धान के कटोरे की जमीन की सेहत खराब, रसायनों के अधिक प्रयोग से खेत की मिट्टी पर बंजर होने का खतरा, 33 जिलों की रिसर्च में खुलासा
Arun Tiwari | Jan 06, 2026, 16:13 IST
chhattisgarh farmland soil health
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। यानी यहां सबसे ज्यादा धान पैदा होती है। यहां के चावल का जायका विदेशों में भी पसंद किया जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़ की जमीन बहुत संकट में है। यहां की जमीन कुपोषित होती जा रही है।
Raipur. छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। यानी यहां सबसे ज्यादा धान पैदा होती है। यहां के चावल का जायका विदेशों में भी पसंद किया जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़ की जमीन बहुत संकट में है। यहां की जमीन कुपोषित होती जा रही है।
रसायनों का अत्याधिक उपयोग मिट्टी जान ले रहा है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने प्रदेश के अलग अलग जिलों की जमीन के स्वाइल हेल्थ कार्ड का अध्ययन किया तो हैरान करने वाली जानकारी सामने आई।
खेत की मिट्टी में पोषक तत्वों की इस कदर कमी हो रही है कि उस पर बंजर होने का खतरा मंडरा रहा है। सरकार ने किसानों से जैविक खाद अपनाने और फसल चक्र बदलने की अपील की है। आइए आपको बताते हैं कि यहां की खेती की जमीन में किन पोषक तत्वों की कमी है।
धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की धरती गंभीर रूप से कमजोर होती जा रही है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने वर्ष 2024-25 में प्रदेश के 33 जिलों के लगभग 1 लाख 75 हजार 444 मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड का विश्लेषण किया। इस विश्लेषण में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार 76.76 फीसदी नमूनों में नाइट्रोजन की मात्रा लगभग शून्य पाई गई। वहीं 51.8 फीसदी मिट्टी में मिट्टी की जान यानी कार्बन की कमी पाई गई है। 23.62 फीसदी में फास्फोरस और 4.13 फीसदी मिट्टी में पोटाश की कमी पाई गई।
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वैज्ञानिकों के अनुसार, रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग और जैविक खाद की कमी के कारण मिट्टी में पोषक तत्व खत्म होते जा रहे हैं। मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा भी लगातार घट रही है, जिससे भूमि की उर्वरता पर खतरा मंडरा रहा है। यदि समय रहते इस स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो जमीन पर बंजर होने का संकट पैदा हो जाएगा।
छत्तीसगढ़ की कृषि उत्पादन आयुक्त शहला निगार कहती हैं कि मिट्टी की उर्वरता के लिए जैविक खाद का उपयोग बढ़ाया जा रहा है। किसानों से फसल चक्र में भी बदलाव की भी अपील की गई है। रासायनिक खादों के उपयोग और संतुलित खेती पर जोर दिया जा रहा है।
- मिट्टी में नाइट्रोजन कम होने पर पौधे की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। पौधे का विकास रुक जाता है और उत्पादन घट जाता है।
- फास्फोरस की कमी से फसलों की जड़ों का विकास रुक जाता है, पौधे कमजोर हो जाते हैं और फल-फूल कम आते हैं।
- पोटेशियम की कमी से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है। फसल जल्दी सूख जाती है और दाने हल्के रह जाते हैं।
सूरजपुर – 99.90 फीसदी
सरगुजा – 99.81 फीसदी
गरियाबंद – 99.74 फीसदी
खैरागढ़ – 99.60 फीसदी
बीजापुर – 98.56 फीसदी
दुर्ग – 1.35 फीसदी
बिलासपुर – 1.00 फीसदी
धमतरी – 0.80 फीसदी
सारंगढ़ – 0.55 फीसदी
मुंगेली – 0.51 फीसदी
जशपुर – 89.93 फीसदी
बलरामपुर – 75.31 फीसदी
खैरागढ़ – 65.10 फीसदी
राजनांदगांव – 61.35 फीसदी
महेला मानपुर – 51.40 फीसदी
कोंडागांव – 36.50 फीसदी
धमतरी – 36.03 फीसदी
बालौद – 27.75 फीसदी
जीपीएम – 24.47 फीसदी
सारंगढ़ – 19.22 फीसदी
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कबीरधाम – 99.04 फीसदी
सूरजपुर – 91.05 फीसदी
बेमेतरा – 89.16 फीसदी
बलौदाबाजार – 76.03 फीसदी
गरियाबंद – 75.27 फीसदी
रायपुर – 14.92 फीसदी
महासमुंद – 14.62 फीसदी
राजनांदगांव – 14.00 फीसदी
खैरागढ़ – 13.04 फीसदी
सक्ती – 12.10 फीसदी
