छत्तीसगढ़ की चिट्ठी: रीमेक का राज, सिस्टम का सन्नाटा और फाइलों का खेल
Rajesh Lahoti | Mar 28, 2026, 17:57 IST
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छत्तीसगढ़ इन दिनों अजीब मोड़ पर खड़ा है, जहां पुरानी फाइलें नई पॉलिश के साथ लौट रही हैं और नई घटनाएं पुराने सवाल खड़े कर रही हैं। आइए इस हफ्ते की चिट्ठी पढ़ते हैं। यहां योजनाएं खत्म नहीं होतीं, बस अगली बैठक तक रिव्यू में चली जाती हैं।
रीमेक का राज, सिस्टम का सन्नाटा और फाइलों का खेल
घटनाएं होती हैं, बयान आते हैं, जांच बैठती है और फिर धीरे-धीरे सब कुछ फाइलों के नीचे दब जाता है। सिस्टम हर बार जागता है, लेकिन अक्सर तब, जब शोर ज्यादा हो जाता है। छत्तीसगढ़ की चिट्ठी में यही सब है। जनता हर बार वही देखती है। चेहरे बदलते हैं, लेकिन तरीका वही रहता है और खबरें नहीं, पैटर्न दोहराए जाते हैं।
पुरानी कहानी, नया पोस्टर
नतीजा यह हुआ कि साइकिलें घूमने से ज्यादा खड़ी रहने लगीं और योजना धीरे-धीरे कबाड़ में तब्दील हो गई। उस समय इस योजना में 45 करोड़ रुपए डूब चुके हैं अब एक बार फिर 30 करोड़ की नई योजना तैयार है। वही श्रीलंका से आई 130 साइकिलें, जो सालों से धूल खा रही थी, अब फिर से विकास का चेहरा बनने को तैयार हैं।
ऐसा लगता है जैसे सिस्टम यह मानने को तैयार ही नहीं कि गलती हो चुकी है। बल्कि वह हर बार उसी गलती को नए पैकेज में पेश कर देता है। इस बार दुर्ग-भिलाई को भी जोड़ दिया गया है, ताकि अगर एक शहर में योजना न चले तो दूसरे के आंकड़ों में उसे सफल दिखाया जा सके। यानि साइकिल चले या ना चले बजट आया है तो वो दौड़ना ही चाहिए। स्टेट कैपिटल रीजन के लिए बनाई गई यह योजना पूरी तरह से बजट को ठिकाने लगाने के लिए ही बनाई गई है।
जब खबर बोले, तब सिस्टम जागे
ऐसा लगा जैसे यह घटना भी बाकी घटनाओं की तरह फाइलों में दबा दी जाएगी। लेकिन जैसे ही मामले ने खबर का रुप लिया, सिस्टम हरकत में आया। एफआईआर दर्ज हुई, एट्रोसिटी एक्ट जोड़ा गया और जांच शुरू हो गई। यह वही सिस्टम है जो पहले चुप रहता है, लेकिन जब दबाव बनता है तो अचानक सक्रिय हो जाता है।
प्रशासन को देखो, दो मिनट का मौन रखा गया, अधिकारियों ने संवेदना जताई और मुआवजे की घोषणा करवा दी। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही रह गया कि क्या तीन जिंदगियों की कीमत सिर्फ मुआवजे से तय हो सकती है? वहीँ प्रशासन हमेशा की तरह अपनी औपचारिकता निभाकर अलग हो गया है।
सरेंडर की टाइमिंग
यह निश्चित रूप से सुरक्षा बलों के लिए एक सफलता है, लेकिन इसके पीछे की टाइमिंग कई सवाल भी खड़े करती है। क्या यह लंबे समय से चल रही रणनीति का नतीजा है या फिर डेडलाइन का दबाव? कुछ कहते हैं इंटने सरेंडर हुए हैं तो कुछ कहते हैं जितने हुए हैं उसमे से 60 फीसदी पुलिस की सूची में ही नहीं थे।
खैर यह सब तो होता ही रहेगा, किसी के मुंह पर लगाम नहीं लगाई जा सकती है, लेकिन यह सच है कि लगातार हो रहे सरेंडर न केवल बस्तर के लिए बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए एक उम्मीद जगाने वाली खबर है।
जंगल से ज्यादा हरा पोर्टफोलियो
यह सब बताता है कि इस सेवा में ग्रोथ का पैमाना थोड़ा अलग है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि कई मामलों में संपत्ति अफसरों के नाम से ज्यादा उनकी पत्नियों के नाम पर है। इससे यह समझना मुश्किल नहीं कि सिस्टम के भीतर वित्तीय योजना कितनी समझदारी से बनाई जाती है।
जंगलों में हरियाली कम हो रही है या नहीं, यह अलग मुद्दा है, लेकिन अफसरों की प्रॉपर्टी लिस्ट जरूर हर साल हरी-भरी होती जा रही है। अच्छा, एक बात और। यह तो वो लिस्ट है जो इनके द्वारा घोषित संपत्ति के आधार पर बनी है, अगर जांच एजेंसियों के हवाले से बने तो इसमें कई-कई गुना बढ़ोत्तरी नजर आएगी।
निगरानी का सच
जांच हुई, छापेमारी हुई, पौधों को नष्ट कर दिया गया और कार्रवाई शुरू हो गई। मुद्दा यह है कि इतनी बड़ी गतिविधि लंबे समय तक नजरों से कैसे बची रही। क्या निगरानी में कमी थी, या फिर नजरें कहीं और व्यस्त थीं?
यह घटना सिर्फ एक अवैध खेती का मामला नहीं है, बल्कि यह सिस्टम की निगरानी व्यवस्था की भी परीक्षा है, जिसमें कई जगहों पर खामियां साफ नजर आती हैं। वैसे सरकारी अफसरों को पता है कि कहां, कब से और कितनी मात्रा में अफीम उगाई जा रही है, लेकिन क्या करें सिस्टम का हिस्सा हैं और अफीम चाट रखी है सो अलग।
जितने आरोप, उतना अनुभव
ऐसा लगता है जैसे सिस्टम ने नया फॉर्मूला खोज लिया है, जितने आरोप, उतना अनुभव। कभी-कभी तो यह पूरा मामला गणित के किसी नए सिद्धांत जैसा लगता है। जहां आम दुनिया में गलती करने पर सजा मिलती है, वहीं यहां गलती शायद कैरियर ग्रोथ का हिस्सा बन जाती है। जिन अधिकारियों के नाम शिकायतों में सबसे ऊपर होते हैं, वे ही प्रमोशन की सूची में भी पीछे नहीं रहते।
इससे यह पता चलता है कि यहां सिर्फ काम करना काफी नहीं है, सिस्टम की भाषा समझना भी जरूरी है। गांवों के विकास के लिए जो योजनाएं बनी थीं, वे अक्सर कागजों की दुनिया में ही घूमती रह जाती हैं। जमीन पर विकास ढूंढने जाओ तो वह कहीं रास्ते में ही गायब मिलता है।
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