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Photograph: (thesootr)
NEWS STRIKE (न्यूज स्ट्राइक): मध्यप्रदेश के सागर जिले के दो धुरविरोधी नेताओं को एक साथ लाने के बाद क्या हेमंत खंडेलवाल ग्वालियर चंबल में भी यही करिश्मा दिखा पाएंगे। सागर में जिस तरह भूपेंद्र सिंह और गोविंद सिंह राजपूत एक दूसरे के विरोधी रहे हैं।
कुछ ऐसा ही विरोध ग्वालियर चंबल में ज्योतिरादित्य सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर के बीच भी है। ये दोनों तो और भी बड़े नेता हैं। राष्ट्रीय स्तर पर दोनों की छवि मजबूत है और दोनों की जंग का शंखनाद भी राष्ट्रीय स्तर पर ही गूंजता है। इस जंग से दोनों को फायदा कम नुकसान ज्यादा है। तोमर के सामने डर है तो सिंधिया के सामने वोटों का नुकसान।
सिंधिया और तोमर के बीच कितना तनाव...
एक पुरानी कहावत है कि दो तलवारें एक म्यान में नहीं रह सकतीं। पर, बीते कुछ समय से बीजेपी ऐसी म्यान बनने की कोशिश कर रही है। जो दो धुरंधर नेताओं की तलवार की धार को साधती आ रही है। इसके बावजूद दोनों के टकराव की खबर सामने आ ही जाती है।
अक्सर लोगों के सामने गलबहियां करते दिखने वाले सिंधिया और तोमर के बीच कितना फासला और कितना तनाव है। इसका अंदाजा दोनों के कमेंट्स और पॉलिटिक्स से लगाया जा सकता है।
ये लड़ाई चुनाव के एक पोलिंग बूथ की छोटी सी इकाई से लेकर जिला अध्यक्षों के चुनाव और दावेदारों को टिकट दिलाने तक में नजर आती है। दोनों में से एक नेता ने भी कभी शक्ति प्रदर्शन का कोई मौका नहीं छोड़ा।
ऐसे ही हालात कुछ सागर जिले में भी थे। जब गोविंद सिंह राजपूत और भूपेंद्र सिंह दोनों एक दूसरे के विरोधी से ज्यादा दुश्मन बन पड़े थे। तब हेमंत खंडेलवाल की एक पहल के बाद कुछ ऐसी तस्वीरें नजर आईं। जिसमें दोनों ही नेता हंसते मुस्कुराते एक दूसरे के साथ नजर आए।
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तोमर-सिंधिया... पार्टी एक, दिल अब भी जुदा-जुदा
क्या ऐसा ही कोई करिश्मा ग्वालियर चंबल की राजनीति में कर पाना आसान होगा। यहां मामला प्रदेश लेवल के नेताओं के लिहाज से थोड़ा ज्यादा पेचिदा है। खुद नरेंद्र सिंह तोमर भी सीनियर लीडर हैं। प्रदेश की राजनीति हो या फिर नेशनल लेवल की पॉलिटिक्स तोमर की धाक दोनों ही जगह पर काफी मजबूत रही है।
सिंधिया का भी यही हाल है। वो भी नेशनल लेवल से लेकर अपने क्षेत्र की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखते हैं। ऐसे में हेमंत खंडेलवाल या बीजेपी के मौजूदा नेताओं में इन दोनों के लिए कोई फरमान जारी करना बहुत आसान नहीं है। ऐसा हुआ भी तो उसमें परोक्ष रूप से बीजेपी के आलानेता की सहमति या आदेश जरूर शामिल होगा।
यही वजह है कि ग्वालियर चंबल में दोनों नेताओं का दंगल अक्सर खुलकर सामने आ जाता है। वैसे दोनों की सियासी अदावत सालों पुरानी है, लेकिन तब पार्टियां भी अलग-अलग ही थीं। तब तोमर बीजेपी से और सिंधिया कांग्रेस से एक दूसरे का विरोध करते थे।
अब पार्टियां एक हैं, लेकिन दिल अब भी जुदा-जुदा है। अंदर की खबरें तो ये हैं कि दोनों एक दूसरे का कद घटाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। अक्सर बैठकों में ये नाराजगी खुलकर जाहिर भी हुई है। विधानसभा चुनाव के दौरान भी लाड़ली बहनों के खाते में पैसे डालने का समारोह या फिर जनआशीर्वाद यात्रा हो सिंधिया और तोमर एक साथ मंच पर नजर नहीं आए।
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सिंधिया को राजा मानने से अब भी नहीं ऐतराज
विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी ने तोमर का चुनाव प्रबंधन समिति का संयोजक बनाया। ये बात भी सिंधिया को खास रास नहीं आई थी। जाहिर है एक दूसरे की मौजूदगी में दोनों को अपना प्रभाव कम होने का डर जरूर खाए जाता होगा। तोमर प्रदेशाध्यक्ष भी रह चुके हैं। इसलिए ये मान सकते हैं कि उनके नेतृत्व में प्रदेश में बीजेपी की साख मजबूत हुई और ग्वालियर चंबल में भी काफी आगे बढ़ा है।
