छत्तीसगढ़ में बिना ईलाज इंसेटिंव ऐंठने का चल रहा खेल, बवाल के बाद रुकी प्रक्रिया, कार्रवाई नहीं
VINAY VERMA | Apr 21, 2026, 13:54 IST
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छत्तीसगढ़ में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की प्रोत्साहन राशि को लेकर बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। आयुष्मान भारत योजना के तहत बिना मरीजों के फर्जी एडमिशन दिखाकर लाखों रूपए के क्लेम बनाए जाने का आरोप है।
छत्तीसगढ़ में डॉक्टरों-स्वास्थ्यकर्मियों के प्रोत्साहन राशि को लेकर बड़ी गड़बड़ी चल रही है। ऐसे ही जब कुछ मामलो का खुलासा हुआ तो विभाग ने केवल 2 ऑपरेटर को दोषी बना भ्रष्टाचार को दबा दिया है। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल कह रहे हैं कि पैसा ट्रांसफर नहीं हुआ है इसलिए आर्थिक अनियमितता का सवाल नहीं उठता।
जबकि आरोप है कि न केवल फाइल तैयार हुई, बल्कि सीएचसी, नोडल ऑफिसर, सीएमएचओ से होते हुए मंत्रालय पहुंच गई। इसका मतलब हर स्तर पर मिलीभगत हुई। विभाग के लोगों का यह भी कहना है कि यह पहला मामला नहीं है, खेल लंबे समय से खेला जा रहा था।
सरकारी अस्पतालों में आयुष्मान कार्ड के जरिए मरीजों के इलाज पर बीमा क्लेम मिलता है। इसी क्लेम का 25 प्रतिशत हिस्सा डॉक्टर और स्टाफ को प्रोत्साहन राशि यानि इंसेंटिव के रूप में दिया जाता है। यहीं से गड़बड़झाला शुरू होता है ।
राज्य के कई जिलों खासकर दुर्ग, बेमेतरा और बालोद से शिकायतें आईं कि बिना मरीज के ही फर्जी एडमिशन बनाए जा रहे हैं। मरीज के नाम पर इलाज दिखाया जा रहा है, मेडिकल रिपोर्ट अपलोड हो रही है। यानी कागजों में इलाज पूरा खेल। जबकि हकीकत में मरीज का नाम तक नहीं।
इस पूरे फर्जीवाड़े का बड़ा खुलासा दुर्ग जिले के अर्जुंदा से हुआ। करीब 320 मामलों में गलत एंट्री हुई थी। 70 लाख रुपए का फर्जी इंसेंटिव निकालने की तैयारी थी। शिकायत के बाद जब राज्य स्तर पर जांच हुई तो मामला सही निकला। इसी तरह बेमेतरा से भी लगभग 70 लाख रुपए के गड़बड़ी की पुष्टि हुई। दोनों ही मामलों में भुगतान पर रोक लगाई गई है।
जांच के बाद जो सबसे चौंकाने वाली बात सामने आई, वो ये कि पूरे खेल का जिम्मेदार सिर्फ दो कंप्यूटर ऑपरेटर प्रवीण कुमार और जितेंद्र कुमार को ठहरा दिया गया। सरकार ने दोनों को चेतावनी देकर छोड़ दिया। ना कोई सस्पेंशन, ना एफआईआर।
अब सवाल उठता है क्या करोड़ों के फर्जी क्लेम का खेल सिर्फ दो ऑपरेटर कर सकते हैं? क्योंकि सिस्टम में हर फाइल डॉक्टर, बीएमओ और सीएमओ के जरिए आगे बढ़ती है। और सबसे बड़ा हिस्सा भी डॉक्टरों को ही मिलता है। फिर जानबूझकर बड़े नामों को बचाया जा रहा है?
