News Strike: कांग्रेस में खेमेबाजी होगी खत्म, नए चेहरों से मिलेगी नई चमक?

Harish Divekar | Jan 15, 2026, 07:00 IST
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Photograph: (THESOOTR)

मध्यप्रदेश कांग्रेस में बदलाव की आहट, नई पीढ़ी को मिलेंगी जिम्मेदारियां, दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की राजनीति का अंत, नए चेहरों से चमक आएगी पार्टी में।

News in Short

  • कांग्रेस में अब बदलाव, नए और युवा चेहरों को मिलेगी प्रमुख भूमिका।
  • दिग्विजय सिंह का सक्रिय राजनीति से रिटायरमेंट, पार्टी में नई पीढ़ी की आमद।
  • कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का राजनीतिक असर खत्म, बेटे संभालेंगे जिम्मेदारी।
  • कांग्रेस में गुटबाजी का दौर खत्म, युवा नेताओं को मिलेगा अवसर।
  • बीजेपी का हथियार मिस्टर बंटाधार अब निष्क्रिय, कांग्रेस को मिलेगा नया मौका।

News in Detail

News Strike | न्यूज स्ट्राइक :मध्यप्रदेश कांग्रेस अब अलग चेहरे और अलग तेवरों के साथ नजर आने के लिए तैयार है। अब बीजेपी बार-बार मिस्टर बंटाधार के नाम से कांग्रेस पर प्रेशर नहीं बना पाएगी और न ही पहले की गुटबाजी अब कांग्रेस पर भारी पड़ेगी।

आने वाले चुनाव में कांग्रेस पहले से कहीं ज्यादा फ्रेश और एनर्जेटिक नजर आएगी। कुछ नेताओं का सपोर्ट पर्दे के पीछे से मिलता रहेगा, लेकिन सामने कमान संभालने वाले चेहरे अब भीष्म की तरह बूढ़े नहीं बल्कि, अर्जुन की तरह तेज और चपल भी होंगे।

प्रदेश कांग्रेस में पूरी एक पीढ़ी हो चुकी रिटायर

कांग्रेस में हुए एक बड़े घटनाक्रम के बाद अब ये तय कहा जा सकता है कि इस पार्टी ने खुद बदलने का फैसला कर लिया है। हम ये भी कह सकते हैं कि प्रदेश कांग्रेस में पूरी एक पीढ़ी रिटायर हो चुकी है या रिटायर कर दी गई है।

अब आलाकमान भी इस बात को लेकर सख्त है कि कमान नए हाथों में होना चाहिए। कम से कम राजनीतिक रण में फ्रंट रो में नजर आने वाले यौद्धा एकदम युवा और एनर्जेटिक होना चाहिए।

दिग्विजय सिंह का सो कॉल्ड रिटायरमेंट नए दौर की या नई पीढ़ी की राजनीतिक आमद का ही तो संकेत है। आप हैरान हो सकते हैं ये सोच कर कि दिग्विजय सिंह के रिटायरमेंट की बात कहां से आ गई। तो उसका भी वाजिब जवाब है।

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दिग्विजय सिंह की घोषणा से अटकलों पर विराम

दिग्विजय सिंह की चुनावी राजनीति अब खत्म हो चुकी है। वो दो बार लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं। विधानसभा के चुनाव का जिम्मा वो अपने बेटे को सौंप ही चुके हैं। अब बस यही एक आस बची थी कि उन्हें पार्टी राज्यसभा में फिर से भेज दे।

चर्चाओं का दौर जारी था कि कांग्रेस अब ऐसा नहीं करेगी। इन सब अटकलों पर खुद दिग्विजय सिंह ने ही ये कहकर विराम लगा दिया कि वो राज्यसभा नहीं जाएंगे। इससे ये तो साफ है कि दिग्विजय सिंह अब किसी सदन में नजर नहीं आएंगे।

संगठन में भी उनकी कोई खास जिम्मेदारी नहीं है। एक तरह से वो सत्ता और संगठन दोनों की पहली पंक्ति से पीछे कर दिए गए हैं। जिस तरह बीजेपी का मार्गदर्शक मंडल होता है। दिग्विजय सिंह भी कांग्रेस के उसी अदृश्य मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा बन चुके हैं।

फिर भले ही आप ये खबरें सुन रहे हों कि दिग्विजय सिंह प्रदेश में बड़ी जिम्मेदारी निभाएंगे। फिर से नर्मदा यात्रा में जाएंगे और संगठन को मजबूत करेंगे। ऐसी बातें बहुत सारी हो सकती हैं। लेकिन इन सभी सवालों के जवाब भविष्य में समाए हुए हैं कि दिग्विजय सिंह का आगे का राजनीतिक भविष्य क्या लेकर आने वाला है।

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देखें... अभी कहां हैं कांग्रेस के सीनियर लीडर्स

कांग्रेस की नई तस्वीर साफ-साफ नजर आने लगी है। आप अगर कांग्रेस के सीनियर लीडर्स के नाम जानते हैं तो उन्हें याद करते जाइए और जरा सोचिए कि वो सब अभी कहां हैं। अगर आपको नाम याद नहीं है तो एक-एक कर हम आपको याद दिलवा देते हैं...

