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Photograph: (thesootr)
News In Short
- कांग्रेस में आंतरिक समस्याएं, संगठन सुधार की आवश्यकता।
- राहुल गांधी की निगरानी रणनीति, सख्त रिव्यू प्रक्रिया।
- बीजेपी का हमला, कांग्रेस की आंतरिक कलह उजागर।
- उमंग सिंगार की स्वीकारोक्ति, संगठन को सुधारने की जरूरत।
- कांग्रेस का होमवर्क अधूरा, 2028 तक सत्ता वापसी मुश्किल।
News In Detail
NEWS STRIKE | न्यूज स्ट्राइक: क्या कांग्रेस अगला विधानसभा चुनाव जीत सकेगी। मेरा ये सवाल हर उस कांग्रेसी से है जो ये चाहता है कि कांग्रेस सत्ता में वापसी करे। कांग्रेस के जितने लीडर्स जितने कार्यकर्ता और जितने कांग्रेसी वोटर्स इस खबर को पढ़ रहे हैं वो सब अपने दिल पर हाथ रख कर बताएं कि क्या उन्हें सरकार में वापसी का कोई पक्का रास्ता नजर आता है।
ये सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कांग्रेस आलाकमान को तो ऐसा कोई तरीका नहीं दिख रहा है। कांग्रेस कितनी हताश या निराश हो सकती है इसका अंदाजा चंद घंटे पहले हुई कांग्रेस की बैठक से लगा सकते हैं। इसमें शिकायतों के वही पुराने पुलिंदे खुले। नाराजगी का दौर भी चला, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं है और कांग्रेस अब तक लीडरशिप पर ही माथापच्ची कर रही है तो संगठन कैसे मजबूत होगा।
कांग्रेस रिव्यू: पुरानी शिकायतें, कोई नया हल नहीं
किसी भी पॉलिटिकल पार्टी में समय-समय पर रिव्यू मीटिंग होती है। कांग्रेस की भी ये पुरानी परंपरा रही है जिसे निभाते हुए पार्टी की एक अहम बैठक हुई। आमतौर पर जब रिव्यू होता है तो ये जरूर विचार किया जाता है कि पिछली मीटिंग में क्या चर्चा हुई थी और उस पर आगे क्या काम हुआ।
कॉरपोरेट सेक्टर्स की रिव्यू मीटिंग में तो बॉस नतीजा न मिलने पर अपना साथियों की जमकर क्लास तक लगा देता है। कांग्रेस की मीटिंग में भी ऐसा ही कुछ हुआ। अंतर सिर्फ इतना था कि मीटिंग का बॉस यानी कि आलाकमान सिर्फ पुरानी बातों को याद कर नाराजगी जताते रहे। प्रदेश प्रभारी ने वही पुरानी शिकायत दर्ज करवाई और ताजा फैसलों पर भी नतीजा सिफर ही रहा।
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राहुल गांधी ने जीतू पटवारी से जताई नाराजगी
आपको ये पता ही होगा कि 2023 की हार के बाद कांग्रेस ने बड़े बदलाव किए। पूरी एक पीढ़ी को हाशिए पर भेजने के बाद जीतू पटवारी को कांग्रेस की कमान सौंपी और उमंग सिंगार को बना दिया नेता प्रतिपक्ष। उम्मीद तो यही थी कि दोनों युवा चेहरे पूरी एनर्जी झोंक कर काम करेंगे, लेकिन कांग्रेस को ऐसा कोई नतीजा नहीं मिला।
सूत्रों की माने तो खुद राहुल गांधी जीतू पटवारी से नाराजगी जता चुके हैं। राहुल गांधी की नाराजगी पर विस्तार से बताऊं उससे पहले याद दिला देता हूं शिवराज सरकार में हुआ किसान आंदोलन। जो मंदसौर गोली कांड के नाम से मशहूर हुआ। इस गोलीकांड के पीड़ितों से मिलने के लिए राहुल गांधी छुपते छुपाते मंदसौर आए थे। उन्हें बाइक पर बिठाकर मंदसौर तक लाए थे जीतू पटवारी। प्रशासन को इसकी कानों कान भनक तक नहीं हो सकी थी।
शायद जीतू पटवारी के उसी जुझारूपन से राहुल गांधी इंप्रेस रहे होंगे और उन्हें प्रदेश के लिए मुफीद नेतृत्व समझा होगा, लेकिन अब वो इंप्रेशन बदलने लगा है। जो बैठक में भी साफ नजर आया।
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कांग्रेस की सख्त निगरानी, राहुल की नई रणनीति
चूंकि पटवारी जिम्मेदार पद पर हैं इसलिए बैठक में उनसे जमकर सवाल हुए। आलाकमान ने जाहिर किया कि जीतू पटवारी की लीडरशिप में अब तक कोई सिस्टम नहीं बन सका है। राहुल गांधी इस बात से भी नाराज बताए गए कि संगठन को नए सिरे से बनाने के लिए वो खुद कई बैठकें कर चुके हैं। उसके बाद भी कांग्रेस नेताओं का रवैया ढीलाढाला ही है।
