/sootr/media/media_files/2026/02/14/vijay-shah-controversy-journalist-prakash-bhatnagar-column-2026-02-14-12-21-35.jpeg)
वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश भटनागर की कलम से...
भोपाल: विषय तो भाजपा की ही पसंद का था। लेकिन राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे पर मध्यप्रदेश सरकार और संगठन दोनों विजय शाह के सामने हथियार डालने जैसी मुद्रा में क्यों? यह समझना बड़ा कठिन है।
ऑपरेशन सिंदूर और एक तरह से इस ऑपरेशन का चेहरा बन कर सामने आईं कर्नल सोफिया कुरैशी पर महू के भरे मंच से मध्यप्रदेश सरकार के जिम्मेदार मंत्री की भद्दी टिप्पणी पर कायदे से उसी दिन विजय शाह का इस्तीफा हो जाना चाहिए था। नहीं हुआ।
इसके बावजूद नहीं हुआ कि मोदी-शाह के नेतृत्व में पार्टी अनुशासन के नाम पर भाजपा में तमाम बोलतियां लगभग एक दशक से बंद हैं।
/sootr/media/post_attachments/4793a6a0-ddc.png)
जब देखा था मंत्रीमंडल से बाहर का रास्ता
विजय शाह मध्यप्रदेश की राजनीति का ऐसा नाम है जो अक्सर विवादों के केंद्र में रहा है। मामला चाहे फिर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की धर्मपत्नी पर भद्दी टिप्पणी का हो या फिर कर्नल सोफिया कुरैशी का। हालांकि, साधना सिंह पर टिप्पणी के मामले में शाह को मंत्रीमंडल से बाहर का रास्ता देखना पड़ा था।
यह सजा कुछ ही महीनों के लिए थी, लेकिन थी तो सही। कर्नल सोफिया कुरैशी के मामले में सरकार और संगठन से सजा मिलने में हो रही देरी भाजपा के दृष्टिकोण पर ही सवाल खड़े करती है।
बीते सप्ताह कोर्ट में उनका मामला 19 फरवरी तक टल गया लेकिन उससे पहले इस टिप्पणी के लिए विजय शाह ने चौथी बार वीडियो जारी कर माफी मांगी।
/sootr/media/post_attachments/d1dcf621-89b.png)
तीन स्तर समझें पूरा मामला
इस मामले की उलझन को तीन स्तर पर समझना होगा। पहला तो है, सरकार की असहज स्थिति- सरकार की प्राथमिकता सुशासन और संतुलित संदेश देना होना चाहिए।
यदि किसी मंत्री या वरिष्ठ नेता का बयान या व्यवहार विवाद पैदा करता है तो प्रशासनिक साख प्रभावित होती है। विपक्ष तुरंत इसे मुद्दा बनाता है और सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आ जाती है।
लेकिन लगता है प्रदेश में विपक्ष उतना धारदार नहीं है, जितना उसे होना चाहिए। सरकार इसलिए भी इस मामले में बेपरवाह रूख अपना रही है। एक तरह से सरकार ने इस मामले को अदालत के ऊपर ही छोड़ रखा है, हालांकि यह एक संवेदनशील मुद्दा है।
दूसरा स्तर
दूसरा स्तर संगठन की रणनीतिक दुविधा लगती है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व 2024 के बाद इमेज मैनेजमेंट और कंट्रोल्ड पॉलिटिक्स पर जोर दे रहा है।
ऐसे में क्षेत्रीय क्षत्रपों के बयान पार्टी लाइन से अलग जाते हैं तो संगठन को दोहरा संतुलन बनाना पड़ता है। क्षेत्रीय ताकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन अनुशासन भी बनाए रखना है।
यही वजह है कि कार्रवाई अक्सर नपे-तुले शब्दों में होती है। शाह के मामले में तो कार्यवाही का कहीं ऊपर से नीचे तक पता ही नहीं है। यह उस दबंग केंद्रीय नेतृत्व की नाक के नीचे हो रहा है जिसके सामने भाजपा में किसी असहमति की गुंजाईश भी बाकी नहीं है।