कमलनाथ...

हम उन कांग्रेस नेताओं की बात कर रहे हैं जो चार दशक पहले से कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में एक्टिव थे। शुरुआत हम कमलनाथ से ही करते हैं जो प्रदेश के सीनियर लीडर हैं और प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। कमलनाथ को पार्टी अगले किसी चुनाव में टिकट देगी इस पर संशय है।

लोकसभा की सीट वो पहले ही बेटे नकुलनाथ के हवाले कर चुके हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो कमलनाथ का पॉलिटिकल ऐरा भी अब खत्म ही हो चुका, कहा जा सकता है।

दिग्विजय सिंह...

दूसरे नेता खुद दिग्विजय सिंह हैं। जो राजनीति के अहम पदों से दूर हो चुके हैं। उनके बेटे अब विधानसभा का जिम्मा संभाल रहे हैं। संगठन कसने के लिए आरएसएस की मिसाल देने के बाद हाईकमान दिग्गी से नाखुश बताए जा रहे हैं।

ये बात अलग है कि उनके इस बयान पर बेटे जयवर्धन सिंह ने बचाव की पूरी कोशिश की थी और कहा था कि उनके पिता की हर बात के मायने अलग होते हैं। तो क्या ये मान लिया जाएं कि राज्यसभा न जाने की घोषणा करने के मायने भी कुछ और हैं। कथनी करनी के अंतर को राजनीतिक भविष्य में किसी नई संभावना से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

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सुरेश पचौरी...

इसी दौर के एक नेता हैं सुरेश पचौरी। जो अब कांग्रेस में नहीं है। वैसे बीजेपी में उनका भविष्य कोई खास दमदार नजर नहीं आ रहा है। उन्हीं की तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया भी भाजपाई हो ही चुके हैं और वहां काफी तरक्की पर भी हैं।

अरुण यादव...

दिग्विजय सिंह के साथ कैबिनेट में रहे और डिप्टी सीएम का पद संभालने वाले सुभाष यादव और जमुना देवी तो काफी समय पहले दुनिया से रुखसत हो ही चुके हैं। अब सुभाष यादव के बेटे अरुण यादव जरूर प्रदेश में एक्टिव हैं, लेकिन उनकी सियासी सक्रियता भी खास नहीं है।

विधानसभा या लोकसभा के टिकट की दावेदारी भी वो करेंगे या वो दावेदारी मान्य होगी ये मुश्किल लगता है। संगठन की कमान जीतू पटवारी के हाथ में देकर आलाकमान ने भी ये साफ कर दिया है कि यादव को संगठन में कोई खास पद मिलना मुश्किल है।

अजय सिंह राहुल...

कांतिलाल भूरिया भी किसी खास रोल में आगे नजर आएंगे ये मुश्किल है। अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह राहुल की सियासी पारी भी अब ठंडी ही नजर आ रही है। वो नेता प्रतिपक्ष रहे हैं, लेकिन अब उन्हें सत्ता और संगठन में कोई खास पद मिलता नहीं दिख रहा है।

सज्जन सिंह वर्मा...

सज्जन सिंह वर्मा से भी कांग्रेस कोई बड़ी उम्मीद रखती हो ऐसा नजर नहीं आता है। ये सारे वो नेता रहे हैं जो प्रदेश में कांग्रेस का बड़ा चेहरा रहे हैं। काफी हद तक कांग्रेस में गुटबाजी का भी आधार रहे हैं। सभी बड़े नेता अपने खेमों के खास थे। जब ये नेता ही एक्टिव नहीं रहेंगे तो इनके खेमे भी खुद ब खुद खत्म हो जाएंगे।

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सरदार नया होगा तो कबीला भी होगा नया

हम ये तो नहीं कहते कि राजनीति में खेमेबाजी पूरी तरह ही खत्म हो जाएगी। पर इतना तो तय है कि सरदार नया होगा तो कबीला भी नया होगा। जिसका सीधा मतलब है कि नए चेहरों को कांग्रेस की राजनीति में आने का मौका मिलेगा और क्या पता कि कोई नया चेहरा कांग्रेस का चेहरा भी चमका दे।

प्रदेश में बीजेपी का सबसे बड़ा हथियार रहा है मतदाताओं को दिग्विजय सिंह का शासनकाल याद दिलाकर ये आगाह करना कि वो दोबारा मिस्टर बंटाधार को मौका नहीं दे सकते, लेकिन जब मिस्टर बंटाधार एक्टिव राजनीति से ही दूर हो जाएंगे तो बीजेपी का ये अचूक अस्त्र ही इनएक्टिव हो जाएगा।

बड़ा सवाल... कांग्रेस नए नेताओं को कैसे बनाएगी सशक्त

पिछली हार के बाद कांग्रेस जीतू पटवारी और उमंग सिंगार पर बड़ा दांव खेल ही चुकी है। ये बात अलग है कि पटवारी और उमंग सिंघार का कार्यकाल दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के साए में ही गुजर रहा है। अब बस देखना ये है कि एक पूरी पीढ़ी को रिटायर करने के बाद कांग्रेस नए नेताओं को कैसे ज्यादा सशक्त और ज्यादा एक्टिव बनाती है या बनने पर मजबूर कर पाती है।



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