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रायपुर. देश की राजधानी दिल्ली पूरी सियासत का केंद्र बिंदु है। खासकर बीजेपी शासित राज्यों के लिए तो दिल्ली ही सब कुछ है। ऐसे में बीजेपी के खांटी नेता बृजमोहन अग्रवाल की गतिविधियां चर्चाओं में है। राहुल, प्रियंका से मुलाकात हो या बीजेपी नेताओं को अपने घर पर डिनर पर बुलाना। ये भले ही सामान्य बात हों लेकिन सियासी पंडित तो कहने लगे हैं कि कुछ तो खिचड़ी पक रही है।
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बृजमोहन की डिनर डिप्लोमेसी
किसी राजनेता के यहां रात के भोजन को खबर बनाते समय आमतौर पर डिनर डिप्लोमेसी का नाम दे दिया जाता है। इसमें किसी को कुछ आपत्ति भी नहीं होती। बृजमोहन अग्रवाल के दिल्ली आवास पर यही डिनर डिप्लोमेसी नजर आई। उन्होंने बीजेपी सांसदों को रात के भोजन पर बुलाया। इनमें कुछ केंद्रीय मंत्री भी शामिल हुए।
अब भोजन तो चलता ही रहता है इसमें ऐसा क्या है? लेकिन राजनीतिक पंडित कहां मानने वाले हैं। वो भी तब जबकि यह मामला बेबाक बृजमोहन से जुड़ा हो, इसमें एक बात और दिलचस्प है। यह बात अगले दिन नहीं बल्कि अगले के अगले दिन सामने आई। कुछ बेहद करीबियों ने एक दिन बाद ही बता दिया था कि रात में बीजेपी नेताओं के साथ पहले बैठक हुई और बाद में भोजन हुआ।
बैठक में यूजीसी के नए प्रावधानों को लेकर भी चर्चा हुई। लेकिन बाद में कह दिया गया कि ऐसा कुछ नहीं था। इसीलिए इस डिनर डिप्लोमेसी को बाहर आने में 2 दिन लग गए। खैर हम बात कर रहे थे राजनीतिक पंडितों के शिगूफों की जो कह रहे हैं कि हो न हो कोई तो खिचड़ी पक रही है।
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क्या हुआ इस रात
हमने उनके निजी लोगों से पूछा कि क्या हुआ था उस रात जब बैठक और भोजन हुआ था। उन्होंने वही जवाब दिया जिसकी हम उम्मीद कर रहे थे। खबर आई कि रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल के दिल्ली स्थित आवास पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया समेत कई वरिष्ठ नेता और सांसद विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर सकारात्मक चर्चा के लिए शामिल हुए। जिसका मुख्य उद्देशय प्रधानमंत्री के "सबका साथ सबका विकास" के मूलभूत विजन को संसद के बजट सत्र के माध्यम से प्रभावी रूप से आगे लेकर चलना था।
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बृजमोहन की असहज करती सहज राजनीति
पार्लियामेंट के परिसर में बृजमोहन की राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ तस्वीर बाहर आई तो फिर चर्चा शुरू हो गई। हालांकि संसद में इस तरह के नजारे आम है जब विरोधी नेता एक दूसरे से मिलते हैं। इस तस्वीर में दिग्विजय सिंह भी नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विरोधी ही सही लेकिन बृजमोहन और दिग्विजय पुराने राजनीतिक साथी हैं। साथी भी तबके जबकि छत्तीसगढ़ अलग भी नहीं हुआ था।
यह तस्वीर भले ही सामान्य हो लेकिन इस पर बातें इसलिए बनती हैं क्योंकि इसमें बृजमोहन हैं जिनका सियासी कद बड़ा है। उनके करीबी लोग कहते हैं कि यह उनकी सहज राजनीति है लेकिन यही सहज राजनीति बीजेपी और सरकार को असहज कर देती है। बृजमोहन के खुलकर आते बयान कभी कभी सरकार को बैकफुट पर ले आते हैं। हालांकि ये मुलाकात महज इत्तेफाक मानी जा रही है।
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