फर्जी डॉक्टर 7 साल तक सरकारी अस्पताल में बिना डिग्री के करता रहा इलाज, एनएचएम ने किया बर्खास्त
Krishna Kumar Sikander | Aug 11, 2025, 14:34 IST
Fake doctor kept treating patients in government hospital the sootr
रायपुर में राहुल अग्रवाल नामक एक फर्जी डॉक्टर, जिसके पास कोई एमबीबीएस डिग्री या मेडिकल पंजीकरण नहीं था, पिछले सात सालों से सरकारी अस्पतालों में काम कर रहा था। उसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने नौकरी से निकाल दिया है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक फर्जी डॉक्टर सात सालों से सरकारी अस्पताल में नौकरी कर रहा था। उसके पास न तो एमबीबीएस की डिग्री थी और न ही मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण। इसके बावजूद सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज करता रहा।
इस फर्जी डॉक्टर की पहचान राहुल अग्रवाल के रूप में हुई है, जिसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने बर्खास्त कर दिया है। इस खुलासे ने स्वास्थ्य विभाग की भर्ती प्रक्रिया और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, साथ ही जनता में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है।
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यह सनसनीखेज मामला तब सामने आया जब एक आरटीआई कार्यकर्ता ने डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) और एनएचएम छत्तीसगढ़ से राहुल अग्रवाल की शैक्षणिक योग्यता और मेडिकल काउंसिल पंजीकरण की जानकारी मांगी।
एनएचएम ने राहुल को अपनी डिग्री और पंजीकरण के दस्तावेज जमा करने के लिए नोटिस जारी किया। कई बार समय देने के बावजूद राहुल कोई वैध दस्तावेज पेश नहीं कर सका। इसके बाद जांच गहराई और यह साबित हो गया कि वह बिना किसी मेडिकल योग्यता के डॉक्टर के रूप में काम कर रहा था।
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राहुल अग्रवाल की नियुक्ति 2018 में एनएचएम छत्तीसगढ़ के तहत हुई थी। शुरुआत में वह रायपुर के खोखोपारा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) में तैनात था। बाद में उसे मठपुरैना पीएचसी में स्थानांतरित किया गया। हैरानी की बात यह है कि राहुल ने करीब एक साल तक रायपुर के प्रतिष्ठित जिला अस्पताल में भी मरीजों का इलाज किया।
इतना ही नहीं, वह कायाकल्प और प्री-कॉन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (पीसीपीएनडीटी) जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं की टीम का भी हिस्सा रहा। सात साल तक उसकी गतिविधियों पर किसी का ध्यान न जाना स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल उठाता है।
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राहुल अग्रवाल का मामला एनएचएम की भर्ती प्रक्रिया की गंभीर खामियों को उजागर करता है। सवाल उठ रहा है कि बिना किसी वैध डिग्री और पंजीकरण के एक व्यक्ति सात साल तक सरकारी अस्पतालों में कैसे काम कर सकता था?
जांच में यह भी सामने आया कि राहुल का चयन कायाकल्प और पीसीपीएनडीटी जैसी संवेदनशील योजनाओं के लिए भी किया गया था, जो स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा के लिए खतरा है। इस मामले ने यह आशंका जताई है कि प्रदेश में और भी फर्जी डॉक्टर सक्रिय हो सकते हैं, जो मरीजों के जीवन के लिए जोखिम पैदा कर रहे हैं।
लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में मरीज अपनी जान बचाने के लिए आते हैं, लेकिन अगर वहां फर्जी डॉक्टर इलाज करेंगे, तो यह मरीजों के साथ धोखा है। कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने स्वास्थ्य विभाग से मांग की है कि प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों की डिग्री और मेडिकल काउंसिल पंजीकरण की कड़ी जांच की जाए।
स्थानीय निवासी रमेश साहू ने कहा, "यह बेहद शर्मनाक है कि इतने सालों तक एक फर्जी डॉक्टर मरीजों का इलाज करता रहा और किसी को भनक तक नहीं लगी। सरकार को तुरंत सभी डॉक्टरों के दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।
यह मामला स्वास्थ्य विभाग की निगरानी और भर्ती प्रक्रिया की लापरवाही को उजागर करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भर्ती के समय दस्तावेजों की सख्ती से जांच की गई होती, तो राहुल जैसे फर्जी डॉक्टर सिस्टम में प्रवेश ही नहीं कर पाते। इसके अलावा, एनएचएम की ओर से समय-समय पर डॉक्टरों के प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच करने की कोई व्यवस्था नहीं होना भी इस मामले को और गंभीर बनाता है।
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इस फर्जी डॉक्टर की पहचान राहुल अग्रवाल के रूप में हुई है, जिसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने बर्खास्त कर दिया है। इस खुलासे ने स्वास्थ्य विभाग की भर्ती प्रक्रिया और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, साथ ही जनता में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है।
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कैसे खुला फर्जीवाड़े का राज?
