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वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश भटनागर की कलम से...
भोपाल: भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा का भाजपा से संघ में दोबारा लौटना संगठन और सरकार में संतुलन साधने की दिशा में उठाया गया एक कदम है।
हितानंद शर्मा के लिए यह संतोष की बात है कि संघ ने उन्हें क्षेत्रीय सह बौद्धिक प्रमुख की भूमिका में वापस लेकर उनके महत्व को कायम रखा है। जाहिर है कि हितानंद शर्मा की भाजपा से वापसी एक रूटिन ट्रांसफर नहीं है। इस फैसले के पीछे असल संकेत क्या हैं?
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प्रदेश संगठन से संतुष्ट नहीं संघ!
संघ यह साफ कर रहा है कि प्रदेश संगठन की मौजूदा दिशा से वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। चुनाव के बाद सरकार बनना अलग बात है, लेकिन संगठन की धार और अनुशासन को लेकर संघ अब सीधे हस्तक्षेप के मूड में दिखता है।
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हितानंद शर्मा जैसे संगठनात्मक व्यक्ति का हटना यह भी बताता है कि आने वाले समय में प्रदेश भाजपा संगठन में नए चेहरे या नई शैली देखने को मिल सकती है। राजनीतिक संदेश साफ है कि सरकार अपना काम करे, संगठन की आत्मा संघ के पास ही रहेगी।
नए चेहरे पर असमंजस
भाजपा में अब अगला सवाल ये है कि नए संगठन महामंत्री के तौर पर संघ अब किसे भेजेगा या भेजेगा भी या नहीं। कम से कम चार राज्यों में भाजपा की प्रदेश इकाइयों में संघ ने अपने किसी प्रचारक को नहीं भेजा है।
इनमें महाराष्ट्र, राजस्थान जैसे बड़े राज्यों के साथ दो तीन और भी राज्य शामिल हैं। वैसे अभी मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिवप्रकाश के अलावा क्षेत्रीय संगठन मंत्री के तौर पर अजय जामवाल काम कर ही रहे हैं।
भाजपा में राष्ट्रीय स्तर पर एक संगठन मंत्री के अलावा चार सह संगठन मंत्रियों का प्रावधान है। पार्टी इन सह संगठन मंत्रियों के बीच भी राज्यों का बंटवारा कर काम चला सकती है।
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संघ का किसी प्रदेश इकाई में प्रचारक को संगठन मंत्री बनाकर भेजने के पीछे एक उद्देश्य था, उस राज्य में पार्टी के काम का विस्तार, संगठन को मजबूत करना और सत्ता और संगठन में समन्वय बनाना।
लेकिन अब होने यह भी लगा है कि पार्टी की सत्ता पर पकड़ मजबूत होने के साथ संगठन मंत्री भी सत्ता की धारा में बहते हुए पावर इंजॉय करने लगे हैं।
अब कभी-कभी उनकी इच्छा और इगो ही पार्टी के लिए निर्देश होने लगे हैं। ऐसे में संघ में भी इस बात का विचार होने लगा है कि भाजपा में प्रचारक भेजने हैं या नहीं, भेजने हैं तो किस स्तर के और कितने भेजने हैं।
इसका बड़ा कारण यही है कि संघ से आए हुए प्रचारक भाजपा में आकर विवादास्पद भी हुए हैं। कई संगठन मंत्रियों पर चमड़े के सिक्के चलाने जैसे आरोप लगने लगे हैं। ऐसे में संघ को नए सिरे से इस प्रक्रिया पर विचार करना पड़ रहा है। मध्यप्रदेश में मार्च तक स्थिति साफ होने के आसार हैं।
कैलाश विजयवर्गीय की 10 दिनी छुट्टी और वापसी
यह शांत दिखने वाला लेकिन बहुत गहरा घटनाक्रम है। मोहन सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की दस दिन की छुट्टी को भोलेपन से निजी कारण मानना गलती होगी।