सिंधिया के पास प्रदेश स्तर पर कोई पद नहीं रहा। न कांग्रेस में और नही बीजेपी में, लेकिन उनका रॉयल ऑरा कुछ ऐसा है कि वो जनता के बीच जाने पहचाने नेता बने हुए हैं। वो भले ही बीजेपी में आने के बाद ये कह चुके हों कि वो भी एक आम नेता हैं, लेकिन खुद अमित शाह उन्हें राजा साहब बोलकर संबोधित कर चुके हैं। जिससे ये साफ है कि उन्हें ग्वालियर चंबल का राजा मानने से पार्टी को भी कोई ऐतराज नहीं है।
सिंधिया कई बार ये जता भी चुके हैं कि उनकी वजह से ही 2020 में बीजेपी की सरकार बन चुकी थी। तब कांग्रेस सरकार गिराकर बीजेपी की सरकार न बनती तो शायद 2023 में भी बीजेपी का रिपीट होना इतना आसान नहीं होता। सिंधिया के इस गुमान पर खुद तोमर एक प्रोग्राम से इनडायरेक्टली ये कमेंट कर चुके हैं कि बीजेपी की जीत की वजह क्षेत्र में हो रहा विकास और पार्टी खुद है। सरकार में मैं लाया मैं लाया करने वाले नेता नहीं।
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तोमर-सिंधिया के बीच तनातनी आती है नजर
अब बीजेपी के ताजा हालात पर बात करें तो तोमर केंद्रीय राजनीति से प्रदेश की राजनीति में आ चुके हैं और सिंधिया केंद्र की राजनीति में है। लेकिन मनमुटाव के लिए सियासत की कोई सीमा मायने नहीं रखती।
सिंधिया अब भी क्षेत्र में जाते हैं तो तनातनी साफ नजर आती है। कुछ ही महीने पहले सिंधिया विकास कार्यों की समीक्षा के लिए ग्वालियर कलेक्ट्रेट पहुंचे थे। इस बैठक में सिंधिया समर्थक जनप्रतिनिधि शामिल हुए, लेकिन तोमर समर्थक सांसद भारत सिंह कुशवाहा बैठक से गायब रहे।
इस जंग से बीजेपी को नुकसान भी हो चुका है। पिछले नगरीय निकाय चुनाव में 57 साल में पहली बार ग्वालियर के मेयर पद पर बीजेपी को हार मिली। इस खेमेबाजी के चलते तोमर के लिए भी अपनी सीट पर जीत हासिल करना मुश्किल हो गया था।
तो क्या ये मान लिया जाए कि ये जंग यूं ही चलती रहेगी और बीजेपी आलाकमान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे। या पार्टी के स्तर पर इसका कोई हल निकल सकता है। अगर हाईकमान चाहे तो बिलकुल निकल सकता है। जरूर बस थोड़ी सी लगाम खींचने की है।
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तोमर की बेटों को राजनीति में सेट करने की कोशिश
नरेंद्र सिंह तोमर की उम्र 68 साल के आसपास है। उनकी कोशिश है कि एक्टिव पॉलिटिक्स से रिटायर होने के पहले वो अपने बेटों को राजनीति में सेट कर सकें। हालांकि, उनके बेटे देवेंद्र प्रताप तोमर का एक वीडियो वायरल होने के बाद ये काम थोड़ा मुश्किल हो गया। पर तोमर की कोशिश कम तो नहीं ही हुई होंगी।
आगे चलकर देवेंद्र न सही प्रबल को ही टिकट मिल जाए तो भी तोमर संतुष्ट हो सकते हैं, लेकिन सिंधिया के साथ कोल्ड वॉर में घटता कद और प्रभाव उनके लिए मुश्किल का कारण बन सकता है। ठीक इसी तरह सिंधिया को तोमर के समर्थकों और कार्यकर्ताओं का साथ मिल जाए तो ग्वालियर चंबल में उनकी और उनके समर्थकों की जीत आसान हो जाएगी। न केवल इतना बल्कि ठाकुर वोट भी सिंधिया खेमे में खुशी खुशी चले जाएंगे।
इन दिनों बीजेपी एक और शीत युद्ध का कर रही है सामना...
दोनों एक साथ मिलकर एक दूसरे के पॉलिटिकल करियर को खुद संवार सकते हैं। जो खुद साथ न हो सके तो पार्टी दोनों को ऐसे ऑफर देकर एक साथ ला भी सकती है। क्योंकि दो दिग्गजों के साथ आने से प्रदेश में साख घटेगी नहीं मजबूत ही होगी और मैसेज भी अच्छा जाएगा। क्योंकि बीजेपी इन दिनों एक और शीत युद्ध का सामना कर रही है। जो खुद सीएम मोहन यादव और सीनियर कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बीच जारी है।
इस युद्ध के बढ़ने से पहले पार्टी ने ग्वालियर-चंबल के दिग्गजों के फासले को पाट दिया तो तय है कि दूसरे कोल्ड वॉर को हैंडल करना आसान हो जाएगा। तो क्या सियासत का कोई ऐसा मंच बीजेपी सजा सकेगी जिस पर सारे गिले शिकवे भूलकर दोनो नेता एक साथ नजर आएं। साथ ही सारे कार्यकर्ताओं को ये मैसेज चला जाए कि दल के बाद अब दिल भी एक हो चुके हैं।
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