एनएचएम ने राहुल को अपनी डिग्री और पंजीकरण के दस्तावेज जमा करने के लिए नोटिस जारी किया। कई बार समय देने के बावजूद राहुल कोई वैध दस्तावेज पेश नहीं कर सका। इसके बाद जांच गहराई और यह साबित हो गया कि वह बिना किसी मेडिकल योग्यता के डॉक्टर के रूप में काम कर रहा था।
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सात साल तक चला फर्जीवाड़ा
इतना ही नहीं, वह कायाकल्प और प्री-कॉन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (पीसीपीएनडीटी) जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं की टीम का भी हिस्सा रहा। सात साल तक उसकी गतिविधियों पर किसी का ध्यान न जाना स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल उठाता है।
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कोर्ट से समय मांगने का नाटक जब एनएचएम ने राहुल से दस्तावेज मांगे, तो उसने समय हासिल करने के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने उसे दस्तावेज जमा करने के लिए 90 दिन का समय दिया। इस अवधि में भी राहुल कोई प्रमाण नहीं दे सका। इसके बाद उसे एक महीने का अतिरिक्त समय दिया गया, लेकिन परिणाम वही रहा। अंततः, एनएचएम ने सितंबर 2025 में उसकी सेवाएं समाप्त कर दीं। इस बर्खास्तगी ने न केवल राहुल के फर्जीवाड़े को उजागर किया, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की भर्ती प्रक्रिया की खामियों को भी सामने लाया।
एनएचएम की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल
जांच में यह भी सामने आया कि राहुल का चयन कायाकल्प और पीसीपीएनडीटी जैसी संवेदनशील योजनाओं के लिए भी किया गया था, जो स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा के लिए खतरा है। इस मामले ने यह आशंका जताई है कि प्रदेश में और भी फर्जी डॉक्टर सक्रिय हो सकते हैं, जो मरीजों के जीवन के लिए जोखिम पैदा कर रहे हैं।
जनता में आक्रोश, कड़ी जांच की मांग
स्थानीय निवासी रमेश साहू ने कहा, "यह बेहद शर्मनाक है कि इतने सालों तक एक फर्जी डॉक्टर मरीजों का इलाज करता रहा और किसी को भनक तक नहीं लगी। सरकार को तुरंत सभी डॉक्टरों के दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।
स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही पर सवाल
FAQ
- राहुल अग्रवाल को एनएचएम से क्यों बर्खास्त किया गया और यह मामला कैसे सामने आया?
राहुल अग्रवाल को बिना किसी वैध मेडिकल डिग्री और मेडिकल काउंसिल पंजीकरण के सरकारी अस्पताल में डॉक्टर के रूप में काम करने के आरोप में एनएचएम छत्तीसगढ़ ने बर्खास्त किया। यह मामला तब सामने आया जब एक आरटीआई कार्यकर्ता ने उसकी शैक्षणिक योग्यता और पंजीकरण की जानकारी मांगी, और जांच में वह फर्जी डॉक्टर साबित हुआ। - राहुल अग्रवाल ने किन-किन सरकारी अस्पतालों में कितने समय तक काम किया और किन योजनाओं से जुड़ा रहा?
राहुल अग्रवाल ने 2018 से करीब सात वर्षों तक सरकारी अस्पतालों में काम किया। वह पहले खोखोपारा पीएचसी में, फिर मठपुरैना पीएचसी में और एक साल तक रायपुर के जिला अस्पताल में भी तैनात रहा। इसके अलावा, वह कायाकल्प और पीसीपीएनडीटी जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं की टीम का भी हिस्सा था। - इस घटना से स्वास्थ्य विभाग की कौन-कौन सी खामियां उजागर हुई हैं और जनता की क्या मांग है?
यह घटना स्वास्थ्य विभाग की भर्ती प्रक्रिया और दस्तावेज़ सत्यापन प्रणाली की गंभीर खामियों को उजागर करती है। बिना डिग्री के व्यक्ति का सात साल तक डॉक्टर के रूप में काम करना विभाग की लापरवाही को दर्शाता है। जनता और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि सभी सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों की डिग्री और पंजीकरण की तत्काल और कठोर जांच की जाए।
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रायपुर फर्जी डॉक्टर | फर्जी डॉक्टर सरकारी अस्पताल | राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) रायपुर | स्वास्थ्य विभाग भर्ती
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