छुट्टी के अपने मायने हैं। यह दरअसल राजनीतिक कूल-ऑफ पीरियड था। मंत्रिमंडल, तबादलों और सत्ता संतुलन में उनकी भूमिका को लेकर दिल्ली और भोपाल दोनों जगह मंथन चल रहा था।
उनकी वापसी बताती है कि वे पूरी तरह साइडलाइन नहीं हुए हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अब वे सुपर पावर सेंटर नहीं बल्कि नियंत्रित शक्ति केंद्र के रूप में दिख रहे हैं।
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पार्टी के भीतर संदेश साफ है कि कैलाश जी हैं, पर हर फैसला उनके इर्द-गिर्द नहीं घूमेगा। जाहिर है इस घटनाक्रम का निपटारा भी संघ के हस्तक्षेप से ही हुआ है।
राजनीतिक छुट्टी के कारण इस बार कैलाश जी ने 26 जनवरी को धार या सतना, जो उनके प्रभार के जिले हैं, इस बार वहां ध्वज फहराने से भी परहेज किया।
इसके अलावा अपने प्रभार के धार जिले में बसंत पंचमी पर भोजशाला प्रकरण से भी दूरी बना कर रखी। शुक्रवार के दिन बसंत पंचमी होने से उस दिन भोजशाला में पूजा और नमाज से विवादास्पद मुद्दे को इस बार प्रशासन ने शांति से निपटाया।
लिहाजा, इसका श्रेय भी प्रशासन को ही गया। हालांकि पहले ऐसे मौकों पर धार में कैलाश जी की उपस्थिति अपरिहार्य मानी जाती थी।
पुलिस और प्रशासन में तबादले
यह मोहन यादव सरकार का असली सिग्नेचर मूव है। पिछले सप्ताह हुए तबादले केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भरोसे की लिस्ट हैं। तीन साफ बातें निकलती हैं, पुराने (शिवराजकालीन भरोसेमंद अफसरों) को धीरे-धीरे किनारे किया जा रहा है।
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मुख्यमंत्री मोहन यादव अपनी प्रशासनिक टीम खुद गढ़ रहे हैं। पुलिस में बदलाव यह भी बताता है कि सरकार कानून-व्यवस्था और राजनीतिक नियंत्रण दोनों को साथ साधना चाहती है।
यह साफ संकेत है कि मोहन यादव अब सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं बल्कि एक निर्णायक और हर परिस्थिति पर नियंत्रण वाले मुख्यमंत्री की भूमिका में आना चाहते हैं। हाल में हुए आईएएस और आईपीएस तबादले इस धारणा को पुख्ता करते हैं।
एमपी में मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियों पर इंतजार
भाजपा में सबसे ज्यादा बेचैनी का मुद्दा अब यहीं है। सत्तारूढ़ दल में सबसे बड़ा सवाल यही है। आखिर मंत्रिमंडल में विस्तार कब? देरी क्यों हो रही है? जातीय, क्षेत्रीय और संगठन-सरकार संतुलन अभी पूरी तरह फाइनल नहीं हुआ है।
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दिल्ली यह सुनिश्चित करना चाहती है कि बहुत ज्यादा ताकत किसी एक गुट को न मिले और कोई नया शिवराज मॉडल न खड़ा हो जाए। कई वरिष्ठ विधायक और नेता नाराजगी में खामोश हैं।
राजनीतिक नियुक्तियों (निगम-मंडल) को लेकर भी सब्र टूटने लगा है। पार्टी के नेताओं और विधायकों का इंतजार लंबा होता जा रहा है।
कुल मिलाकर पिछले सप्ताह के घटनाक्रम यह बता रहे हैं कि संघ संगठन पर पकड़ कस रहा है। दिल्ली राज्य नेतृत्व को धीरे-धीरे परख रही है। मुख्यमंत्री मोहन यादव अपनी जमीन बनाने में लगे हैं। और भाजपा के भीतर धैर्य की परीक्षा चल रही है।
NOTE: (लेखक अनादि टीवी में Editor-in-Chief हैं। इस लेख में उनके निजी विचार हैं।)
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