आयुष्मान भारत योजना के तहत मिलने वाले बीमा क्लेम का 25 प्रतिशत हिस्सा प्रोत्साहन राशि होता है। इसका बंटवारा कुछ इस तरह होता है-
55 प्रतिशत - प्रमुख और सहायक चिकित्सक
30 प्रतिशत - नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ
10 प्रतिशत - पंजीयन और सहायक कर्मचारी
1 प्रतिशत - नोडल अधिकारी
4 प्रतिशत - प्रेरक प्रोत्साहन
यानी अगर कोई फर्जी क्लेम पास होता है, तो फायदा सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में नीचे से ऊपर तक पहुंचता है।
मामले के सामने आने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के बयान की हो रही है। मंत्री का कहना है कि क्लेम की प्रक्रिया जरूर हुई थी, लेकिन भुगतान नहीं हुआ, इसलिए कोई वित्तीय अनियमितता नहीं हुई। मंत्री ने दो ऑपरेटरों को चेतावनी देकर मामला खत्म मान लिया। लेकिन इस बयान ने ही पूरे सिस्टम की नीयत पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बालोद जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, देवरी से भी इसी तरह का मामला सामने आया। यहां 60-70 लाख रुपए के गबन की कोशिश हुई। आरोप है कि ऑपरेटर हिरेन्द्र कुमार साहू डॉक्टरों के नाम पर राशि उनके खातों में डालता था और फिर लगभग 50 प्रतिशत पैसा खुद ले लेता था।
इस मामले में ऑपरेटर को हटा दिया गया, लेकिन असली ट्विस्ट ये है कि जांच करने वाले CHC प्रभारी डॉक्टर नीरज भूसाखरे के खिलाफ ही जांच शुरू हो गई।
-क्या सिर्फ ऑपरेटर ही इस खेल के मास्टरमाइंड हैं?
-डॉक्टर और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं?
-सबसे बड़ा सवालकृक्या सरकार सच में कार्रवाई करना चाहती है?
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जबकि आरोप है कि न केवल फाइल तैयार हुई, बल्कि सीएचसी, नोडल ऑफिसर, सीएमएचओ से होते हुए मंत्रालय पहुंच गई। इसका मतलब हर स्तर पर मिलीभगत हुई। विभाग के लोगों का यह भी कहना है कि यह पहला मामला नहीं है, खेल लंबे समय से खेला जा रहा था।
क्या है पूरा मामला?
राज्य के कई जिलों खासकर दुर्ग, बेमेतरा और बालोद से शिकायतें आईं कि बिना मरीज के ही फर्जी एडमिशन बनाए जा रहे हैं। मरीज के नाम पर इलाज दिखाया जा रहा है, मेडिकल रिपोर्ट अपलोड हो रही है। यानी कागजों में इलाज पूरा खेल। जबकि हकीकत में मरीज का नाम तक नहीं।
अर्जुंदा से खुला राज
दो ऑपरेटर ही विलेन?
अब सवाल उठता है क्या करोड़ों के फर्जी क्लेम का खेल सिर्फ दो ऑपरेटर कर सकते हैं? क्योंकि सिस्टम में हर फाइल डॉक्टर, बीएमओ और सीएमओ के जरिए आगे बढ़ती है। और सबसे बड़ा हिस्सा भी डॉक्टरों को ही मिलता है। फिर जानबूझकर बड़े नामों को बचाया जा रहा है?
इंसेंटिव का गणित समझिए
55 प्रतिशत - प्रमुख और सहायक चिकित्सक
30 प्रतिशत - नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ
10 प्रतिशत - पंजीयन और सहायक कर्मचारी
1 प्रतिशत - नोडल अधिकारी
4 प्रतिशत - प्रेरक प्रोत्साहन
यानी अगर कोई फर्जी क्लेम पास होता है, तो फायदा सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में नीचे से ऊपर तक पहुंचता है।
मंत्री की माफी
बालोद में भी वही कहानी
इस मामले में ऑपरेटर को हटा दिया गया, लेकिन असली ट्विस्ट ये है कि जांच करने वाले CHC प्रभारी डॉक्टर नीरज भूसाखरे के खिलाफ ही जांच शुरू हो गई।
सवाल जो सिस्टम से जवाब मांगते हैं
-डॉक्टर और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं?
-सबसे बड़ा सवालकृक्या सरकार सच में कार्रवाई करना चाहती है?
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