छत्तीसगढ़ की चिठ्ठी: नक्सल रणनीति, जेल विवाद और बजट सत्र की हलचल
Rajesh Lahoti | Feb 14, 2026, 13:55 IST
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इस हफ्ते छत्तीसगढ़ में नक्सल मोर्चे पर नई रणनीति, जेल व्यवस्था में सुधार को लेकर बहस और भारतमाला घोटाले की जांच समेत कई अहम घटनाएं सुर्खियों में रही हैं। इस लेख में हम इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
रायपुर. छत्तीसगढ़ इस सप्ताह एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जहां नक्सल समस्या से लेकर राजनीतिक बयानों और जेल व्यवस्था तक, हर मोर्चे पर हलचल मच रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बस्तर क्षेत्र में नक्सलियों के खिलाफ अंतिम रणनीति की ओर इशारा किया।
वहीं, कांग्रेस नेता कवासी लखमा और पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे चैतन्य बघेल की रिहाई ने जेल व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। बाल्को हादसे के 16 साल बाद भी न्याय की प्रतीक्षा जारी है, और भारतमाला घोटाले की जांच से प्रशासनिक तंत्र में हड़कंप मचा हुआ है। इस सबके बीच, राज्य का आगामी बजट सत्र राजनीतिक हलचल के केंद्र में है, जिसमें कई अहम फैसले हो सकते हैं। चलिए इन सभी विषयों पर विस्तार से चर्चा करते हैं...
पिछले कुछ महीनों से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर क्षेत्र पर असाधारण फोकस रहा है। बीते सप्ताह उनका बस्तर दौरा कई मायनों में अहम माना गया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि हाल के समय में उन्होंने जितनी बार छत्तीसगढ़ का रुख किया है, उतना शायद किसी अन्य राज्य का नहीं किया। यह निरंतर उपस्थिति संकेत देती है कि केंद्र सरकार नक्सल समस्या को अब निर्णायक मोड़ तक ले जाना चाहती है।
प्रदेश के गृह मंत्री विजय शर्मा के बयान ने इस दौरे को और अधिक महत्व दे दिया है। उन्होंने संकेत दिया कि 31 मार्च से पहले अमित शाह का टूसरा दौरा संभव नहीं है। यह वो समय सीमा है जो केंद्र नक्सलियों के खात्मे के लिए पहले ही तय कर चुका है।
संदेश स्पष्ट है… जो नक्सली अब भी सक्रिय हैं, उनके पास आत्मसमर्पण का अवसर है, अन्यथा सुरक्षा बलों की कार्रवाई और तेज हो सकती है। रायपुर में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। बैठक में सुरक्षा एजेंसियों की प्रगति, नक्सल गतिविधियों के आंकड़े, आत्मसमर्पण की संख्या और भविष्य की कार्ययोजना पर भी विस्तार से चर्चा हुई है। यह सप्ताह संकेत देकर गया है कि बस्तर में आने वाले महीनों में या तो बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण होंगे या फिर निर्णायक मुठभेड़ें देखने को मिल सकती हैं।
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करीब 379 दिन जेल में बिताने के बाद कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री कवासी लखमा को आखिरकार जमानत मिल गई। उनकी रिहाई केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम बन गया है। जमानत के लिए उन्होंने कई बार अदालत का दरवाजा खटखटाया। हर बार अलग-अलग आधार… स्वास्थ्य, मानवीय पहलू और कानूनी तर्क- प्रस्तुत किए गए, लेकिन राहत मिलने में लंबा समय लगा।
जेल से बाहर आने के बाद लखमा ने आरोप लगाया कि उन्हें समुचित इलाज और सुविधाएं नहीं मिलीं। उनका यह बयान कांग्रेस के लिए भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दा बन गया है। रिहाई के बाद उनके सामने रहने के कई विकल्प थे। अंततः उन्होंने मलकानगिरी को चुना, जहां उनके करीबी मित्र और कांग्रेस नेता ने व्यवस्था की।
तेलंगाना से भी उन्हें प्रस्ताव मिला था, जहां एक मंत्री ने सुरक्षा को साथ रखने की पेशकश की थी। इन घटनाक्रमों से यह संकेत मिलता है कि लखमा की राजनीतिक और सामाजिक पकड़ अब भी मजबूत है। फिलहाल वे खुली हवा में सांस ले रहे हैं, लेकिन उनकी अगली राजनीतिक रणनीति क्या होगी…यह आने वाला समय तय करेगा।