तीसरा स्तर
तीसरा कारण आदिवासी राजनीति के समीकरण माने जा सकते। विजय शाह आदिवासी चेहरे के रूप में स्थापित हैं। मध्यप्रदेश में आदिवासी वोट निर्णायक हैं।
भाजपा इस वर्ग में अपनी बढ़त बनाए रखना चाहती है। ऐसे में किसी भी कठोर कदम के राजनीतिक दुष्परिणाम भी तौले जाते हैं। पर पेंच यहीं है। विजय शाह आदिवासी जरूर हैं लेकिन एक बड़े आदिवासी नेता की छवि और असर उनका कभी नहीं रहा।
अपनी विधानसभा सीट को जीतने के अलावा निमाड़ अंचल की कितनी आदिवासी सीटों को जीतने में विजय शाह का योगदान रहा होगा, इसे भाजपा बेहतर तरीके से जानती है।
इसलिए विजय शाह का मामला केवल विवादास्पद बयान का भी नहीं है और न ही नेतृत्व के नियंत्रण या क्षेत्रीय टकराव का है। शाह के मामले को लेकर भाजपा का रवैया समझ से बाहर तो है ही उसके अनुशासन और नेतृत्व के नियंत्रण पर भी गहरा दाग है।
कांग्रेस में जिलाध्यक्षों की ट्रेनिंग- क्या यह सचमुच संगठनात्मक सुधार है?
मध्यप्रदेश में कांग्रेस के जिलाध्यक्षों की दस दिन की ट्रेनिंग वाकई आश्चर्य का विषय है। प्रदेश में कांग्रेस को विपक्ष में बैठे हुए लगभग दो दशक से ज्यादा हो गए हैं।
एक छोटे से अरसे को छोड़ कर पार्टी सत्ता से कोसों दूर ही रही है। इस दौरान संगठन को पुनर्गठित करने की कई पहल हुईं हैं। सवाल है, क्या यह वास्तव में असरदार होगा? पिछले दो दशक में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में सत्ता से बाहर होने के बाद सुभाष यादव, सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया, अरूण यादव, कमलनाथ और अब जीतू पटवारी कांग्रेस के प्रदेश मुखिया हैं।
/sootr/media/post_attachments/54dab0b8-81c.png)
कांग्रेस लंबे समय से नेतृत्व, केंद्रीकरण और जमीनी ढांचे की कमजोरी से जूझ रही है। यदि ट्रेनिंग के माध्यम से बूथ मैनेजमेंट, सोशल मीडिया रणनीति, और डेटा आधारित राजनीति सिखाई जाती है, तो यह बड़ा बदलाव हो सकता है। लेकिन कांग्रेस की समस्या संरचनात्मक ज्यादा है।
गुटबाजी, वरिष्ठ बनाम युवा नेतृत्व, संसाधनों की कमी, निर्णयों का केंद्रीकरण उसकी बड़ी समस्याएं हैं। सिर्फ ट्रेनिंग से यह बदलने से रहा। बात जरूर होती है लेकिन जिलाध्यक्षों को वास्तविक अधिकार कांग्रेस में कभी हासिल नहीं हुए हैं।
मध्यप्रदेश में कांग्रेस का ढांचा अभी भी व्यक्तित्व आधारित है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के युग की छाप अभी भी दिखती है। यदि नए प्रदेश नेतृत्व को स्वतंत्रता और संसाधन मिलते हैं, तो सुधार संभव है लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया होगी। जिलाध्यक्षों की ट्रेनिंग की पहल सकारात्मक है, पर कांग्रेस को संरचना बदलने का साहस दिखाना होगा। और उसके लिए पहले नीचे कार्यकर्ता तैयार करना होंगे जो बहुत मुश्किल काम है।
भोपाल भाजपा जिला कार्यकारिणी में ये क्या हुआ
