/sootr/media/media_files/2026/03/05/breakup-marriage-refusal-not-abetment-of-suicide-cg-high-court-2026-03-05-17-40-06.jpg)
NEWS IN SHORT
- हाईकोर्ट ने कहा कि प्रेम संबंध टूटना या शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं
- जस्टिस संजय एस. अग्रवाल की बेंच ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई में की
- कोर्ट ने कहा कि धारा 306 आईपीसी में दोषी ठहराने के लिए आरोपी की सीधी भूमिका जरूरी
- युवती ने 2016 में आत्महत्या की थी, जिसके लिए युवक पर केस दर्ज किया गया था
- हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए आरोपी की दोषमुक्ति बरकरार रखी
NEWS IN DETAIL
हाईकोर्ट का अहम फैसला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल प्रेम संबंध टूट जाना या शादी से इनकार कर देना किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संजय एस. अग्रवाल की बेंच ने यह स्पष्ट किया कि धारा 306 आईपीसी के तहत दोषी ठहराने के लिए यह साबित होना जरूरी है कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाने में प्रत्यक्ष और सक्रिय भूमिका निभाई हो।
इसी आधार पर कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया और आरोपी को दोषमुक्त करने के सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा।
क्या है पूरा मामला
यह मामला बिलासपुर जिले के चकरभाठा थाना क्षेत्र का है। यहां रहने वाले सुनील कुमार साहू और 21 वर्षीय युवती के बीच दोस्ती थी, जो बाद में प्रेम संबंध में बदल गई।
दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन युवक के माता-पिता इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं थे। इसी बीच 2016 में युवती ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
आरोप लगाया गया कि घटना से कुछ दिन पहले दोनों के बीच विवाद हुआ था और युवक ने शादी से इनकार कर दिया था, जिससे आहत होकर युवती ने यह कदम उठाया।
पुलिस जांच और केस दर्ज
घटना के बाद पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू की। करीब डेढ़ महीने बाद युवक सुनील कुमार साहू के खिलाफ आईपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के तहत केस दर्ज किया गया और उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
ट्रायल में आरोप साबित नहीं हुए
पुलिस ने कोर्ट में चालान पेश किया, जिसमें युवती के पास से सुसाइड नोट मिलने का जिक्र था। हालांकि उस पत्र में आरोपी के खिलाफ कोई आरोप नहीं था।
सरकारी पक्ष ने युवती की बहन, पिता और मां को गवाह बनाया, लेकिन उनके बयान प्रत्यक्ष नहीं बल्कि सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे। सुनवाई के दौरान आरोपी के खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश नहीं हो सके।
सत्र न्यायालय ने किया दोषमुक्त
23 जनवरी 2017 को चौथे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने आरोप सिद्ध नहीं होने पर आरोपी को दोषमुक्त कर दिया। इसके बाद राज्य सरकार ने धारा 378 के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन हाईकोर्ट ने भी सत्र न्यायालय के फैसले को सही ठहराया।
हाईकोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि आरोपी ने मृतका को आत्महत्या के लिए उकसाया या प्रेरित किया था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल प्रेम संबंध टूटना या शादी से इनकार करना अपने आप में आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता।
Sootr Knowledge
- धारा 306 आईपीसी आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) से संबंधित है।
- इस धारा के तहत सजा देने के लिए आरोपी की प्रत्यक्ष भूमिका और ठोस सबूत जरूरी होते हैं।
- केवल मानसिक तनाव, विवाद या संबंध टूटना अपने आप में दुष्प्रेरण का प्रमाण नहीं माना जाता।
- अदालतें ऐसे मामलों में सुसाइड नोट, गवाह और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को ध्यान में रखती हैं।
- सुप्रीम कोर्ट भी कई फैसलों में कह चुका है कि सिर्फ रिश्ते टूटने से धारा 306 लागू नहीं होती।
आगे क्या
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद मामले में आरोपी को राहत मिल गई है। यह निर्णय भविष्य में धारा 306 से जुड़े मामलों की सुनवाई में एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ के रूप में भी देखा जा सकता है।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि केवल प्रेम संबंध टूटना या शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाने का कानूनी आधार नहीं बनता। किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए उसकी प्रत्यक्ष और सक्रिय भूमिका का ठोस प्रमाण होना जरूरी है।
ये खबरें भी पढ़ें...
मर्जी से बनाए गए संबंध रेप नहीं... छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने CAF जवान की सजा को किया रद्द
केस लड़ते-लड़ते वकील को महिला से हुआ प्यार, पति से तलाक करवाकर बनाए संबंध, अब आया नया ट्विस्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा-बलात्कार में गुप्तांग का प्रवेश जरूरी, स्खलन नहीं
जबरदस्ती I Love You कहना होगा अपराध, महिलाओं की मर्यादा पर CG High Court का बड़ा फैसला
/sootr/media/agency_attachments/dJb27ZM6lvzNPboAXq48.png)
Follow Us