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पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल भी जेल से बाहर आने के बाद सुर्खियों में रहे। उन्होंने वरिष्ठ वकील और नेता कपिल सिब्बल के पॉडकास्ट में अपने जेल के अनुभव साझा किए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अदालत एक सजा देती है, लेकिन जेल में व्यक्ति को कई प्रकार की अतिरिक्त सजाओं का सामना करना पड़ता है।
चैतन्य ने जेल की व्यवस्थाओं, व्यवहार और मानसिक दबाव का उल्लेख किया। साथ ही, उन्होंने कवासी लखमा के साथ हुए व्यवहार का भी जिक्र किया और मानवाधिकारों से जुड़े गंभीर प्रश्न उठाए। उनके बयानों के बाद राज्य की जेल व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है।
करीब 16 साल पहले छत्तीसगढ़ के कोरबा में बालको की चिमनी गिरने से 41 लोगों की मृत्यु हो गई थी। यह हादसा छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। इस सप्ताह हुई सुनवाई में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। कुछ चीनी नागरिकों ने यह कहकर सुनवाई में उपस्थित होने से इनकार कर दिया। चीन से कोरबा तक सीधी उड़ान उपलब्ध नहीं है।
यह तर्क सुनकर अदालत और आमजन दोनों हैरान रह गए। इसके अलावा टीएनसीपी के तत्कालीन प्रभारी ने दावा किया कि चिमनी निर्माण की अनुमति उनके विभाग ने दी ही नहीं थी। इस बयान ने जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया को और जटिल बना दिया है। यदि अनुमति नहीं दी गई थी, तो निर्माण कैसे हुआ? और यदि नगर निगम जिम्मेदार था, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई? 16 साल बाद भी पीड़ित परिवार न्याय की प्रतीक्षा में हैं। हर सुनवाई नए प्रश्न खड़े करती है, लेकिन उत्तर अब भी अधूरे हैं।
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छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार की चर्चा हो और भारतमाला परियोजना का जिक्र न हो, यह संभव नहीं। इस सप्ताह एक बार फिर भारतमाला घोटाले की खबरें सुर्खियों में रहीं हैं। आरोपियों की सूची लंबी है, लेकिन कार्रवाई फिलहाल चुनिंदा नामों तक सीमित दिखाई दे रही है।
डिप्टी कलेक्टर शशिकांत कुर्रे और तहसीलदार लखेश्वर प्रसाद को EOW ने गिरफ्तार कर 20 दिन की रिमांड पर लिया है। बताया जा रहा है कि जमीन अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं। जिन अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है, वे प्रशासनिक तंत्र के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं।
ऐसे में यह गिरफ्तारी केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर बढ़ती बेचैनी का संकेत भी है। इस गिरफ्तारी के बाद तत्कालीन एसडीएम और निगम कमिश्नर जैसे पदों पर रहे अधिकारियों की धड़कनें तेज बताई जा रही हैं। अब नजर इस बात पर है कि जांच की दिशा कितनी गहराई तक जाती है।
इस सप्ताह ड्रग कंट्रोलर नेताम का नाम भी चर्चा में रहा। आरोप है कि उन्होंने नकली दवा बनाने वाले एक कारोबारी से मुलाकात की थी। मामला सामने आते ही हलचल मच गई। कुछ दिनों तक मीडिया की नजरें इस प्रकरण पर टिकी रहीं और अंततः सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया। निलंबन अपने आप में एक प्रशासनिक संदेश है, लेकिन यह अंतिम निर्णय नहीं होता है।
अब खबर है कि नेताम बहाली के प्रयासों में सक्रिय हैं। राजनीतिक संपर्क, मीडिया संवाद और प्रभावशाली लोगों से मुलाकात सभी संभावित रास्ते तलाशे जा रहे हैं। यह प्रकरण एक बड़ा प्रश्न छोड़ता है- क्या यह केवल व्यक्तिगत स्तर की चूक है या सिस्टम में गहरे स्तर पर मिलीभगत की कहानी?