भोपाल भाजपा जिला कार्यकारिणी की सूची जारी होना और फिर रोकना कई संकेत देता है। मजबूत संगठनात्मक ढांचा जिस राजनीतिक दल की पहचान है, वहां ऐसी गलती कैसे हुई? क्या भाजपा में अब कोई कुछ देखने वाला बचा भी है या नहीं? आखिर प्रदेशाध्यक्ष तक के सोशल मीडिया हैंडल पर भोपाल भाजपा की सूची जारी होने के बाद हटाना क्या दर्शाता है।
भोपाल जिलाध्यक्ष रविन्द्र यति की कार्यकारिणी को आखिर प्रदेश में भाजपा में किसने मंजूरी दी होगी। होता तो यह प्रदेशाध्यक्ष के निर्देश पर ही है। फिर भाजपा कार्यालय में तोड़फोड़ करने वाला जिला भाजपा का महामंत्री आखिर कैसे बन गया? एक बार पति और एक बार पत्नी ने भाजपा के उम्मीदवारों को वार्ड के चुनाव में हराया तो आखिर ऐसे बागी नेता को जिले में उपाध्यक्ष का पद कैसे मिल गया। क्या ऐसा नहीं लगता कि पूरे कुएं में ही भांग घुली थी।
/sootr/media/post_attachments/5f460bf2-28c.png)
राजधानी में कई प्रभावशाली नेता हैं। सूची में किसी गुट की उपेक्षा असंतोष का कारण बन सकती है, इस बारे में विचार हुआ भी या नहीं? भोपाल प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। यहां की कार्यकारिणी का संदेश पूरे प्रदेश में जाता है। इसलिए सूची को रोक कर इसे फिर से जारी होना है। लेकिन ऐसा अकेले भोपाल में ही नहीं हुआ है, पट्ठावाद अब भाजपा में भी तेजी से हावी होता जा रहा है।
कई जगह से ऐसी शिकायतें हैं, पर भाजपा में अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इन शिकायतों को सुनने और निराकरण करने में सक्षम नेतृत्व आखिर अब कहां है? भाजपा में डर का अनुशासन तो है, पर आंतरिक शक्ति संतुलन लगता है अब गड़बड़ा गया है।
कैलाश की नाराजगी बरकरार.....
प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की नाराजगी बरकरार लगती है। वे अभी तमाम सरकारी आयोजनों से दूरी बनाए हुए हैं। प्रदेश सरकार की पिछली चार कैबिनेट बैठकों में उनकी लगातार अनुपस्थिति भाजपा और बाहर कई चर्चाओं को जन्म दे रही है।
/sootr/media/post_attachments/5cc555f1-7c7.png)
हालांकि पिछली केबिनेट में वे वर्चुअल शामिल हुए थे। भागीरथपुरा कांड के बाद से ही कैलाश विजयवर्गीय की अपनी ही सरकार से जो शिकायतें रही हैं। उन पर ऊपर तक बातचीत हुई है। विजयवर्गीय की गिनती भाजपा के वजनदार और जनाधार वाले नेताओं में होती है। इसलिए दिल्ली में भी उनकी अनदेखी मुश्किल है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव पर तो पार्टी नेतृत्व का वरदहस्त है ही। लिहाजा, लगता है कि यह मामला आगे भी ऐसे ही चलता रहेगा। अनुशासन में बंधे भाजपा के सीनियर नेताओं के दांवपेंच ऐसे ही गुपचुप गुल खिलाते रहने के आसार है। कोई ठोस नतीजा अभी निकलता नहीं लगता है।
ये खबरें भी पढ़ें...
राउंडअप-मध्यप्रदेश : हितानंद शर्मा की भाजपा से संघ में वापसी
विजय शाह का संकट टालने सरकार ला रही Two Point Formula, अब होगा शाह और सोफिया का आमना-सामना
कैबिनेट मीटिंग के समय कहां थे मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, खुद किया खुलासा
आदिवासी जमीन, मंत्रियों पर सवाल और 2028 : कटनी में गरजे जीतू पटवारी, भाजपा सरकार पर सीधे आरोप
/sootr/media/agency_attachments/dJb27ZM6lvzNPboAXq48.png)
Follow Us