संसदीय कार्य मंत्री रह जाएंगे। विधानसभा में असल काम मुख्य सचेतक का ही होगा। 

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विधानसभा में सचेतक बनाने का रिवाज पुराना

मुख्य सचेतक को राजनीति की भाषा में चीफ व्हीप भी बोला जाता है। न्यूज से जुड़े रहते हैं तो ये शब्द आपके लिए एकदम नया नहीं होगा। हां इसका मतलब आपको जरूर जान लेना चाहिए कि सचेतक या मुख्य सचेतक विधानसभा में क्या काम करता है।

सबसे पहले तो ये समझ लीजिए कि मुख्य सचेतक ऐसा कोई पद नहीं है जिसका एक्सप्लेनेशन आपको संविधान या राजनीति कि किसी किताब में मिल जाए। उसके बाद भी ये एक अहम पद होता है।

अक्सर जब विधानसभा में कोई अहम कार्यवाही होती है तब पार्टी अपने अपने व्हीप नियुक्त करती है। इसे हर सदन के दौरान स्थाई व्यवस्था भी बनाया जा सकता है। उत्तरप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों में विधानसभा में सचेतक बनाने का दस्तूर पुराना रहा है। मध्यप्रदेश के संदर्भ में ये नियुक्ति कभी सुनाई नहीं दी है।

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अभी सचेतक की भूमिका में हैं कैलाश विजयवर्गीय

सचेतक को हम पार्टी का फ्लोर मैनेजर भी कह सकते हैं। जो सदन के दौरान पार्टी के सदस्यों के बीच ही डिसिप्लीन बनाए रखता है। उन्हें समय-समय पर पार्टी लाइन की जानकारी देता है।

अब मान लीजिए कि सदन में विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाता है। उस वक्त सत्ताधारी दल के सारे विधायकों को एकजुट रखने का काम, कब किसे क्या बयान देना है। किस तरह वोट करना है। इन सबका जिम्मा सचेतक ही संभालते हैं। ये तो खैर गंभीर मसला है।

सदन की आम दिनों की कार्यवाही के दौरान भी विधायकों के बीच अनुशासन बनाए रखना। सचेतक का ही काम होता है। बतौर संसदीय कार्य मंत्री खुद कैलाश विजयवर्गीय ये जिम्मेदारी संभालते हैं। वो मीडिया और सरकार के बीच भी एक ब्रिज की तरह काम करते हैं।

कैबिनेट ब्रीफिंग की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती है, लेकिन सचेतक बनने के बाद उनका ये काम कम हो जाएगा। क्योंकि सदन में सचेतक ज्यादा अहम भूमिका में नजर आएगा।

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साइडलाइन विधायक की चमक सकती है किस्मत

ये सुनकर आपको ये अंदाजा भी हो ही गया होगा कि इस जिम्मेदारी को संभालना किसी नए नवेले या जूनियर विधायक के  बस की बात नहीं है। ये काम भी किसी ऐसे ही विधायक को सौंपा जाएगा जो कैलाश विजयवर्गीय की तरह कई चुनाव जीतने के बाद तजुर्बेकार विधायक या सीनियर विधायक की फेहरिस्त में शामिल हो चुका हो।

भूपेंद्र सिंह, गोपाल भार्गव और अजय विश्नोई जैसे नाम इस रेस में सबसे आगे बताए जा रहे हैं। जिस भी विधायक को सचेतक का पद मिलता है। उसे मंत्री दर्जा भी मिलेगा ही। यानी किसी पुराने साइडलाइन विधायक की किस्मत चमक सकती है और कैलाश विजयवर्गीय के रसूख पर उसका असर पड़ सकता है।

वैसे तो मोहन सरकार की तरफ से ऑफिशियल अनाउंसमेंट नहीं हुआ है। पर, अंदर की खबर ये है कि सचेतक नियुक्त करने का प्रस्ताव तकरीबन तय है। उसकी मंजूरी मिली तो प्रदेश विधानसभा में बीजेपी को सचेतक मिलने में देर नहीं लगेगी।

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मनमुटाव के चलते कैबिनेट बैठकों से बनाई दूरी

सरकार के इस फैसले की वजह क्या कैलाश विजयवर्गीय हैं। राजनीतिक कद की बात की जाए तो कैलाश विजयवर्गीय कई विधायकों यहां तक कि सीएम मोहन यादव से भी काफी ज्यादा सीनियर हैं। शायद इसलिए वो समय-समय पर सवाल उठाते रहते हैं। कुछ मौके ऐसे भी आए जब ये अटकलें लगने लगी थीं कि दोनों के बीच मनमुटाव इस कदर है कि कैलाश विजयवर्गीय कैबिनेट की बैठकों से भी दूर रहते हैं। 

अब विजयवर्गीय की राह होने जा रही है मुश्किल?

पिछले साल जनवरी में संघ नेता सुरेश सोनी ने कैलाश विजयवर्गीय और मोहन यादव के बीच की दूरियों को कम करने की कोशिश की थी। तब विजयवर्गीय की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि इंदौर जिले का प्रभार किसी और नेता को सौंप दिया गया है, लेकिन सोनी की कोशिशें शायद ज्यादा कारगर नहीं हुईं। क्योंकि उसके बाद भी विजयवर्गीय के तेवर कैबिनेट की बैठकों में तल्ख ही नजर आए।

कभी वो उज्जैन में कुंभ के लिए बन रही सड़कों के बजट पर सवाल उठाते दिखे तो कभी जीएसटी कलेक्शन को लेकर उन्होंने सवाल उठाए। कैबिनेट में उनके तेवर तीखे थे ही। इसके बाद वो भागीरथपुरा के दूषित पानी कांड में भी मीडिया के निशाने पर रहे। इस कांड की गूंज आलाकमान के दरबार तक में सुनाई दी।

जाहिर है उनका वायरल वीडियो भी उनकी निगाह में आया ही होगा। जिसमें वो पत्रकार के सवाल पर बेकाबू होते दिख रहे हैं। ये सब हालात मिलकर शायद अब विजयवर्गीय की राह मुश्किल करने जा रहे हैं। जिसकी शुरुआत सचेतक पद पर नियुक्ति से हो सकती है।

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