जानकार कहते हैं कि नाइट्रोजन की कमी का कारण असंतुलित खेती और कार्बन की कमी है। मिट्टी में पोषक तत्वों को रोकने का काम ऑर्गनिक कार्बन यानी गोबर की खाद करती है। कार्बन खत्म होने से मिट्टी छलनी बन गई है। किसान जो यूरिया डालते हैं वो फसल में रुकने की जगह पानी के साथ बहकर जमीन के नीचे चला जाता है। या फिर भाप बनकर उड़ जाता है।
इससे उत्पादन कम होता है। एक्सपर्ट कहते हैं कि किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग की जरुरत है। बिना मिट्टी की जांच के खेतों में रासायनिक खाद डालना उचित नहीं है। अनावश्यक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की सेहत खराब होती है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग करने से मिट्टी भी ठीक रहेगी और उत्पादन भी बढ़ेगा।
राकेश वनवासी, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक
रसायनों का अत्याधिक उपयोग मिट्टी जान ले रहा है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने प्रदेश के अलग अलग जिलों की जमीन के स्वाइल हेल्थ कार्ड का अध्ययन किया तो हैरान करने वाली जानकारी सामने आई।
खेत की मिट्टी में पोषक तत्वों की इस कदर कमी हो रही है कि उस पर बंजर होने का खतरा मंडरा रहा है। सरकार ने किसानों से जैविक खाद अपनाने और फसल चक्र बदलने की अपील की है। आइए आपको बताते हैं कि यहां की खेती की जमीन में किन पोषक तत्वों की कमी है।
रसायन ले रहे मिट्टी की जान :
रिपोर्ट के अनुसार 76.76 फीसदी नमूनों में नाइट्रोजन की मात्रा लगभग शून्य पाई गई। वहीं 51.8 फीसदी मिट्टी में मिट्टी की जान यानी कार्बन की कमी पाई गई है। 23.62 फीसदी में फास्फोरस और 4.13 फीसदी मिट्टी में पोटाश की कमी पाई गई।
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खेतों में रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग:
छत्तीसगढ़ की कृषि उत्पादन आयुक्त शहला निगार कहती हैं कि मिट्टी की उर्वरता के लिए जैविक खाद का उपयोग बढ़ाया जा रहा है। किसानों से फसल चक्र में भी बदलाव की भी अपील की गई है। रासायनिक खादों के उपयोग और संतुलित खेती पर जोर दिया जा रहा है।
पोषक तत्वों की कमी का असर :
- फास्फोरस की कमी से फसलों की जड़ों का विकास रुक जाता है, पौधे कमजोर हो जाते हैं और फल-फूल कम आते हैं।
- पोटेशियम की कमी से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है। फसल जल्दी सूख जाती है और दाने हल्के रह जाते हैं।
इन जिलों में नाइट्रोजन की इतनी कमी :
सरगुजा – 99.81 फीसदी
गरियाबंद – 99.74 फीसदी
खैरागढ़ – 99.60 फीसदी
बीजापुर – 98.56 फीसदी
नाइट्रोजन की अधिकता वाले जिले:
बिलासपुर – 1.00 फीसदी
धमतरी – 0.80 फीसदी
सारंगढ़ – 0.55 फीसदी
मुंगेली – 0.51 फीसदी
इन जिलों में फास्फोरस की इतनी कमी :
बलरामपुर – 75.31 फीसदी
खैरागढ़ – 65.10 फीसदी
राजनांदगांव – 61.35 फीसदी
महेला मानपुर – 51.40 फीसदी
फस्फोरस की अधिकता वाले जिले:
धमतरी – 36.03 फीसदी
बालौद – 27.75 फीसदी
जीपीएम – 24.47 फीसदी
सारंगढ़ – 19.22 फीसदी
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अंबिकापुर में कोयले के पानी से बंजर हो गया खेत, 500 एकड़ जमीन तबाह, तीन साल पहले बनी रोकने की योजना केवल कागजों पर
25 साल में छत्तीसगढ़ बना खाद्यान्न आत्मनिर्भरता का राष्ट्रीय मॉडल, खेतों में लहलहा रही समृद्धि की फसल
पोटेशियम की कमी वाले जिले :
सूरजपुर – 91.05 फीसदी
बेमेतरा – 89.16 फीसदी
बलौदाबाजार – 76.03 फीसदी
गरियाबंद – 75.27 फीसदी
पोटेशियम की अधिकता वाले जिले :
महासमुंद – 14.62 फीसदी
राजनांदगांव – 14.00 फीसदी
खैरागढ़ – 13.04 फीसदी
सक्ती – 12.10 फीसदी
एक्सपर्ट व्यू :
इससे उत्पादन कम होता है। एक्सपर्ट कहते हैं कि किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग की जरुरत है। बिना मिट्टी की जांच के खेतों में रासायनिक खाद डालना उचित नहीं है। अनावश्यक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की सेहत खराब होती है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग करने से मिट्टी भी ठीक रहेगी और उत्पादन भी बढ़ेगा।
राकेश वनवासी, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक
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