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राजनीति में बजट केवल आय-व्यय का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं का सार्वजनिक घोषणा-पत्र होता है। इस सप्ताह राज्य के आगामी बजट सत्र को लेकर चर्चाएं तेज रहीं। आने वाली 23 फरवरी से 20 मार्च तक सत्र प्रस्तावित है और इसकी तैयारियों को लेकर लगातार बैठकें हो रही हैं। विभाग अपनी-अपनी मांगों को लेकर सक्रिय हैं। कोई आवंटन बढ़ाने की कोशिश में है, तो कोई कटौती से बचने की रणनीति बना रहा है।
आम नागरिक बजट को राहत या बोझ के नजरिए से देखता है, लेकिन सत्ता और प्रशासनिक तंत्र के भीतर इसके मायने अलग होते हैं। नेता, अधिकारी, ठेकेदार और लॉबिंग समूह- सभी की नजर इस दस्तावेज पर टिकी रहती है। किस विभाग को कितना आवंटन मिलेगा? कौन-सी योजनाएं प्राथमिकता पाएंगी? और किन मदों में कटौती होगी?
आंकड़े शांत हैं लेकिन निर्णायक जंग के बीच असली राजनीति आकार लेती रहीं है और अंततः सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया। निलंबन अपने आप में एक प्रशासनिक संदेश है, लेकिन यह अंतिम निर्णय नहीं होता है। अब खबर है कि नेताम बहाली के प्रयासों में सक्रिय हैं।
राजनीतिक संपर्क, मीडिया संवाद और प्रभावशाली लोगों से मुलाकात। सभी संभावित रास्ते तलाशे जा रहे हैं। यह प्रकरण एक बड़ा प्रश्न छोड़ता है- क्या यह केवल व्यक्तिगत स्तर की चूक है या सिस्टम में गहरे स्तर पर मिलीभगत की कहानी?
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प्रदेश के गृह मंत्री विजय शर्मा के बयान ने इस दौरे को और अधिक महत्व दे दिया है। उन्होंने संकेत दिया कि 31 मार्च से पहले अमित शाह का टूसरा दौरा संभव नहीं है। यह वो समय सीमा है जो केंद्र नक्सलियों के खात्मे के लिए पहले ही तय कर चुका है।
संदेश स्पष्ट है… जो नक्सली अब भी सक्रिय हैं, उनके पास आत्मसमर्पण का अवसर है, अन्यथा सुरक्षा बलों की कार्रवाई और तेज हो सकती है। रायपुर में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। बैठक में सुरक्षा एजेंसियों की प्रगति, नक्सल गतिविधियों के आंकड़े, आत्मसमर्पण की संख्या और भविष्य की कार्ययोजना पर भी विस्तार से चर्चा हुई है। यह सप्ताह संकेत देकर गया है कि बस्तर में आने वाले महीनों में या तो बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण होंगे या फिर निर्णायक मुठभेड़ें देखने को मिल सकती हैं।
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जेल से बाहर आने के बाद लखमा ने आरोप लगाया कि उन्हें समुचित इलाज और सुविधाएं नहीं मिलीं। उनका यह बयान कांग्रेस के लिए भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दा बन गया है। रिहाई के बाद उनके सामने रहने के कई विकल्प थे। अंततः उन्होंने मलकानगिरी को चुना, जहां उनके करीबी मित्र और कांग्रेस नेता ने व्यवस्था की।
तेलंगाना से भी उन्हें प्रस्ताव मिला था, जहां एक मंत्री ने सुरक्षा को साथ रखने की पेशकश की थी। इन घटनाक्रमों से यह संकेत मिलता है कि लखमा की राजनीतिक और सामाजिक पकड़ अब भी मजबूत है। फिलहाल वे खुली हवा में सांस ले रहे हैं, लेकिन उनकी अगली राजनीतिक रणनीति क्या होगी…यह आने वाला समय तय करेगा।
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