मल्लिकार्जुन खरगे ने भी जिलाध्यक्षों की क्लास ली और टीम न बाने पाने के लिए लताड़ा। इन सबका नतीजा ये हुआ कि अब कांग्रेस ने ये फैसला लिया है कि सारे काम केंद्रीय टीम ही करेगी। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी ने प्रदेश नेतृत्व को साफ कर दिया है कि अब कांग्रेस आलाकमान खुद प्रदेश कांग्रेस के काम पर निगरानी करेंगे। मॉनिटरिंग सख्त होगी और रिव्यू भी ज्यादा हुआ करेंगे।
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बीजेपी का हमला: कांग्रेस आंतरिक कलह का शिकार
इस बैठक की कुछ कलई बीजेपी ने भी खोली है। बीजेपी प्रवक्ता आशीष अग्रवाल ने एक खबर ट्वीट कर कांग्रेस पर चुटकी ली है। उन्होंने एक न्यूज की कटिंग शेयर की है। जिसकी हैडिंग है राहुल के सामने प्रदेश प्रभारी ने उठाया मप्र में अनुशासनहीनता का मुद्दा। इस खबर में दावा किया गया है कि प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने अनुशासनहीनता का मुद्दा उठाया। पदाधिकारियों पर मनमानी का आरोप भी लगाया।
उमंग सिंगार के हवाले से छपा है कि उन्होंने मनमुटाव का मुद्दा उठाया। जिस पर जीतू पटवारी ने आश्वासन दिया कि सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी। आशीष अग्रवाल ने इस पर कमेंट लिखा है कि कांग्रेस विपक्ष से ज्यादा आंतरिक कलह का संग्रहालय बन चुकी है।
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उमंग सिंघार ने माना, कांग्रेस संगठन को सुधारना जरूरी
बीजेपी को हमले को कांग्रेस नकारे उससे पहले उमंग सिंगार ने इस पर मुहर भी लगा दी। बैठक के बाद कुछ मीडिया हाउसेस से चर्चा करते हुए उमंग सिंगार ने ये मान लिया कि कांग्रेस का संगठन अब भी मजबूत नहीं है और संगठन को मजबूत करने पर मंथन होगा। सच को स्वीकार करना अच्छी बात है।
उमंग सिंगार ने सच को मान लिया है, लेकिन उन्हें ये भी मानना होगा कि वो अब किसी बड़े नेता के पीछे चलने वाले जूनियर नेता या समर्थित नेता नहीं है। बल्कि खुद भी एक जिम्मेदार पोजीशन में है। बैठक में सिर्फ शिकायत करना उनका काम नहीं है। उन्हें सॉल्यूशन भी देना चाहिए। खुद उमंग सिंगार को ये सवाल अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या कांग्रेस के पास संगठन को मजबूत करने का कोई ठोस आइडिया है।
अब चुनाव को सिर्फ दो ही साल दूर मानना चाहिए। क्योंकि चुनावी साल तो तैयारियों में ही बीत जाएगा। तब तक संगठन मजबूत हो जाना चाहिए और कांग्रेस तो अभी इस पर मंथन करने की बात कर रही है।
कांग्रेस का होमवर्क: 2028 तक सत्ता की उम्मीदें धुंधली
करीब डेढ़ साल पहले हुए सीडब्ल्यूसी की एक बैठक में खरगे ने कहा था कि कांग्रेस को होमवर्क करने की जरूरत है। क्या डेढ़ साल में कांग्रेस कोई होमवर्क कर सकी। अगर हां तो फिर उसका असर कहां दिख रहा है। मध्यप्रदेश में तो बिलकुल ही नजर नहीं आ रहा।
लोकसभा के बाद से अब तक जितने विधानसभा चुनाव हुए हैं। उसमें भी कांग्रेस पिछड़ती हुई ही नजर आई है। फिर होमवर्क कहां हो रहा है। ये होमवर्क कर कौन रहा है।
क्या कांग्रेस आलाकमान उस टीचर की तरह हो गए हैं जो बच्चों को होमवर्क न करने पर सख्त सजा देने की धमकी देता है, लेकिन तयशुदा वक्त पर खुद ही होमवर्क का पूछना भूल जाता है। अगर यही रवैया रहा तो कांग्रेस को 2028 तो क्या उसके बाद भी सत्ता में वापसी के सपने देखना भी छोड़ देना चाहिए।
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